पाकिस्तान में दाखिल होने से पहले झेलम नदी कश्मीर के बारामूला को दो हिस्सों में बांटती जाती है. झेलम के दक्षिणी छोर पर ‘न्यू बारामूला’ बसा है जबकि उत्तरी छोर पर बसा इलाका ‘ओल्ड टाउन’ कहलाता है. ‘ओल्ड टाउन’ में दाखिल होते ही साफ हो जाता है कि यह इलाका अब अलगाववादियों का गढ़ बन रहा है.

‘ओल्ड टाउन’ को ‘न्यू बारामूला’ से जोड़ने के लिए झेलम पर कुल चार पुल हैं. इनमें ‘सीमेंट ब्रिज’ सबसे बड़ा और मुख्य है. इस पुल से होते हुए जैसे ही कोई ‘ओल्ड सिटी’ में दाखिल होता है, ‘वेलकम टू पाकिस्तान’ का नारा उसे अपने सामने की दीवारों पर बड़ा-बड़ा लिखा मिलता है. ‘ओल्ड सिटी’ में कुछ आगे बढ़ने पर, ‘गो इंडिया गो बैक’, ‘बुरहान हमारा हीरो’, ‘बुरहान वी लव यू’, ‘वी वांट फ्रीडम’ और ‘हमें चाहिए आज़ादी’ जैसे नारे लगभग हर दीवार और हर दूकान के शटर पर लिखे मिलते हैं.

बारामूला ‘ओल्ड टाउन’ में करीब दस हजार से ज्यादा आबादी रहती है. बीते कुछ समय से यहां के लोगों ने चुनावों में भाग लेना पूरी तरह से छोड़ दिया है. न तो ये लोग वोट डालने निकलते हैं और न ही इस इलाके में प्रशासन कोई पोलिंग बूथ ही बनाता है. बारामूला में जब भी पत्थरबाजी होती है, इस पूरे इलाके को मुख्य शहर से लगभग काट दिया जाता है. इस इलाके को शहर से जोड़ने वाले सभी पुलों पर तार-बाड़ लगा दी जाती है और पुलों पर पुलिस, सेना या अर्ध-सैनिक बल तैनात कर दिए जाते हैं. इसके बावजूद सबसे ज्यादा पत्थरबाजी इसी इलाके से होती है.

झेलम नदी बारामूला को दो हिस्सों में बांटती है
झेलम नदी बारामूला को दो हिस्सों में बांटती है

‘ओल्ड टाउन’ के रहने वाले अधिकतर लोग अब यह कहने में हिचकिचाते नहीं कि उन्हें कश्मीर की आज़ादी चाहिए. इस अलगाव का मुख्य कारण ये लोग बीते कुछ समय में हुए बदलावों को मानते हैं. यहां रहने वाले 24 वर्षीय मोहम्मद इमरान नजार कहते हैं, ‘यहां के लगभग हर बच्चे के ऊपर दर्जनों एफआईआर दर्ज कर दी गई हैं. मेरे ऊपर कुल 57 एफआईआर हैं. आए दिन पुलिस हमें उठा लेती है, मारपीट करती है और कई-कई दिन थानों में ही कैद रखती है. मेरी जिंदगी पुलिस ने बर्बाद कर दी है. कश्मीर की आज़ादी के अलावा अब मेरा कोई और मकसद नहीं है.’

इमरान जो बात कहते हैं वह लगभग ‘ओल्ड टाउन’ का हर युवा दोहराता है. इनका मानना है कि इतिहास में कश्मीर के लोगों से जो वादा किया गया था वह कभी पूरा नहीं हुआ और वर्तमान में तो अत्याचार और भी बढ़ गए हैं. 21 वर्षीय सुहैल अहमद कहते हैं, ‘मैं जब 12 साल था तब मुझे पहली बार पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था और 16 दिनों तक थाने में कैद रखा था. मेरे ऊपर एक दर्जन एफआईआर लगा दी हैं. हमारे साथ सिर्फ जुल्म हुए हैं. ऐसा एक भी कारण नहीं जिसकी वजह से हम भारत से साथ रहें.’

‘ओल्ड टाउन’ के युवा आज खुलकर यह स्वीकार करते हैं कि बुरहान वानी उनका आदर्श है और बुरहान जैसी जिन्दगी या मौत पाना उनके लिए गर्व का विषय होगा. कश्मीर में जितने भी लोग फौज की गोलियों से मारे गए हैं उन लोगों को यहां का बच्चा-बच्चा अपना आदर्श बताता है.

‘ओल्ड बारामूला’ में दो कब्रिस्तान हैं. एक आम लोगों के लिए और दूसरा उनके लिए जो भारतीय फ़ौज की गोली से मरे हैं. इस दूसरे कब्रिस्तान को ‘शहीद कब्रस्तान’ कहा जाता है. यहां करीब दो सौ कब्रें हैं जिन्हें यहां के लोग शहीदों की कब्रें मानते हैं. इनमें से एक कब्र ताहिर रसूल की है जिसकी मौत 2013 में हुई थी. इस कब्र पर उर्दू में जो लिखा है उसका हिंदी अनुवाद कुछ यूं है - ‘5 मार्च 2013, मंगलवार को भारतीय फौजी दरिंदों ने शहर ख़ास बारामूला में गोली मारकर नमाज़ के पाबंद दीनपसंद नौजवान ताहिर रसूल सोफी को शहीद कर दिया.’ इसी तरह इम्तियाज़ अहमद खान की कब्र पर लिखा है, ‘शहीद इम्तियाज़ ने भारतीय फौजों के साथ लड़ते हुए झुकने के बजाय सर कटाने को तरजीह देकर अपनी जान कुर्बान कर दी’ और 21 वर्षीय हैदर की कब्र पर लिखा है, ‘मेरी हिम्मत थकी नहीं, मेरे शौक अभी बाकी हैं. मुझे हार-जीत से क्या गरज, मेरी जंग जो थी, लड़ गया.’

बारामूला में एक कब्रिस्तान आम लोगों के लिए है और दूसरा उनके लिए जो सुरक्षा बलों की गोलियों का शिकार हुए
बारामूला में एक कब्रिस्तान आम लोगों के लिए है और दूसरा उनके लिए जो सुरक्षा बलों की गोलियों का शिकार हुए

इन कब्रों पर लिखे संदेशों को पढ़ते हुए जो पीढ़ी बड़ी हुई है और हो रही है, उसके मन में भारत के लिए क्या विचार हैं यह 10 साल के बुरहान शौकत वार की बातों से समझा जा सकता है. यह पूछने पर कि क्या उसने कभी पत्थर चलाए हैं, बुरहान पूरे आत्मविश्वास के साथ ‘हां’ कहता है. पत्थर चलाने का कारण पूछने पर वो कहता है ‘आजादी’. यह पूछने पर कि आज़ादी क्यों चाहिए, वह कहता है, ‘भारत ने बहुत ज़ुल्म किये हैं.’ 10 साल के बुरहान की तरह कश्मीर के अधिकतर युवा अब मुखरता से भारत से अलगाव की बात कर रहे हैं. दक्षिण कश्मीर में ऐसा पहले से होता रहा था लेकिन उत्तरी कश्मीर के क्षेत्रों में यह मुखरता पहले नहीं दिखती थी.

कश्मीर की लड़ाई में धर्म की बढ़ती भूमिका

हुर्रियत (गिलानी) के बारामूला जिला प्रमुख मुस्तफा वानी कहते हैं, ‘भारत सरकार जिस तरह से मुस्लिम-विरोधी कदम उठा रही है उसका सीधा नतीजा यहां देखा जा सकता है. कश्मीर की लड़ाई पहले भी थी और इस्लाम इस लड़ाई का हिस्सा भी था. लेकिन आज लोगों को लगने लगा है कि भारत में इस्लाम पर भी हमले शुरू हो गए हैं. कभी बीफ पर पाबंदी लगती है, कभी गोरक्षा के नाम पर मुस्लिमों की हत्या होती है और कभी तीन-तलाक जैसे धार्मिक मुद्दों को छेड़ा जाता है. इसलिए आज लोग जान गए हैं कि कश्मीर की आज़ादी इस्लाम के लिहाज से भी जरूरी है. बल्कि आज इस्लाम ही कश्मीर की लड़ाई का सबसे बड़ा पहलू बन चुका है.’

बारामूला जिला न्यायालय में कार्यरत एक अधिकारी बताते हैं, ‘हम सरकारी नौकरी में रहते हुए कश्मीर की आज़ादी की बात खुलकर नहीं कह सकते. लेकिन आप निजी तौर से किसी भी कश्मीरी से आज पूछ लीजिये, उसके मन में भारत से अलगाव की भावना ही मिलेगी. जब से केंद्र में भाजपा सरकार सरकार आई तब से यह भावना और मजबूत ही हुई है. कश्मीरी होने के नाते यहां के लोगों ने बहुत कुछ भुगता है. अब मुस्लिम होने के नाते भी अगर भारत में अत्याचार भुगतना पड़े तो अलगाव की भावना बढ़ना स्वाभाविक है.’

वे आगे कहते हैं, ‘ये बात हर कश्मीरी जानता है कि बंदूक के दम पर या पत्थरबाजी करने से कश्मीर का मुद्दा सुलझेगा नहीं बल्कि और बर्बर होता जाएगा. लेकिन स्थितियां दिनोंदिन ऐसी होती जा रही हैं कि लोगों के पास गुस्सा निकालने का यही एक तरीका रह गया है.’

दक्षिण की ही तरह अब उत्तरी कश्मीर के युवा भी बंदूक उठाने को तैयार

उत्तरी कश्मीर में आतंकवादी दक्षिण की तुलना में अब तक बेहद कम रहे हैं. लेकिन आज स्थिति ऐसी है कि यहां के युवा बंदूकें उठाने को तैयार हैं. 24 वर्षीय मोहम्मद इमरान कहते हैं, ‘जिन लड़कों के खिलाफ पुलिस ने 50-60 एफआईआर दर्ज कर दी हैं और जिन्हें आए दिन जेलों में डाल दिया जाता है, वे कभी भी बंदूक उठा सकते हैं. मुझे खुद कई बार लगता है कि मुझे अब यही करना चाहिए. हम कैसे भूल जाएं जो हमारी बहनों के साथ सुरक्षा एजेंसियों ने किया?’ वे आगे कहते हैं, ‘हिजबुल मुजाहिदीन अब हर किसी को अपने साथ शामिल नहीं करता. उनकी शर्त होती है कि शामिल होने के लिए लड़कों के पास अपने हथियार होना जरूरी हैं. इस शर्त के कारण ही कई लड़के शामिल नहीं हो सके हैं. लेकिन मौका मिला तो यहां बड़ी संख्या में लोग हिजबुल मुजाहिदीन के साथ जाने को भी तैयार हैं.’

बारामूला के रहने वाले 22 साल के बिलाल बशीर बट कहते हैं, ‘पिछले साल पुलिस की पैलेट लगने से मेरी एक आंख चली गई. मेरे जैसे दर्जनों लोग यहां और हैं. हमारा अब कोई भविष्य है क्या? हम जैसे लड़के क्यों बंदूक उठाने को मजबूर नहीं होंगे?’ वे आगे कहते हैं, ‘दक्षिणी कश्मीर के मुकाबले यहां पहले पुलिस की मुखबिरी करने वाले ज्यादा लोग थे. इसलिए हिजबुल मुजाहिदीन भी यहां किसी पर आसानी से भरोसा नहीं करता था. लेकिन अब यहां मुखबरी करने वाले न के बराबर हो गये हैं. धीरे-धीरे यहां भी जिहाद पर जाने वाले लड़के बढ़ने लगे हैं.’

हुर्रियत नेता मुस्तफा वानी कहते हैं, ‘चुनाव में भागीदारी करने को भारत सरकार जनमत संग्रह बताती है. उसे लगता है कि लोगों ने चुनाव में वोट डाला, इसका मतलब लोग भारत के साथ हैं. यह सरकार की सबसे बड़ी भूल है. लोग वोट डालते आए अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए. लेकिन कश्मीर का मुद्दा हर कश्मीरी के मन में हमेशा से है. सिर्फ एक डर के चलते लोग इस मुद्दे पर खुलकर नहीं बोलते थे. आज हालात ने लोगों का डर भी ख़त्म कर दिया है.’