इकबाल को एक ऐसा शायर भी कहा जा सकता है जो वतनपरस्त से मज़हबपरस्त हो गया. इसकी तरंग में उन्होंने कुछ समय के लिए उर्दू में लिखना छोड़ दिया था. यह उस दौर की बात है जब उन्हें महसूस हुआ कि अगर अपनी बात इस्लाम को मानने वालों तक पहुचाना है तो फ़ारसी में लिखना होगा. उन्होंने उर्दू को मुसलमानों की ज़ुबान मानने से इंकार कर दिया था. सही भी है. जुबानें मजहबों की नहीं, इलाकों की होती हैं. भाषाएं संस्कृति का हिस्सा हैं जो राष्ट्रीयता नहीं मानतीं

लेकिन उर्दू को मुसलमानों की ज़ुबान न मानने के पीछे इकबाल की कोई बड़ी सोच नहीं थी. दरअसल इकबाल सरीखे लोगों ने भाषाओं को भी राजनैतिक सरहदों में बांध दिया. इससे उर्दू का नुकसान ही हुआ. आज हालात ये हैं कि उर्दू बोलने वाले के बारे में यह मान लिया जाता है कि वह मुसलमान ही होगा.

मुहम्मद इकबाल या अल्लामा इकबाल की पैदाइश ग़ालिब के इंतेकाल के कोई आठ साल बाद हुई. यह वह दौर था जब हिंदी और उर्दू में लड़ाई चल रही थी. सर सैयद अहमद खान उर्दू की पैरवी कर रहे थे तो मदन मोहन मालवीय और भारतेंदु हरिश्चंद्र सरीखे दिग्गज हिंदी के खैरख्वाह बने हुए थे. इस सबके बीच राष्ट्रीयता का भी उभार हो रहा था.

इकबाल के पूर्वज सप्रू गोत्र के कश्मीरी ब्राहमण थे, जिन्होंने इस्लाम क़ुबूल कर लिया था. उनके पूर्वज कारोबार के सिलसिले में जम्मू से पंजाब के सियालकोट में आकर बस गए थे. सियालकोट से मैट्रिक पास करके इकबाल लाहौर आये और वहां सरकारी कॉलेज में दाखिला ले लिया. यहीं उनकी मुलाकात अंग्रेज़ प्रोफेसर अर्नाल्ड से हुई जो अरबी-फ़ारसी के विद्वान थे. अर्नाल्ड ने उनके ज़हन पर काफी असर डाला और इकबाल का उनसे जिंदगी भर राब्ता रहा.

शायरी का जुनून और राष्ट्रवाद

लाहौर उन दिनों इल्म-ओ-अदब का गढ़ था. यहां मुशायरों की धूम होती थी. आहिस्ता-आहिस्ता इकबाल ने उन मुशायरों में शिरकत शुरू कर दी. उनके हुनर से मुतास्सिर होकर ‘ऑबसर्वर’ रिसाला (पत्रिका) के पहले मुदिर (एडिटर) शेख अब्दुल कादिर ने लिखा - ‘मैंने उन्हें पहली मर्तबा लाहौर के एक मुशायरे में उन्हें देखा. इस बज़्म में उन्हें उनके चंद हम-जमाअत (सहपाठी) खींच लाये थे और उन्होंने कह-सुनकर एक ग़ज़ल भी उनसे पढ़वाई. उस वक़्त लाहौर में लोग इकबाल के नाम से वाबस्ता (परिचित) नहीं थे. छोटी सी ग़ज़ल थी. सादा से अलफ़ाज़, ज़मीन भी मुश्किल न थी. मगर कलाम में शोखी और बेसाख्तापन (नयापन) मौजूद था. बहुत पसंद की गयी. इसके बाद दो-तीन मर्तबा इसी मुशायरे में उन्होंने ग़ज़ल पढ़ी और लोगों को इल्म हुआ कि एक होनहार शायर मैदान में आया है. मगर यह शोहरत पहले-पहल बाज़ ऐसे लोगों तक महदूद रही जो तालीमी मशागिल (पेशे) से ताल्लुक रखते थे. इतने में एक अदबी (साहित्यिक) मजलिस (बैठक) कायम हुई जिसमें महाशीर (उस तरह के लोग) शरीक होने लगे और नज़्म व नस्र (ख्याल) के मज़ामीन (विषय) की इसमें मांग हुई. शेख मुहम्मद इकबाल ने उसके एक जलसे में अपनी वह नज़्म जिसमें ‘कोह हिमाला’ से खिताब है पढ़कर सुनाई. उसमें अंग्रेजी ख़यालात थे और फ़ारसी बंदिशें. इस पर ख़ूबी ये कि वतनपरस्ती की चाशनी उसमें मौजूद थी. मजाके-ज़माना और ज़रुरियाते वक्त के मवाकिफ (मुताबिक) होने के सबाब बहुत मकबूल हुई...’

यूं तो इकबाल ने ग़ज़ल कहना स्कूल के ज़माने से ही शुरू कर दिया था. शुरू में वे अपनी ग़ज़लें दुरुस्त करवाने के लिए डाक से उस्ताद दाग़ देहलवी के पास भेजते थे. हज़रत दाग़ को जल्द ही इकबाल के हुनर का अंदाज़ा हो गया और दो-चार ग़ज़लें देखने के बाद ही लिख दिया कि इनमे सुधार की गुंजाइश नहीं है. सोचिये, दाग़ देहलवी जैसा नामचीन उस्ताद एक नए शायर के बारे में यह कहे तो कितनी बड़ी बात होगी.

लाहौर के माहौल में इकबाल की सोच पुख्ता हुई और अब वे देश-दुनिया, मजदूर क्रांति और समाजवाद की बातें करने लगे. वे ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा’ लिखते हैं. वे मज़हबी पाबंदियों और रूढ़ियों को पसंद नहीं करते और वतनपरस्ती को उनसे ऊपर रखते हुए लिखते हैं. यहां तक तो सब ठीक ही नज़र आता है पर जब वे विलायत पढ़ने जाते हैं तो किस्सा बदल जाता है.

विलायत में पढ़ाई और ज़हनी तलातुम (उथल-पुथल)

इकबाल 1905 में आगे पढ़ने के लिए यूरोप चले गए. उन्होंने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से बीए और जर्मनी की लुडविग मैक्सिमिलन यूनिवर्सिटी से दर्शन में डॉक्टरेट किया. इंग्लैंड में उन्हें फिर प्रोफ़ेसर अर्नाल्ड का साथ मिला. विलायत में पढ़ने के दौरान उनमें एक ख़ास परिवर्तन आया - वहां के माहौल ने इकबाल के ज़ेहन पर इस कदर असर डाला कि जिस राष्ट्रवाद को वे अपना सबसे बड़ा मज़हब मानते थे, उस पर से उनका यकीन उठ गया. उन्हें लगा कि साम्राज्यवाद के हितों को साधने के लिए ‘राष्ट्रवाद’ का चोला पहना दिया जाता है. और जहां ‘तराना-ए-हिंद’ में वे हिंदुस्तान को सारे जहां से अच्छा बताते हैं, ‘तराना-ऐ-मिल्ली’ में लिखते हैं:

‘चीन-औ-अरब हमारा, हिंदोस्तां हमारा,

मुस्लिम हैं हम वतन हैं, सारा जहां हमारा.’

इकबाल और द्विराष्ट्र का सिद्धांत

इलाहाबाद में 29 दिसंबर, 1930 के दिन इकबाल ने मुस्लिम लीग के अध्यक्ष के तौर पर भाषण में ‘द्विराष्ट्र सिद्धांत’ का मसला हवा में उछाला था. उनके भाषण के अंश हैं - ‘मैं चाहता हूं पंजाब, उत्तर-पश्चिम सीमांत, सिंध, बलूचिस्तान को मिलाकर एक राज्य बनाया जाए. स्वायत्य शासन की सरकार बने, चाहे हुकूमते बर्तानिया के झंडे के नीचे या अलग. उत्तर-पश्चिम में मुसलमान राज्य की स्थापना मुझे अब आख़िरी मंज़िल आती है...’

इसकी तक़रीर में उन्होंने सदियों के हिंदू-मुसलमान भाईचारे को इतर रखकर कहा कि ’ न हमारे ख़यालात एक हैं, न रिवाज़, तारीख में दर्ज जो लोग हमारे आदर्श हैं वो हिंदुओं के नहीं और जो उनके हैं, वो हमारे नहीं.’ कुछ ऐसी ही बात हिंदू संगठन भी कह रहे थे. मुल्क अब बस कुछ ही साल दूर था आज़ादी से. हवाएं तेज़ हो चली थीं. कौमी रंग हर चेहरे पर नुमायां हो रहा था. सरमायेदार बनने के लिए हर कोई बेचैन था. सबको अपना-अपना हिस्सा चाहिए था. मुल्क किसी को नहीं. रह गए थे तो बस मोहनदास करमचंद गांधी ‘खान’ और अब्दुल गफ्फार खान ‘गांधी’ सरीखे चंद लोग.

इकबाल के दो ख़ास कलाम ‘ज़र्बे-कलीम’ और ‘बाल-ऐ-जिब्रील’ बड़े मशहूर हुए पहले में उन्होंने आधुनिक व्यवस्था के ख़िलाफ़ जंग का ऐलान किया. लोगों ने उन पर समाजवादी होने का इल्ज़ाम लगाया जिसे उन्होंने मना कर दया. ज़ाहिर है, समाजवाद ख़ुदा की सत्ता को नहीं मानता और इस्लाम ख़ुदा के इर्द गिर्द बुना गया तानाबाना है. फैज़ अहमद फैज़ तो पक्के सोशलिस्ट थे, पर वो भी इस सवाल पर चुप्पी खींच गए.

‘बाल-ए-जिब्रील’ में इकबाल ने ‘उम्माह’ में यकीन करने का आह्वान किया. दरअसल, इकबाल ने इस्लाम ही को अपना मुल्क मान लिया था. ओटोमन राज्य के बिखरने से आज़ाद हुए बाल्कन राज्यों पर ख़ुश होने के बजाय वे अफ़सोस ज़ाहिर करते हैं और ख़ुदा से ‘शिकवा’ करते हैं कि जो मुसलमान एकेश्वरवाद के लिए खड़े हुए थे, आज इस तरह क्यूं हार रहे हैं? क्यूं वो पिछड़े हुए हैं? और अगर ये हाल रहा तो कोई उनका नाम लेने वाला न रहेगा. बाद में उन्होंने ‘जवाब-ऐ-शिकवा’ लिखा जिसमें इस्लाम को मानने वालों को अपने डर, ग़ुरबत, पिछड़ेपन से लड़ने के लिए हौसला दिया.

भारत में आज उर्दू दिवस मनाया जा रहा है. हमने उर्दू को इकबाल के जन्म से जोड़कर शायद ग़लत किया है. इकबाल ने उर्दू के विकास के लिए कोई ख़ास काम नहीं कियाब बल्कि इसका नुकसान ही किया है. उन्होंने इसे हिंदुस्तान से उखाड़कर कहीं और लगाने की कोशिश में लगभग ख़त्म ही कर डाला है. कहा जाता है कि देव नारायण पांडे ओर जय बहादुर सिंह ने उर्दू को उसका सही मुक़ाम दिलाने की जंग की थी. उर्दू में इकबाल से ज़्यादा तो मीर तकी मीर ने लिखा है, ग़ालिब भी उर्दू के नामचीन शायर हुए हैं. नज़ीर की लगभग पूरी ग्रंथावली उर्दू ही में है. वहीं इकबाल का ज़्यादातर काम फ़ारसी में है. ऐसे में उर्दू को किसी एक शख्स से जोड़कर, वह भी जिसने इसका नुकसान ही किया हो, हम दुनिया की सबसे बेहतरीन ज़ुबानों में एक का भला नहीं कर रहे.