पैन कार्ड और आयकर रिटर्न भरने में आधार को अनिवार्य बनाने की केंद्र सरकार की पहल कानूनी दांवपेंच में उलझती दिखाई दे रही है. द हिंदू के मुताबिक शुक्रवार को जस्टिस एके सीकरी और जस्टिस अशोक भूषण की बेंच ने इस पर सवाल उठाया है और पूछा है कि आखिर इस फैसले का तुक क्या है.

केरल के पूर्व मंत्री बिनोय विश्वम की याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी से पूछा कि क्या इससे फर्जी पैनकार्ड या राशन कार्ड जैसी समस्याएं खत्म हो जाएगी. जस्टिस सीकरी ने आगे कहा, ‘क्या यही समाधान है? लोगों को जबरन आधार बनाने के लिए कहा जाए?’ बिनोय विश्वम ने अपनी याचिका में वित्त विधेयक-2017 के जरिए आयकर कानून में शामिल धारा-139 एए की वैधानिकता के अलावा इसे वित्त विधेयक के रूप में पेश करने को चुनौती दी है. इसके जरिए नए पैन कार्ड बनवाने, पुराने पैन कार्ड की वैधता सुनिश्चित करने और आयकर रिटर्न भरने में आधार को अनिवार्य बनाया गया है.

इस पर अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा कि इससे फर्जी पहचान पत्रों की बाढ़ और गलत लेन-देन को रोकने में मदद मिलेगी. उन्होंने यह भी कहा कि संसद की मंजूरी से धारा-139 एए के तहत आधार को अनिवार्य बनाया गया है. हालांकि, शीर्ष अदालत ने इस बारे में अपने पहले के निर्देश को लेकर भी केंद्र से सवाल पूछा. सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक पहले के निर्देश के तहत केंद्र सरकार को निजता के अधिकार के तहत आधार की वैधता पर फैसला आने तक इसे केवल स्वैच्छिक तौर पर आगे बढ़ाने के लिए कहा था. इस पर अटॉर्नी जनरल की दलील थी कि हाल में सुप्रीम कोर्ट भी सिम कार्ड खरीदने के लिए आधार को अनिवार्य करने का आदेश दे चुकी है.

वहीं, याचिकाकर्ता बिनोय विश्वम के वकील अरविंद दातार ने कहा कि ड्राइविंग लाइसेंस व अन्य दस्तावेजों के साथ आधार मूल दस्तावेज है, ऐसे में आधार को अनिवार्य बनाने से पैन कार्ड अवैध बन गया है, जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं. उनका यह भी कहना था कि खुद आधार एक्ट में आधार को अनिवार्य नहीं बनाया गया है. इस पर अटॉर्नी जनरल ने कहा कि लोग पहले कानून न होने की शिकायत कर रहे थे, अब कानून में ही समस्या गिना रहे हैं. उनका इशारा आधार एक्ट-2016 की तरफ था, जिसे संसद में वित्त विधेयक के रूप में पेश किए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पहले से कांग्रेस सासंद जयराम रमेश की याचिका लंबित है.