निर्देशक : सुनील सिप्पी

लेखक : सबा इम्तियाज, एल्थिया डेल्मस कौशल, सुनील सिप्पी, शिखा शर्मा

कलाकार : सोनाक्षी सिन्हा, कनन गिल, मनीष चौधरी, पूरब कोहली, शिबानी दांडेकर, स्मिता तांबे, एमके रैना

रेटिंग : 2/5

‘नूर’ की शुरुआत बेहद मनोरंजक है. शुरुआती 15-20 मिनट तक कहानी कहने का सलीकेदार ‘फील-गुड’ अंदाजे-बयां आपको तपाक से नूर नामक नायिका की जिंदगी का हिस्सा बना देता है और जितनी तफ्सील से मजेदार ‘कराची, यू आर किलिंग मी’ थी, उतनी ही अंत तक मजेदार यह फिल्म होने वाली है, आपको इसका भरोसा होने लगता है. वजन कम करने के सपने देखने से लेकर प्रेमी पाने के जतन तक, और नौकरी में नहीं मिल पा रहे परिवर्तन से लेकर दुनियाभर को अपने व्यंग्य बाणों से घायल करने की आदत तक, नायिका एक लंबी अवधि तक फिल्म में अपनी कहानी खुद सुनाती है और इस दौरान चटपटे संवादों और अर्बन यथार्थ को समेटने वाली अनोखी सिचुएशन्स के केंद्र में रहकर सोनाक्षी सिन्हा इतना खूबसूरत अभिनय करती हैं कि हमारी तारीफों की बंद तिजोरी को डिजिटल ताला लगा होने के बावजूद खोल लेती हैं!

‘लुटेरा’ के बाद यह पहली बार हुआ है कि सोनाक्षी ने कायदे का अभिनय किया है. सिर्फ फिल्म के इस अच्छे हिस्से में नहीं, वे अंत तक लापरवाह-बेपरवाह लड़की के किरदार में लुभाती हैं और लाउड फिल्मों में लाउड और उसकी अति के बीच का अभिनय करने की आदी यह अभिनेत्री, अपने अंदर कई सहज-सरल-सुंदर किरदार करने की गुंजाइश भी रखती है, यह उन्होंने 15 हिंदी फिल्मों के करियर में ‘नूर’ से दूसरी बार जग-जाहिर किया है.

फिल्म में सोनाक्षी का एक लंबा मोनोलॉग है, जिसमें वे मुंबई शहर को कोसती हैं और बार-बार कहती हैं - ‘मुंबई, यू आर किलिंग मी’. लिखने वाले ने इस सीन को लिखा भी उम्दा है और कैमरे की बदलती दिशाओं ने अपना काम भी सलीके से किया है, मगर इस सीन में जान तो सोनाक्षी के नैचुरल और बेहद कम देखे गए अभिनय ने डाली है. ऐसे प्रभाव वाले दो-चार सीन और हैं, जो कहते हैं कि इस फिल्म में जितना थोड़ा-बहुत नूर है, वो सोनाक्षी सिन्हा की वजह से ही मौजूद है.

फिल्म के खस्ताहाल होने की वजहों को बताने की शुरुआत ठीक इसी सीन से भी की जा सकती है. क्लाइमेक्स से थोड़ा पहले आने वाले इस सीन में दुनिया से थक-हारकर सोनाक्षी न्याय पाने की आस में एक वीडियो बनाती हैं और उसमें वंचितों को न्याय दिलाने की बात को गंभीरता देने के लिए जमकर मुंबई को कोसती हैं. ठीक सबा इम्तियाज की उस किताब की थीम को आत्मसात करते हुए जिसपर यह फिल्म आधारित है - ‘कराची, यू आर किलिंग मी’– और जिसमें शहर कराची उतना ही अहम पात्र था जितना उस उपन्यास की नायिका आएशा. लेकिन दिलचस्प है कि इस सीन के आने से पहले तक ‘नूर’ नामक फिल्म एक बार भी यह कहते हुए नहीं मिलती कि नायिका मुंबई शहर से दुखी है!

नायिका के पास खुद की गाड़ी है, रहने के लिए पिता का घर है, कूल और पैसे वाले दोस्त है, महंगी सजावट वाले पब्स में जाने लायक धन है, और एक भी ऐसा सीन नहीं है जो कहे कि नूर मुंबई की ‘वजह’ से शोकाकुल है. उसके दुख और वंचितों को न्याय नहीं मिलने में मुंबई शहर का भी दोष है, यह ‘नूर’ में कहीं-कभी नजर नहीं आता. लगता है जैसे फिल्म पाकिस्तानी उपन्यास की मुख्य थीम को आत्मसात करने के लिए हड़बड़ी में जागती है, और आधी से ज्यादा खत्म होने के बाद ‘आउट ऑफ द ब्लू’ मुंबई को एक अहम पात्र बनाकर दिखाने की कोशिश करने लगती है. लेकिन सोनाक्षी के सुघड़ अभिनय के बावजूद यह बिलकुल नहीं जमता, आंखों को, और लॉजिकल नहीं लगता, दिमाग के न्यूरॉन्स को!

‘नूर’ का बेनूर हो जाना तब शुरू होता है जब शुरुआती 15-20 मिनट में फील गुड मनोरंजन देने के बाद फिल्म सिनेमा के शाश्वत नियमों का पालन करते हुए हंसी-मजाक करके मुद्दे की बात करने निकलती है. ‘रियल जर्नलिज्म’ करने को बेचैन रहने वाली नूर को एक गैरकानूनी रैकेट का पता चलता है और एक ‘ग्रेट स्टोरी’ की संभावनाओं पर उसका मन लट्टू हो जाता है. वो कुछ गलतियां करती है और हर उस फिल्मी कहानी की तरह जिसमें नायक/नायिका बिगड़े हुए होने के बाद अंत में सुधर जाते हैं, ‘नूर’ भी अंजाम भुगतने के बाद खुद को बदलकर फिल्म को खत्म करती है. सिनेमा के सही सिद्धांतों पर चलती तो इस दौरान फिल्म को थ्रिलर की रफ्तार में आगे बढ़ना था, लेकिन वो घोंघे की रफ्तार वाला सुस्तम-सुस्त ड्रामा रचकर दुखी करती है.

फिल्म कभी बेवजह विदेश चली जाती है (जहां नायिका झील और पेड़ों को देखकर खुश होते हुए कनन गिल से कहती है कि कितनी सुंदर जगह पर रहते हो तुम! जैसे कि वो खुद मुंबई में नहीं किसी पठार पर रहती हो जहां पानी-पेड़ अफसानों की बातें हों), तो कभी विदेश पहुंचने के तुरंत बाद ही वापस मुंबई लौट आती है. कभी कई बार सोशल मीडिया का हास्यास्पद प्रयोग करती है, तो कभी एक हीरो के माध्यम से वॉर फोटोग्राफर को कहानी का हिस्सा बनाकर त्रासदी का शो-ऑफ करती है. दिक्कत यह समझ आती है कि बेहतर शुरुआत के बावजूद, ‘नूर’ की पटकथा को पता ही नहीं होता कि बेनूर होने से बचने के लिए जतन कैसे किए जाते हैं. इसलिए वो उन खयालों को भी तन देती है जिसे कहने में कहानी का मन नहीं रमता.

‘नूर’ को यह भी नहीं पता है कि असली पत्रकारिता क्या होती है. उसका वकार क्या होता है. खोजी पत्रकारिता कैसे की जाती है. तथ्यों को जांचना किस चिड़िया का नाम होता है. इसलिए एक देशव्यापी रैकेट का पर्दाफाश करने के लिए फिल्म की नायिका गूगल का सहारा ज्यादा लेती है और खबर बांचते वक्त तथ्यों की जगह धारणा के आधार पर कैमरे की तरफ देखते हुए अपना पीटूसी करती है. संपादक बने मनीष चौधरी खबर ब्रॉडकास्ट नहीं करने के अजीब-अजीब तर्क देते हैं और यह खबर ब्रॉडकास्ट नहीं करने के बावजूद नूर पर ऐसे-ऐसे इल्जाम लगाते हैं कि फिल्म एक बार फिर, न आंखों को जंचती है, न ही दिमाग के न्यूरॉन्स को लॉजिकल लगती है.

सार ये है, कि जिस तरह आप चेतन भगत को पढ़कर प्यार-मोहब्बत को नहीं समझ सकते, समझ लीजिए, उसी तरह ‘नूर’ देखकर पत्रकारिता को नहीं समझा जा सकता. बाकी आपकी मर्जी.