कुछ समय पहले खबर आई थी कि आईआईटी कानपुर के छात्रों द्वारा मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्म ‘हम देखेंगे’ गाए जाने के मामले की जांच होगी. आईआईटी के छात्रों ने यह नज़्म नए नागरिकता कानून का विरोध करते दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के छात्रों के समर्थन में गाई थी. इसके खिलाफ एक शिकायत की गई थी. इसमें कहा गया था कि फ़ैज की इस नज़्म में कुछ ऐसे शब्द हैं जो हिंदुओं की भावनाओं को आहत कर सकते हैं.

करीब साढ़े तीन दशक पहले भी इस नज़्म से भावनाएं आहत होने का डर था. फर्क बस इतना है कि यह डर सरहद पार था. किस्सा यूं है कि 1985 में पाकिस्तान के फौजी आमिर (डिक्टेटर) ज़िया-उल-हक़ ने मुल्क में कुछ पाबंदियां लगा दी थीं. इनमें औरतों का साड़ी पहनना और शायर फैज़ अहमद फैज़ के कलाम गाना शामिल था. दोनों ही बातें निहायत ही बचकाना थीं. तब एक गायिका जिनका नाम इकबाल बानो था, उन्होंने इन फैसलों की मुख़ालफ़त करने की ठान ली और ऐलान करवा दिया कि अमुक रोज़ वे इन पाबंदियों को तोड़ देंगी. इसके लिए उन्होंने लाहौर स्टेडियम का इंतेख़ाब किया.

तयशुदा दिन स्टेडियम में ख़ास इंतज़ाम किये गए थे- हुक्मरानों ने इकबाल बानो को रोकने के लिए और उन्होंने इसकी मुखालफ़त के लिए. शाम का वक़्त था. तकरीबन पचास हज़ार सामईन (दर्शक) इस वाक़ये के गवाह बनने के लिए हाज़िर हो गए.

उस रोज़ काली साड़ी पहने इकबाल बानो निहायत खूबसूरत लग रही थीं. उन्होंने माइक संभाला और अपनी खनकदार आवाज़ में फ़रमाया; ‘आदाब!’ स्टेडियम गूंज उठा. चंद सेकंड बाद उन्होंने फिर कहा; ‘देखिये, हम तो फैज़ का कलाम गायेंगे और अगर हमें गिरफ्तार किया जाए तो मय साजिंदों के किया जाए जिससे हम जेल में भी फैज़ को गाकर हुक्मरानों को सुना सकें!’ स्टेडियम सन्न रह गया था. फिर जब तबले बोल उठे, शहनाई गूंज उठी तो बानो गा उठीं - ‘हम देखेंगे, लाजिम है कि हम भी देखेंगे...’ यह फैज़ अहमद फैज़ की माक़ूल नज्मों में से एक थी.

इस नज़्म में बीच में आता है - ‘सब ताज उछाले जाएंगे, सब तख़्त गिराए जाएंगे’, तो एक लाख हाथों ने आपस में मिलकर वह शोर मचाया कि स्टेडियम गूंज उठा. तकरीबन दस मिनट तक तालियों की गडगडाहट सुनाई दी. पाबंदियों की धज्जियां उड़ाकर रख दी गयी थीं. माहौल में गर्मी देखकर पुलिस की हिम्मत नहीं हुई उन्हें गिरफ्तार करने की. इस कदर बेख़ौफ़-ऐ-ख़तर थीं इकबाल बानो.

इकबाल बानो का जन्म 27 अगस्त, 1935 को दिल्ली में हुआ था. उनके वालिद मूलतः रोहतक के रुबाबदार ज़मींदार थे जिनके पास अच्छी-खासी ज़मींदारी थी. कहते हैं, घर में खुला माहौल था. उन्होंने बानो को दिल्ली घराने के उस्ताद चांद खान की शागिर्दी में कर दिया. उस्ताद ने उनके हुनर को बखूबी तराशा. उनको दादरा और ठुमरी की ज़बरदस्त ट्रेनिंग दी गयी. बताते चलें कि दिल्ली घराना इस मुल्क के सबसे पुराने घरानों में से एक है.

1950 में एक रोज़ जब दिल्ली में ऑल इंडिया रेडियो को कुछ नए गायकों की ज़रूरत हुई तो उस्ताद अपनी शागिर्द को ले गए और ऑडिशन करवाया. इसके पहले ऑडिशन खत्म होता, बानो को गाने का कॉन्ट्रैक्ट मिल चुका था. बस यहीं से उनके सितारा बनने का सफ़र हो गया.

बानो जब 17 साल की हुईं तो उनका पाकिस्तान के सूबे मुल्तान के एक ज़मींदार से निकाह हो गया. मेहर की रस्म में उनके वालिद ने बानो को ताजिंदगी गाने देने का अहद लिया उनके शोहर से. शोहर ने भी इस अहद को बाकमाल खूब निभाया. 1955 के आते-आते इकबाल बानो शोहरत की बुलंदी पर थीं. उर्दू फिल्में जैसे गुमनाम, क़त्ल, इश्क-ए-लैला और नागिन में उनके गए नगमे खूब हिट हुए.

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पर इकबाल बानो का असल हुनर तो क्लासिकल गायकी जैसे - ठुमरी, दादरा में था. किसी ने उनको सलाह दी कि उनकी आवाज़ गज़लों पर खूब फबेगी. बस फिर क्या था? उनके सफर में एक और राह जुड़ गई. ग़ज़ल सुनने वालों ने उनकी गायकी के अंदाज़ को ख़ूब पसंद किया. उनका शेर पढने का अंदाज़, शेर के अलग-अलग माने कहना और बेगम अख्तर की तरह लफ़्ज़ों के उच्चारण पर ख़ास ध्यान देना, सुनने वालों को बेइंतहा भाया.

1970 में इकबाल बानो के शोहर का इंतकाल हो गया. इसके बाद वे मुल्तान से लाहौर चली आईं और फिर यहीं की होकर रह गयीं. इस दौर में फैज़ अहमद फैज़, नासिर काज़मी (दिल में एक लहर सी उठी है अभी...) जैसे शायरों के कलाम उन्होंने तसल्लीबख्श गाये जो खूब पसंद भी किये गए. कहते हैं कि फैज़ की नज़्म ‘हम देखेंगे’ को गाकर इकबाल बानो ने इस नज्म को और इस नज़्म ने इकबाल बानो को अमर कर दिया. 1974 में उन्हें पाकिस्तान सरकार ने ‘तगमा–ए-इम्तियाज़’ से नवाज़ा.

फिर ये किस्सा यूं ख़त्म हुआ कि चंद रोज़ वे बीमार रहीं और 21 अप्रैल, 2009 में लाहौर में उनका इंतेकाल हो गया. लेकिन उनके सुनने वालों के लिए इकबाल बानो हमेशा हैं और रहेंगी.