बुधवार 29 मार्च का दिन था. यूरोपीय संघ के अध्यक्ष दोनाल्द तुस्क के लिए दोपहर के भोजन का समय हो रहा था. पर, वे प्रतीक्षा कर रहे थे सर टिम बैरो की. सर बैरो यूरोपीय संघ के लिए ब्रिटिश राजदूत हैं. अपनी प्रधानमंत्री टेरेसा मे के एक पत्र के साथ कुछ ही समय पहले वे लंदन से ब्रसेल्स लौटे थे. सर बैरो ने प्रधानमंत्री मे के पत्र का लिफाफा दोनाल्द तुस्क को जब थमाया, तब तक दोपहर के लगभग डेढ़ बज चुके थे. तुस्क ने कुछ ही मिनट बाद पत्रकारों को इस पत्र की एक झलक दिखाते हुए कहा, ‘ये रहा वो. छह पन्ने हैं. यही है प्रधानमंत्री टेरेसा मे की भेजी (लिस्बन संधि की) धारा 50 को सक्रिय करने वाली अधिसूचना. यह दिखावा करने का कोई कारण नहीं है कि आज कोई खुशी का दिन है – न तो ब्रसेल्स में और न लंदन में. मैं भी यह दिखावा नहीं करता....’

यूरोपीय संघ कम से कम छह महीनों से इस पत्र की बाट जोह रहा था. कंप्यूटर से लिखे पत्र का संबोधन ‘डियर प्रेसिडेंट तुस्क’ टेरेसा मे ने अलग से अपने हाथ से लिखा था! संबोधन के ठीक नीचे की प्रथम पंक्तियां थीं, ‘पिछले वर्ष 23 जून को संयुक्त राजशाही (यूनाइटेड किंगडम) की जनता ने यूरोपीय संघ को छोड़ देने के पक्ष में मतदान किया... जनता का यह निर्णय, हमारी नज़र में, राष्ट्रीय आत्मनिर्णय (के अधिकार) की बहाली है. हम यूरोपीय संघ को तो छोड़ रहे हैं, पर यूरोप को नहीं...’

यूरोपीय संघ पर चोट

यूरोपीय संघ के देशों की ‘लिस्बन संधि’ की धारा 50 के अनुसार, यही वह अनिवार्य अधिसूचना थी, जिसके बाद संघ से किसी देश के बाहर निकलने की औपचारिक प्रक्रिया शुरू हो सकती है. देर-सवेर ‘संयुक्त राज्य यूरोप’ बनने की महत्वाकांक्षा रखने वाले जिस यूरोपीय संघ की सदस्यता पाने के लिए यूक्रेन, सर्बिया या तुर्की जैसे देश वर्षों से तरस रहे हैं, 44 वर्षों तक उसका एक प्रमुख सदस्य रहने के बाद ब्रिटेन ऐसा पहला देश बनने जा रहा है, जो अब उससे मुंह मोड़ लेगा. यूरोपीय संघ की हीरक जयंती के वर्ष में ब्रिटेन द्वारा उससे नाता तोड़ देने की अधिसूचना इस संघ के लिए एक बड़ी चोट है. फ्रांस और नीदरलैंड जैसे देशों के राष्ट्रवादियों का हौसला इससे और भी बुलंद हो सकता है. यूरोपीय संघ के साथ-साथ ब्रिटेन ‘यूराटोम’ कहलाने वाले ‘यूरोपीय परमाणु ऊर्जा समुदाय’ से भी अलग हो रहा है.

यूरोपीय संघ की सदस्यता छोड़ने की ब्रिटिश अधिसूचना का यह अर्थ नहीं है कि ब्रिटेन तुरंत प्रभाव से अब संघ का सदस्य नहीं रहा. नहीं; ब्रिटेन अभी अगले कम से कम दो वर्षों तक यूरोपीय संघ का सदस्य माना जायेगा. हां, वह ऐसा सक्रिय सदस्य नहीं रह जायेगा, जो संघ के निर्णयों में भाग ले सके. इन दो वर्षों के दौरान दोनों पक्षों के बीच विभिन्न स्तरों पर ऐसी सैकड़ों बैठकें और वार्ताएं होंगी, जिनमें, किसी सामान्य तलाक़ की तरह ही, यह लेखाजोखा किया जायेगा कि पिछले 44 वर्षों के दौरान किसने क्या पाया और क्या दिया? क्या वादे किये और क्या निभाए? किसे अब क्या देना और क्या पाना है? इन बैठकों में उन्हें अब तक जोड़ने वाली सारी संधियों व समझौतों तथा 21 हज़ार से अधिक नियमों-क़ानूनों के मकड़जाल को भी सुलझाना होगा. अनुमान है कि इस सारे बंटवारे का निपटारा होते-होते दो ही नहीं, पांच साल तक का भी समय लग सकता है!

भावी चोटों की पहली बानगी

तलाक़ से जुड़े अलगावों व बंटवारों की बातचीत अभी शुरू भी नहीं हो पायी है कि भावी चोटों की पहली बानगी ब्रिटेन को अपनी औपचारिक अधिसूचना के दो दिन बाद ही मिल गयी. शुक्रवार 31 मार्च को, यूरोपीय संघ के अध्यक्ष दोनाल्द तुस्क ने, संघ के 27 शेष सदस्य देशों की सरकारों को ब्रिटेन के साथ होने जा रही वार्ताओं की संभावित रूपरेखा भेजी. इस रूपरेखा में एक ऐसा बम छिपा है जिससे ब्रिटेन सकते में आ गया जबकि स्पेन की बांछें खिल गयीं. तुस्क ने लिखा, ‘संयुक्त राजशाही (यानी ब्रिटेन) द्वारा यूरोपीय संघ को छोड़ देने के बाद उसके साथ यूरोपीय संघ का कोई भी समझौता, राजशाही स्पेन और संयुक्त राजशाही के बीच (आपसी) सहमति के बिना, जिब्राल्टर पर लागू नहीं हो सकता.’

जिब्राल्टर के बारे में यूरोपीय संघ का कोई निर्णय लागू कर सकने से पहले ब्रिटेन के साथ-साथ स्पेन की भी सहमति मिलने की अनिवार्यता का सीधा-सा मतलब है कि जिब्राल्टर के मामले में स्पेन को अब वीटो-अधिकार मिलने जा रहा है. ब्रिटेन के लिए यह एक ऐसा कड़वा घूंट है, जो उसे निगलना ही पड़ेगा. जिब्राल्टर के सरकार-प्रमुख फ़ाबियान पिकार्दो ने इसकी आलोचना करते हुए कहा कि ऐसा होने पर ‘स्पेन, जिब्राल्टर के लोगों की ब्रिटिश नागरिकता के साथ भेदभाव करेगा.’

जिब्राल्टर को लेकर खींचतान

सिर्प 6.5 वर्ग किलोमीटर के दायरे और 32 हज़ार जनसंख्या वाला जिब्राल्टर स्पेनी भूमि के दक्षिणी छोर पर 1713 से एक ब्रिटिश उपनिवेश है. स्पेन उसे वापस चाहता है, पर न तो ब्रिटेन की सरकार और न ही जिब्राल्टर के निवासी इसके लिए राज़ी हैं. सात नवंबर 2002 के एक जनमतसंग्रह में वहां के 90 प्रतिशत मतदाताओं ने 99 प्रतिशत मतों के प्रचंड बहुमत के साथ ब्रिटेन का ही हिस्सा बने रहना पसंद किया. ब्रिटिश होने के कारण जिब्राल्टर भी अब तक यूरोपीय संघ का ही एक भूभाग था. लेकिन, ब्रिटेन द्वारा यूरोपीय संघ छोड़ते ही यह स्थिति बदल जाएगी. स्पेन सहित यूरोपीय संघ वाले सभी देशों के लिए वह विदेश बन जायेगा. तब, न तो जिब्राल्टरवासियों को यूरोपीय संघ के देशों में कहीं भी आने-जाने की छूट रह जायेगी और न ही यूरोपीय संघ के निवासियों को जिब्राल्टर जाने की. यूरोपीय संघ के अब तक क़रीब 10 लाख लोग हर साल वहां घूमने-फिरने या अपना काला धन वहां के बैंकों में छिपाने जाया करते हैं. जिब्राल्टर भी करचोरी और काला धन छिपाने का एक स्वर्ग है.

यूरोपीय संघ के अध्यक्ष दोनाल्द तुस्क ने ब्रिटेन के साथ बातचीत की जो रूपरेखा तैयार की है, उस पर संघ के शेष 27 देशों के शीर्ष नेता 27 अप्रैल को ब्रसेल्स में होने जा रहे एक विशेष शिखर सम्मेलन में विचार करने के बाद उसे अंतिम रूप देंगे. ब्रिटिश प्रधानमंत्री टेरेसा मे इस शिखर सम्मेलन में भाग नहीं ले सकेंगी. वे चाहती हैं कि संघ से ब्रिटेन के निकलने के बाद भी संघ के एकीकृत बाज़ार में आने-जाने और वहां अपना माल-सामान बेचने का दरवाज़ा खुला रहे. ‘हम यूरोपीय संघ को छोड़ रहे हैं, यूरोप को नहीं,’ अपने पत्र में उन्होंने विखा है. उनका आग्रह है कि ब्रिटेन के निर्गमन, और यूरोपीय संघ के साथ उसके भावी संबंधों के बारे में वार्ताएं, साथ-साथ चलें. लेकिन, यूरोपीय संघ के अध्यक्ष और लगभग सभी अन्य शिखर नेता भी ब्रिटेन को ‘मीठी-मीठी गप्प और कड़वी-कड़वी थू’ का कोई मौक़ा नहीं देना चाहते. उनका कहना है कि भावी संबंधों की बारी तभी आयेगी, जब वर्तमान संबंधों का अंत आ चुका होगा.

केवल दो वर्ष का समय

वर्तमान संबंधों का अंत 2019 के मार्च महींने के अंत तक हो जाना चाहिये. लिस्बन संधि की जिस धारा 50 के अनुसार ब्रिटेन ने 29 मार्च को अपनी अधिसूचना भेजी थी, वह धारा संबंध-विच्छेद के लिए दो वर्ष का समय देती है. यदि इस समय के भीतर 27 देशों के यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के बीच आवश्यक सहमति नहीं हो पाती, तो ब्रिटेन की सदस्यता, बिना किसी सहमति के भी, अपने आप ख़त्म हो जायेगी. सदस्यता की अवधि अस्थायी रूप से केवल तभी बढ़ सकती है, जब संघ के सभी वर्तमान 27 सदस्य देश एकमत से इसके लिए राज़ी हों.

सदस्यता-समापन की वार्ताएं 27 अप्रैल के ब्रसेल्स शिखर सम्मेलन के बाद शुरू होने की आशा है. यूरोपीय संघ की ओर से इन वार्ताओं का नेतृत्व, किसी सरकार के समान काम करने वाले ‘यूरोपीय आयोग’ के ब्रेक्जिट-प्रभारी, फ्रांस के मिशेल बार्नियेर करेंगे. उनका कहना है कि जहां तक हो सके, अक्टूबर 2018 तक मूल वार्ताएं पूरी हो जानी चाहियें, ताकि यूरोपीय संसद के लिए मई या जून 2019 में होने वाले चुनावों से पहले दोनों पक्ष निर्गमन-समझौते पर हस्ताक्षर और उसकी पुष्टि कर सकें. यूरोपीय संघ की ओर से यूरोपीय संसद को, और वर्तमान 27 सदस्य देशों में से कम से कम 20 देशों को, ब्रेक्जिट समझौते का अनुमोदन करना होगा. टेरेसा मे ने कहा है कि ब्रिटिश संसद के दोनों सदनों से भी समझौते की पुष्टि करवाई जायेगी.

शक्तिपरीक्षण के संभावित मुद्दे

किसी भी देश की राजनीति, कूटनीति, अर्थव्यवस्था, न्यायप्रणाली, सामाजिक जीवन इत्यादि के जितने भी पहलू हो सकते हैं, वे सब ब्रेक्जिट-वार्ताओं के समय शक्तिपरीक्षण का कारण बन सकते हैं. कुछ उदाहरणः

2020 तक देनदारी - 23 जून वाले जनमतसंग्रह के पीछे एक मुख्य तर्क यह था कि ब्रिटेन को यूरोपीय संघ के राजकोष के लिए जितना पैसा देना पड़ता है, उतने के बराबर उसे लाभ नहीं मिलता. संघ से निकल जाने पर हमें ‘कुछ नहीं देना पड़ेगा,’ ब्रेक्जिट की पट्टी पढ़ने वाले कहा करते थे. इस समय उसे हर सप्ताह 35 करोड़ पाउंड देने पड़ते हैं. यूरोपीय संघ का वर्तमान बजट, लेकिन 2020 तक चलेगा. बजट जब बना था, तब ब्रिटेन ने उसकी पूरी अवधि के लिए अपना अंशदान स्वीकार किया था. यानी, बहुत संभव है कि उसे मार्च 2019 ही नहीं, 2020 के अंत तक हर सप्ताह 35 करोड़ पाउंड देने पड़ें. उसे उन ब्रिटिश अधिकारियों और कर्मचारियों के पेंशन-कोष के लिए भी पैसा देते रहना होगा, जो यूरोपीय संघ के लिए काम करते रहे हैं या अब भी कर रहे हैं. कोई सहमति नहीं बनने पर यूरोपीय संघ या उसके एकल सदस्य देश ब्रिटेन पर मुकदमा चला सकते हैं.

अरबों का बिल बनेगा – यूरोपीय आयोग के अध्यक्ष जां क्लूद युंकर ने बीबीसी के साथ एक इंटरव्यू में कहा, ब्रिटेन को ‘50-60 अरब यूरो का बिल चुकाना पड़ेगा, हालांकि यही मुख्य प्रश्न नहीं है. हमें हिसाब लगा कर देखना है कि ब्रिटेन ने किन-किन मदों के लिए पैसा देने का वादा किया था, और तब पूरा बिल उसे चुकाना पड़ेगा.’ फ़ाइनेन्शियल टाइम्स ने हिसाब लगाया है कि ब्रिटेन को अतीत के अपने वादों के अनुसार यूरोपीय संघ की 2020 तक की कुछ भावी परियोजनाओं और कार्यों के लिेए 29 अरब यूरो, उसके औद्योगिक पुनर्गठन कोषों के लिए 17 अरब यूरो और यूरोपीय संघ के अधिकारियों-कर्मचारियों वाले पेंशन कोष के लिए आठ अरब यूरो देने होंगे. इस लेख के लेखक ने स्वीकार किया है कि ब्रिटेन ने यूरोपीय उपग्रह परियोजना गैलीलेओ के लिए पैसा देने से लेकर आयरलैंड या पुर्तगाल जैसे देशों द्वारा अपने पिछले ऋण नहीं चुका पाने पर उनकी सहायता के लिए आागे आने जैसे इतने सारे अनगिनत वचन दिये हैं, कि कोई नहीं जानता कि देनदारियों का असली आयाम कितना बड़ा होगा.

कामकाजी नागरिकों का क्या होगा?- आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, यूरोपीय संघ के शेष 27 देशों के लगभग 32 लाख नागरिक ब्रिटेन में रहते और काम-धंधा करते हैं. इसी प्रकार 10 लाख ब्रिटिश नागरिक यूरोपीय संघ के इन 27 देशों में रहते और काम-धंधा करते हैं. हर दिन क़रीब 30 हज़ार लोग अपने काम-धंधे के लिए ब्रिटेन और आयरलैंड गणराज्य के बीच की खुली सीमा पार करते हैं. यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के बीच तलाक हो जाने के बाद यह सीमा यूरोपीय संघ की एक बाहरी सीमा बन जायेगी. तब वह खुली सीमा नहीं रह पायेगी. इन सारे लोगों की क़ानूनी स्थिति और उनकी रोज़ी-रोजी का क्या होगा?

प्रवासी निवासियों के नाम पर दबाव

ऐसा लगता है कि ब्रिटिश सरकार यूरोप के अन्य देशों से आकर अपने यहां रह रहे प्रवासियों को यूरोपीय संघ के साथ वार्ताओं में दबाव डालने का हथकंडा बनाना चाहती है. वह स्पष्ट रूप से ऐसा कुछ भी कहने से बच रही है कि कौन वहां आगे भी रह सकता है और कौन नहीं. नागरिकता प्रप्त करने के नियमों को इतना जटिल, दफ्तरशाही और ख़र्चीला बना दिया गया है कि कई सदस्यों वाले परिवारों के लिए नागरिकता पाना असाध्य-सा हो गया है. नागरिकता के लिए आवेदन वे ही लोग कर सकते हैं जो कम से कम पांच साल से ब्रिटेन में वैध रूप से रह रहे हों.

इसे प्रमाणित करने के लिए 85 पृष्ठों का एक आवेदन फॉर्म भरना और कई तरह के प्रमाण देने होते हैं. फ़ार्म की फ़ीस है 65 पाउंड. सारे प्रमाणपत्र स्वयं जुटाने में जो ख़र्च आया वह अलग से. इसके बाद ‘ब्रिटेन में जीवन’ (लाइफ़ इन द यूके) नाम की एक परीक्षा (फ़ीस है 50 पाउंड) और अंग्रेज़ी भाषा (बी वन लेवल) की परीक्षा (फ़ीस 250 पाउंड) देनी पड़ती है. 85 पृष्ठों का फ़ार्म भरने में यदि कहीं कोई भूल-चूक नहीं हुई, सारे प्रमाण दिये जा सके और बाद की परीक्षाएं भी पास की जा सकीं, तब जा कर नागरिकता के लिए असली आवेदन किया जा सकता है. फ़ीस है 1200 पाउंड. ब्रिटिश पासपोर्ट मिलने तक क़रीब 1850 पाउंड केवल फ़ीस के रूप में ही ख़र्च हो जाते हैं. बिटिश दैनिक ‘द गार्डियन’ का अनुमान है कि वहां रहने वाले यदि सभी यूरोपीय प्रवासी अधिवास अनुमति (स्टे परमिट) या नागरिकता के लिए आवेदन करें, तो देश का पूरा प्रशासनिक ढांचा ही चरमरा जायेगा. काम के बोझ को संभालने के लिए कम से कम 6000 नए अधिकारियों व कर्मचारियों को भर्ती करना पड़ेगा. इस सब पर जो ख़र्च आयेगा, वह गगनचुंबी होगा!

प्रवासी अगले शरणार्थी बनेंगे

नागरिकता प्राप्त करने की भारी बाधाओं के कारण ब्रिटेन में लंबे समय से रह रहे अधिकांश यूरोपीय प्रवासी, यहां तक कि डॉक्टर और प्रोफ़ेसर भी, फिलहाल कुछ नहीं कर रहे हैं. जबकि यूरोपीय देशों में रह रहे ब्रिटिश प्रवासी स्थानीय देशों की नागरिकता प्राप्त करने में कहीं अधिक रुचि दिखा रहे हैं. बहुत संभव है कि 2019-20 तक यूरोप के जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैंड या स्वीडन जैसे दैशों को एक अनोखी शरणार्थी समस्या का सामना करना पड़े – ब्रिटेन से आ रहे यूरोपीय शरणार्थियों को अपने यहां रसाने-बसाने की समस्या का. ब्रिटेन भी इस बात पर गर्व नहीं कर सकेगा कि उसे लाखों ऐसे सुयोग्य लोगों की सेवाओं से वंचित होना पड़ा, जो यूरोपीय संघ को तलाक देने के बाद उसके लिए बड़े काम के रहे होते. यह भी निश्चित नहीं है कि इस तलाक के बाद ब्रिटेन यूरोपीय संघ के सीमारहित एकीकृत बाज़ार का लाभ उठाने के लिए उसके साथ जो मुक्त व्यापार समझौता चाहता है, वह कब और किन शर्तों पर हो पायेगा, हो पायेगा भी या नहीं! ब्रिटेन का ध्यान अभी इस ओर नहीं गया है कि वहां रह रहे यूरोपीय प्रवासियों का भाग्य उसके साथ मुक्त व्यापार समझौता हो पाने की कसौटी बन सकता है.

ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस के साथ यूरोपीय संघ के ‘तीन बड़ों’ में से एक हुआ करता था. अब वह अकेला हो जायेगा. यूरोपीय संघ में उसकी जगह इटली या स्पेन लेना चाहेंगे. इससे कुल मिला कर जर्मनी का वज़न और बढ़ेगा, पर साथ ही पूर्वी यूरोप के देशों में जर्मनी के प्रति असंतोष भी.