बाबरी विध्वंस मामले में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं- लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के खिलाफ सुनवाई फिर शुरू करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश से भाजपा के एक वर्ग में बेचैनी देखी जा रही है. खासकर इसलिए कि इन दोनों नेताओं में से आडवाणी को अगले राष्ट्रपति और जोशी को उपराष्ट्रपति पद का दावेदार माना जा रहा था. लेकिन अब इस नए घटनाक्रम से इन संभावनाओं को झटका लगा है.

द इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के मुताबिक भाजपा के कई नेताओं को इस पर ‘अचरज’ है कि केंद्र और उत्तर प्रदेश में पार्टी की सरकारें होने के बावजूद सीबीआई ने मामले की सुनवाई फिर शुरू कराने के लिए जोर लगाया. जबकि उसे शीर्ष अदालत में अपना रुख नरम करना चाहिए था. उन्हें इस पर भी हैरानी है कि सुप्रीम कोर्ट ने जब रायबरेली और लखनऊ में चल रहे अलग-अलग मामलों को जोड़कर एक साथ सभी की सुनवाई लखनऊ में करने का आदेश दिया तो भी सीबीआई ने एतराज नहीं जताया, जबकि एजेंसी इससे वाकिफ है कि रायबरेली की अदालत में चल रहे मामले की सुनवाई लगभग पूरी ही हो चुकी है और इस साल के अंत तक फैसला भी आ सकता है. लेकिन अब फिर नए सिरे से सुनवाई होने की वजह से भाजपा नेताओं को ‘नुकसान’ उठाना पड़ेगा, यह तय है.

हालांकि इस वर्ग की दलील यह भी है कि पार्टी के सभी नेता इस मामले में पाक-साफ साबित होंगे क्योंकि अगर कोई साजिश हुई भी होगी तो ये उसका हिस्सा नहीं थे. लेकिन फिर भी दो साल तक (सुप्रीम कोर्ट के फैसले के हिसाब से सुनवाई इतने समय में पूरी की जानी है) नैतिक आधार पर इन नेताओं की तमाम राजनीतिक संभावनाओं पर ग्रहण तो लगा ही रहेगा. यही पार्टी के इस वर्ग की बेचैनी की वजह है.

उधर, नवभारत टाइम्स में छपी खबर के मुताबिक कानून के कई जानकारों का मानना है कि इस मामले से आडवाणी और जोशी को राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने की संभावनाएं खत्म नहीं होतीं. क्योंकि संविधान में कहीं भी ऐसा नहीं है कि जिनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला चल रहा हो, वे चुनाव नहीं लड़ सकते. हालांकि, इन्हीं जानकारों में कुछ ऐसे भी हैं जो मानते हैं कि यहां सवाल नैतिकता का है. उनके मुताबिक ऐसे पदों के लिए उन लोगों को चुनाव नहीं लड़ना चाहिए जिनके खिलाफ दो समुदायों के बीच नफरत फैलाने का आरोप हो.