अभी दो दिन पहले हमारे एक जाने-माने गायक ने लाउडस्पीकर की वजह से बढ़ रहे शोर और ध्वनि-प्रदूषण की ओर हमारा ध्यान दिलाया है. लोक-दायरे में बहुत पहले से इस समस्या पर चर्चा होती रही है. लेकिन इस बार इस चर्चा ने इतना जोर स्पष्ट रूप से इसलिए पकड़ा है कि इसमें अजान को लेकर टीका-टिप्पणी की गई है. गायक ने स्पष्टीकरण भी दिया है कि उसने अजान के साथ-साथ हिंदू और सिख धर्मस्थलों में लाउडस्पीकर के दुरुपयोग की ओर भी ध्यान दिलाया है. सार्वजनिक जीवन में लोकप्रिय और सर्वप्रसिद्ध कोई व्यक्ति जब ऐसा कुछ कहता है, तो ऐसे मुद्दों की ओर सहज ही बड़े पैमाने पर लोगों का ध्यान जाता है. मीडिया द्वारा इसे सनसनीखेज बनाने की भी कोशिशें होती हैं. तात्कालिक रूप से इसका सियासी और सांप्रदायिक फायदा उठा ले जाने वाले भी तुरंत सक्रिय हो जाते हैं. पिछले कुछ समय से यह हमारी सामान्य सामाजिक प्रवृत्ति दिखाई देती है.

अजान पर की गई टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर अचानक ही कबीर का एक दोहा बहुत चर्चा में आ गया है. धार्मिक बाह्याचारों के संदर्भ में कबीर ने कहा था- ‘कांकर पाथर जोरि कै मस्जिद लई बनाय. ता चढि मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय॥’ यदि हम इस दोहे को शेयर कर रहे लोगों की ठीक से पहचान करें, तो पता चलता है कि ये स्वयं एक खास तरह की प्रवृत्ति से जुड़े हुए लोग हैं, जिन्हें कबीर के इस दोहे में सबसे आनंद वाली बात ‘मुल्ले का बांग’ देना लग रहा है. कबीर के बहाने ‘मुल्ले से बांग’ दिलवाकर शायद हम अपने सांप्रदायिक अहंकार की तुष्टि ही कर रहे हैं.

कबीर ने अपने साथ-साथ सबको एक ही पलड़े में तौला है - ‘आए हैं सो जाएंगे राजा रंक फकीर, एक सिंहासन चढ़ चले एक बंधे जंजीर’  

मुस्लिमों में स्वाभाविक रूप से इसकी प्रतिक्रिया हुई है. ऐसे कार्टून छप रहे हैं जिनमें अजान पढ़ रहे मुल्लों की तुलना बांग देते हुए मुर्गों से की जा रही है. जाहिर है मुस्लिम समाज के लोगों को इससे बुरा लगता होगा. लेकिन लोग अप्रत्य़क्ष रूप से यह कहकर बच निकल रहे हैं कि हम क्या करें, यह तो संत कबीर ने कहा था.

हम जानते हैं कि कबीर ने जब धर्मपंथों में व्याप्त पाखंड, बाह्याचार और अंधविश्वासों की ओर समाज का ध्यान दिलाना चाहा, तो उन्होंने केवल किसी एक धर्मपंथ पर कटाक्ष नहीं किया था. उन्होंने सामान्य रूप से सभी धर्मपंथों पर करुणा भरे व्यंग्य की भाषा में अपनी बातें कही हैं. जितना उन्होंने मुल्लों के समझाया, उतना ही पंडे-पुरोहितों को भी समझाया. उन्होंने तो अपनी तरह के साधुओं तक को समझाया. लेकिन उनके द्वारा किए गए कटाक्ष में द्वेष का कोई स्थान नहीं है. उनमें केवल करुणा है, प्रेम है, लोकमंगल के उद्देश्य से किया गया आह्वान है.

जो संत होता है, महात्मा होता है, वह किसी भी व्यक्तिविशेष या समुदायविशेष प्रति क्रोध, आवेश, आक्रोश, प्रतिक्रिया, घृणा इत्यादि से ग्रसित नहीं होता. उसके हृदय में सबके प्रति समान रूप से प्रेम, सहानुभूति और करुणा होती है. यदि वह किसी को फटकारता भी है, तो वह कबीर के ही शब्दों में ‘अन्तर हाथ सहार दै, बाहर मारै चोट’ जैसी फटकार होती है.

कबीर जैसे संतों के लिए क्या राजा लोदी, क्या बाभन बुद्धिनाथ, क्या बनिया बाबूलाल और क्या बुधिया रंक. उन्होंने अपने साथ-साथ सबको एक ही पलड़े में तौला- ‘आए हैं सो जाएंगे राजा रंक फकीर, एक सिंहासन चढ़ चले एक बंधे जंजीर’ या ‘एक दिन ऐसा होयगा, सबसे पड़ै बिछोह. राजा राना राव रंक सावध क्यों नहीं होय..’

और कबीर जैसे संत सांप्रदायिक विद्वेष के नहीं, बल्कि सांप्रदायिक सौहार्द्र के प्रतीक हैं. उन्होंने तो यह कहा,

‘भाई रे दुइ जगदीश कहां ते आया, कहु कौने बौराया.

अल्लाह राम करीमा केशव, हरि-हजरत नाम धराया..

वोही महादेव वोही मोहम्मद, ब्रह्मा आदम कहिये.

को हिन्दू को तुरुक कहावे, एक जिमी पर रहिये..’

संतों का वचन हमें ऊपर-ऊपर से सामाजिक या राजनीतिक निहितार्थों वाला दिखाई देता हो भले, लेकिन अपने शुद्ध रूप में, अपने मौलिक रूप में, वह नितांत आध्यात्मिक होता है. वह तो हम जैसे सीमित साधना वाले लोग हैं, जो वहां तक पहुंच नहीं पाते. एक जाति, जाति-समूह या धर्मपंथ को दूसरी जाति, जाति-समूहों या पंथ के खिलाफ एक खड़ा करके राजनीतिक और सामाजिक व्याख्या अपेक्षाकृत आसान होती है. हम सबके अपने व्यक्तिगत अनुभव और अपनी वृत्तियों की वजह से वह हमें सुहाता भी है. इसलिए हम कबीर को भी जब-तब सामुदायिक संघर्ष के नज़रिए से देखने लगते हैं. जबकि आध्यात्मिक साधना से निकला स्वर अपने आप में हद दर्जे का क्रांतिकाराना स्वर होता अवश्य है, लेकिन उसका लक्ष्य कोई व्यक्तिविशेष या समुदायविशेष या पदविशेष नहीं होता, बल्कि मनुष्य की मौलिक वृत्तियां होती हैं.

किसी जमाने में बिना-सोचे समझे वामपंथियों ने भी कबीर को अपना ‘कॉमरेड’ बनाने की कोशिश की थी. लेकिन आध्यात्मिकता के प्रति दुराग्रह के चलते ऐसे लोगों ने अब कबीर से कन्नी काट ली है  

पिछले कुछ दशकों में कबीर को एक राजनीतिक क्रांतिकारी साबित करनेवाली एक धारा सक्रिय रही है. आज दिनानुदिन प्रतिक्रियावादी होते जा रहे अस्मितावादी उभारों ने भी कबीर के राजनीतिक अपहरण की कोशिश शुरू कर दी है. एक तरफ जहां उन्हें ‘जुलाहा’ जाति का साबित कर ओबीसी आंदोलन उन्हें हड़पने की तैयारी में है, वहीं दलित विमर्श भी उन्हें आध्यात्मिक कम और राजनीतिक ज्यादा साबित करने पर तुला हुआ है. किसी जमाने में बिना-सोचे समझे हमारे वामपंथी मित्रों ने भी कबीर को अपना ‘कॉमरेड’ बनाने की कोशिश की थी. लेकिन आध्यात्मिकता के प्रति दुराग्रह के चलते ऐसे लोगों ने अब कबीर से कन्नी काट ली है.

यह जरूर है कि कबीर जैसे संतों को भी समाज से और शासन से दुत्कार और प्रताड़ना मिली हो सकती है, जो स्वाभाविक ही है. ‘सांच कहौं तो मारन धावै’ उन्होंने यूं ही नहीं कहा होगा. लेकिन फिर भी कबीर जैसे संतों को को किन्हीं समुदायों के खिलाफ खड़ा करके राजनीतिक धारा में नहीं घसीटना चाहिए. उनके हृदय में तो कथित ‘ब्राह्मणों’ तक के लिए समान रूप से करुणा का भाव था- ‘धर्म करै जहां जीव बधतु हैं, अकरम करै मोरे भाई. जौं तोहरा को ब्राह्मण कहिए, काको कहिए कसाई..’ और फिर ‘न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर’ या ‘घट-घट में वह साईं बसतु हैं’ वाले कबीर के प्रेम और करुणा की इंतहा तो यह थी कि उन्हें कोई दूसरा भी ‘दूसरा’ नहीं लगता था. तभी तो उन्होंने कहा होगा- ‘मैं लागा उस एक से एक भया सब मांही. सब मेरा मैं सबन का तिन्हा दूसरा नाहीं..’

लेकिन हमारे-आपके जैसे लोग जब अपने द्वेष और अहंकार की तुष्टि के लिए कबीर या अन्य संतों के शब्दों का प्रयोग करने लगते हैं, तो जाने-अनजाने उन्हें किसी जाति-विशेष, पंथ-विशेष अथवा संप्रदाय-विशेष के खिलाफ खड़े करने का कुप्रयास करते हैं. इससे न केवल उन संतों के प्रति लोगों में गलतफहमी, खीज और अश्रद्धा उत्पन्न होती है, बल्कि इससे सामनेवाले से जिस सुधार की हम अपेक्षा कर रहे होते हैं उसका ठीक उल्टा होता है. कारण कि उन समुदायों के प्रति कहीं न कहीं हमारे मन के किसी चोर कोने में द्वेष और पूर्वग्रह भरा होता है. बात भले ही हम किन्हीं संत के हवाले से कह रहे हों, लेकिन हमारा अपना द्वेष और पूर्वग्रह साफ जाहिर हो जाता है. इसलिए वह बात अपनी जगह सही होकर भी वांछित असर पैदा करनेवाली नहीं हो पाती.

क्योंकि इसी चालाकी का इस्तेमाल करते हुए यदि लोग आपके ‘धर्मपंथ’ के ऊपर कबीर की कही गई बातें चुटकुले और उपहास के रूप में रोजाना शेयर करने लग जाएं, तो आपके मन में भी केवल खीज ही पैदा होगी  

आज जब हम तीन तलाक की बात करते हैं, गौरक्षा की बात करते हैं, ध्वनि-आतंक की बात करते हैं और इसे हथियार बनाकर किसी संप्रदाय के खिलाफ मोर्चा खोल देते हैं, तो होता क्या है? होता यह है कि यह फिर नारी कल्याण, पशु-सुधार और ध्वनि प्रदूषण का मुद्दा नहीं रहकर, एक शरारतपूर्ण और हिंसक ढकोसला बनकर रह जाता है. यह किसी संप्रदायविशेष को जलील करने, मुंह चिढ़ाने और नीचा दिखाने का उपक्रम बन जाता है. और यही बात अन्य संप्रदायों द्वारा हिंदुओं, ईसाइयों और बौद्धों इत्यादि के प्रति किए जाने वाले चिढ़ाऊ प्रयासों के बारे में भी कही जा सकती है. लेकिन इससे हासिल क्या होता है? इससे संप्रदायों में केवल आपसी घृणा बढ़ती है, तनाव और अविश्वास बढ़ता है. असल मुद्दा और उद्देश्य अपने रास्ते से भटक जाता है, और कुछ का कुछ हो जाता है. गांव-मोहल्ले में भीड़तंत्र और सोशल मीडिया पर ट्रोलतंत्र इसे अपनी गिरफ्त में ले लेता है. सियासतदान राजनीतिक नफा-नुकसान के आधार पर अपना रुख तय करने लगते हैं. और टीवी स्टूडियो की नाटकीय प्रस्तुतियां हमारी संवेदनाओं को भोथरा करती जाती हैं.

1920 में चंपारण के अपने दूसरे दौरे में महात्मा गांधी बेतिया के उस गोशाला में भी गए जिसकी स्थापना उन्होंने 1917 में स्वयं की थी. इस गोशाला में अपने संबोधन में उन्होंने बड़े मार्के की बात कही. गोरक्षा के मुद्दे पर उनका कहना था - ‘हमने (हिंदुओं ने) अपने बर्ताव से गोहत्या को मुसलमानों का फर्ज बना दिया है.’ मतलब यह कि जब आप किसी संप्रदाय के साथ शत्रुतापूर्ण रवैया अपनाएंगे, तो वे भी प्रतिक्रिया में आपकी दुखती रग पर हाथ रख सकते हैं.

किसी निर्माणीधीन ‘राष्ट्र’ में एक संप्रदाय द्वारा दूसरे संप्रदाय को चिढ़ाने का खेल खतरनाक होता है. आज हमारी ‘भावना’ रुई के फाहे की तरह नाजुक हो गयी है. वह सड़ी हुई नारंगी की तरह पिलपिली हो गई है. किसी के भी छूने मात्र से यह आहत हो जाती है. ‘धर्मपंथ’ इतना कमजोर हो गया है कि उसकी रक्षा के लिए ईशनिंदा कानून बनाने पड़ते हैं. अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक विवाहों को जिहाद और फसाद में बदलते देर नहीं लगता.

ऐसे में, संतों की वाणी के मामले में हमें और भी सतर्क रहना चाहिए. कम से कम उन्हें और उनके शब्दों को तो अपने संकीर्ण दायरों से ऊपर रखें. क्योंकि इसी चालाकी का इस्तेमाल करते हुए यदि लोग आपके ‘धर्मपंथ’ के ऊपर कबीर की कही गई बातें चुटकुले और उपहास के रूप में रोजाना शेयर करने लग जाएं, तो आपके मन में भी केवल खीज ही पैदा होगी. आप समझ नहीं पाएंगे कि किसी संत ने ऐसा करुणा के वश होकर कहा था, द्वेष के वश होकर नहीं. आप में कोई सकारात्मक परिवर्तन होने के बजाए केवल प्रतिक्रिया ही पैदा होगी. और उस संत के प्रति गलतफहमी और अश्रद्धा उत्पन्न होगी सो अलग.

एक संप्रदाय जब केवल दूसरे संप्रदाय के छिद्राण्वेषण और सुधार में अपना समय और अपनी ऊर्जा लगाने लगता है, तो स्थिति वैसी ही हो जाती है जिसे हम ‘चलनी दूसे सूप को जिसमें बहत्तर छेद’ का चरितार्थ होना कहते हैं  

तो ऐसी स्थिति में करें क्या? क्या जरूरी मुद्दों पर भी चुप रह जाएं? महिलाओं की स्थिति में सुधार और ध्वनि-प्रदूषण जैसे विषयों पर भी न बोलें? अवश्य बोलें, लेकिन निरपेक्ष भाव से बोलें तो ज्यादा असर पैदा करेगा. नहीं तो हर बात की तरह हिंदू बनाम मुस्लिम और बाभन बनाम दलित में उलझ जाएंगे. गांधी ने इसका एक तरीका सुझाया था. जब दलितों के मंदिर में प्रवेश के लिए केरल में वाइकोम मंदिर सत्याग्रह शुरू हुआ तो गांधी ने मलयाली अखबार अल-अमीन के संपादक अब्दुर रहीमान को इस सत्याग्रह में शामिल नहीं होने की सलाह दी. ठीक इसी तरह उन्होंने साप्ताहिक पत्र ‘यंग इंडिया’ के संपादक जॉर्ज जोसेफ को भी इस आंदोलन में सीधे सत्याग्रही के तौर पर नहीं जुड़ने की सलाह दी. सिखों को भी वहां अपना लंगर लगाने से मना किया.

इस बारे में अपनी स्थिति को साफ करते हुए 8 मई, 1924 को यंग इंडिया में गांधी ने लिखा- ‘मुझे लगता है कि वाइकोम सत्याग्रह अपनी मर्यादाएं भंग करने लगा है. मैं तो यह चाहता हूं कि सिख यहां अपना लंगर लगाना बंद कर दें और यह आंदोलन सिर्फ हिंदुओं तक सीमित रहे. यदि मालाबार के हिंदू सुधारक गैर-हिंदुओं की सहानुभूति के अलावा और किसी प्रकार की सहायता अथवा हस्तक्षेप स्वीकार करेंगे तो सारे हिंदू समाज की हमदर्दी खो बैठेंगे. ...वाइकोम में यदि अहिंसापूर्ण तरीकों से विजय हासिल की गई तो इसमें शक नहीं कि पण्डे-पुजारियों द्वारा फैलाए गए अन्धविश्वासों के गढ़ की नींवें आमतौर पर हिल जाएंगी. ...लेकिन अगर ईसाई, मुसलमान, अकाली और इन हिंदू-सुधारकों के सभी गैर-हिंदू मित्र भी कट्टरपंथी हिंदुओं के खिलाफ प्रदर्शन करने लगें. इन सुधारकों की रुपये-पैसे से मदद करने लगें और अंत में उन्हें आतंकित करके उन पर हावी हो जाएं, तो हिंदू धर्म का क्या होगा? क्या हम इसे सत्याग्रह कह सकेंगे? क्या सनातनी लोगों के घुटने टेक देना स्वेच्छा-प्रेरित कहा जाएगा? क्या उसे हिंदू धर्म में सुधार कहेंगे?’

कहने का मतलब यह कि एक संप्रदाय जब केवल दूसरे संप्रदाय के छिद्राण्वेषण और सुधार में अपना समय और अपनी ऊर्जा लगाने लगता है, तो स्थिति वैसी ही हो जाती है जिसे हम ‘चलनी दूसे सूप को जिसमें बहत्तर छेद’ का चरितार्थ होना कहते हैं. किसी फिल्मी संवाद का सहारा लेकर कहें तो जिनके खुद के घर शीशे के होते हैं, उन्हें दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंकना चाहिए. हम पहले अपने घर, अपने समुदाय, अपने संप्रदाय को ऐसा आदर्श बनाएं कि हमारा पड़ोसी भी वैसा ही बनना चाहे. यदि समालोचना करनी ही हो, तो उसके लिए पहले निरपेक्ष नजरिए का विकास करना चाहिए. स्वयं में आत्मालोचना का साहस पैदा करना चाहिए. और जैसा कि उचित है कि शुरुआत हमेशा अपने घर, समुदाय या संप्रदाय से करनी चाहिए.

कबीर जैसे करुणावान लेकिन कटु सत्य बोलनेवाले महात्माओं को तो आज हम एक पल के लिए भी बरदाश्त न कर पाते. शायद जीने भी नहीं देते  

आज भारत का बहुसंख्यक संप्रदाय आत्महीनता का शिकार हुआ लगता है. ठीक इसी तरह यहां के अल्पसंख्यक समुदाय भी विक्टिमहुड या पीड़ितपने का शिकार दिखाई देते हैं. इन दोनों को ही इन दोनों प्रकार के आग्रहों से बाहर निकलना होगा. तभी कोई वास्तविक संवाद भी संभव होगा. अभी क्या है कि यदि हमने गौरक्षा के नाम पर चल रही विवेकहीन हिंसा पर विनम्रतापूर्वक भी कुछ कहा, तो इसे ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ का नाम दे दिया जाएगा. ठीक इसी तरह यदि हमने भूले से भी भारतीय परंपरा का जिक्र कर दिया, तो इसे ‘हिंदू पुष्टिकरण’ का नाम दे दिया जाएगा. ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है कि हमने उदारता, तटस्थता और अनेकांतता के नजरिए से विचारों और घटनाओं को देखना बंद कर दिया है.

इसलिए जिन संतों ने खुद को तपाकर अपनी आध्यात्मिक अनुभूति से सत्य का साक्षात्कार किया. जिनका हृदय प्राणिमात्र के लिए करुणा से भर गया. उनकी वाणी को भी गाली के रूप में इस्तेमाल करने की चेष्टा करने लगते हैं. इससे अपनी आध्यात्मिक और नैतिक क्षति तो होती ही है, देश और समाज का भी लाभ होने के बजाय नुकसान ही होता है. इसलिए संतों और उनकी वाणियों के प्रति अवसरवादी किस्म का प्रेम पालने के बजाय हमें सबके प्रति अनंत और शर्तरहित प्रेम की ओर बढ़ना पड़ेगा.

कबीर जैसे संतों के कंधे पर रखकर अपनी द्वेषपूर्ण भड़ास वाली बंदूक किसी एक संप्रदाय के खिलाफ चलाने का प्रयास वैसा ही होगा, जिसे अंग्रेजी में ‘डेविल क्वोटिंग बाइबल’ (शैतान खुद ही बाइबिल बांचने लग जाए) वाली स्थिति कहते हैं. हमें अपने भीतर के उस शैतान को पहचानकर उसे निकाल बाहर करना होगा. संत और उनकी वाणी इसी में तो हमारी मदद करते हैं.

हमसे भले तो हमारे पूर्वज मालूम होते हैं, जिन्होंने संतों की कटु वाणियों को भी शिरोधार्य किया, उनसे मार्गदर्शन लिया. कबीर जैसे करुणावान लेकिन कटु सत्य बोलनेवाले महात्माओं को तो आज हम एक पल के लिए भी बरदाश्त न कर पाते. शायद जीने भी नहीं देते. जबकि किंवदंतियों में ऐसा कहा जाता है कि कबीर के शव को अपनाने के लिए हिंदू और मुसलमान दोनों ही लड़ पड़े थे. 1655 की आईन-ए-अकबरी वाली पांडुलिपि में कबीर की स्वाभाविक मृत्यु और शव को दफनाने और जलाने को लेकर ‘ब्राह्मणों ’ और मुसलमानों के बीच विवाद का जिक्र है. लिखा है- ‘चूं खानए उस्तुख्वानी वा परदाख्त बरहमन बसोख्तन रू आर्बूद वा मुसलमान बगोरिस्तान बुर्दन.’

और आज हम कहां से कहां आ गए. कबीर जैसे संतों को भी गालीबाज बनाए जाते हैं.