सत्याग्रह के नियमित पाठक दिव्यानंद देव जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली के छात्र हैं.


तब की ठीक-ठीक उम्र मुझे याद नहीं, शायद दस-ग्यारह साल का था. हम संयुक्त परिवार में रहते थे. उस समय मेरी बहन गुड़िया छह-सात बरस की होगी. गांव में तब तक बिजली नहीं आई थी. जब बिजली आई तो उस समय गांव में जो उत्सव का माहौल था वो किसी फ़िल्मी सीन की तरह मेरे ज़ेहन में अटका हुआ है. मेरे बाबा बड़े प्रसन्न हुए थे, जैसे उन्हें कुछ अलग से मिल गया हो.

यह किस्सा बिजली आने के पहले का है. उस दिन अंधेरा होने को था. इससे पहले हम बच्चों में से किसी न किसी को लालटेन की चिमनी साफ करनी होती थी. ज्यादातर यह काम हमारी बहनें ही करती थीं. हमारे पास एक ठोस बहाना होता था कि चिमनी हमसे फूट जाएगी या हमारा हाथ बड़ा है, सो साफ़ करते हुए हम उसे कांच के अंदर डालकर घुमा नहीं पाएंगे. इस तर्क में कुछ तथ्य तो जरूर था लेकिन उससे ज्यादा बेईमानी थी. हमारी बहनें छोटी थीं, लेकिन हमारी चालाकियों को समझती थीं.

खैर, हमेशा की तरह उस दिन भी लालटेन साफ हो गई. फिर उसे बीच में रखकर हम सभी बच्चे उसके चारों तरफ घेरा बनाकर पढ़ाई करने बैठ गए. हम ओसारे में बैठे थे. आंगन से इनारे (कुएं) की तरफ जाने वाली गली के एक कोने में मां और दोनों छोटी चाची खाना बनाने में जुटी थीं. जहां खाना बन रहा था, उससे लगी झोपड़ी को ‘भनसा’ कहते थे. झर-पानी (खराब मौसम) में उसी में खाना बनता और खाया जाता. उस दिन दादी ओसारे में नहीं थीं. बड़ी मां अपने कमरे में थीं, जो हमारे बैठने की जगह के पास ही था.

आपको जानकर थोड़ा आश्चर्य होगा कि हम जब भी पढ़ने बैठते, घर का कोई बड़ा सदस्य हमें पढ़ाने के लिए नहीं बैठता था. इन सब कामों में किसी की दिलचस्पी नहीं थी. हालांकि बड़े चाचा हमें पढ़ा सकते थे. कभी-कभी उन्होंने पढ़ाया भी, लेकिन वो कभी हमारे पास नियमित नहीं बैठते थे. इस तरह पढ़ने-पढ़ाने को लेकर एक भव्य उदासीनता हमारे परिवार में थी. इसलिए वहां इस दौरान हम सभी बच्चे ही रहते थे और हम में सबसे बड़ा, हमारा वक़्त-जरूरत का स्वयंभू मास्टर होता था. और फिर उसे पढ़ने में नहीं, मास्टरी में आनंद आता और वह जमकर यही करता था. फिर चाहे वो खुद कुछ नहीं जानता हो या जो बता रहा हो, वह बिलकुल गलत हो.

किस्मत से कहिए या बदकिस्मती से, उस शाम की वह स्वघोषित मास्टरी मुझे मिल गई थी. बस! उस दिन अब मुझे पढ़ना नहीं था. पढ़ने में वैसे भी मन नहीं लगता था. पढ़ना पड़ता था, इसलिए पढ़ते थे. हां, पढ़ाने के मौके हाथ में आते ही हम एक दूसरे रूप में ढल जाते. हमें लगता कि दुनिया की सबसे भारी जिम्मेदारी हमें मिल गई है और इसे पूरा करना बहुत जरूरी है.

उस दिन सब अपने-अपने हिसाब से पढ़ ही रहे थे, लेकिन मुझे भी कुछ करने के लिए अवसर चाहिए था. मुझे लगा कि गुड़िया ठीक से नहीं पढ़ रही है. जबकि यह मेरी जिम्मेदारी थी कि सब ठीक से पढ़ें. तो मैंने उसको गरजकर टोका कि ‘पढ़ो! मन-ही-मन भिनभिनाओ मत!’ गला खखारकर उसने अपनी आवाज तेज की, लेकिन वो मेरे लिए काफी नहीं था. मैंने एक बार और टोका. तीसरी बार टोकने के बजाय मैने वो कर दिया जिसके लिए आज तक पछताता हूं.

मैने उस छोटी-सी मासूम बच्ची को कोई मौका दिए बिना, उसकी हथेली पकड़ी और उसे उल्टा कर लालटेन की भभकती चिमनी से सटा दिया. और तब तक सटाए रखा जब तक उसकी दर्दनाक चीखें पूरे घर में नहीं फैल गईं. बड़ी मां बगल के कमरे में थीं. सबसे पहले वही पहुंचीं और हाथ खींचकर लह-लह शीशे से उसको अलग किया. और चीखते हुए बोलीं- ‘आयगे माय! बच्चा रऽअ आय ते यें प्राण ले लेलकै!’ (तुमने तो अभी बच्ची के प्राण ही ले लिए थे). गुड़िया तो तब ठीक से रो भी नहीं पा रही थी, लेकिन मेरी बड़ी मां की आवाज स्वाभाविक तौर पर उंची और बुलंद है. सभी उनकी आवाज सुनकर और तेजी से आ गए. बाकी बच्चे अवाक थे और मारे डर के छिटक गए थे.

मैं संज्ञा-शून्य खड़ा था. जो करना था वो मैंने सनक में कर दिया लेकिन अब क्या! भनसा के पास से मां और चाची लपककर पहुंचीं और द्वार से भी लोग ‘कि भेलै-कि भेलै’ (क्या हुआ-क्या हुआ) कहते-कहते वहां आ पहुंचे. इसके बाद पीठ पर जब तड़ातड़ बेलन पड़ने शुरू हुए तो उस चोट के प्रभाव से मैं अपनी शून्यता से बाहर आया. मार-पीट का दर्द तब जाता रहा जब यह एहसास हुआ कि ये मैंने क्या कर दिया. मेरी रुलाई घुटी हुई सिसकियों में बदल गई. मेरे रोने पर मुझे और मार पड़ी. मुझे मां ने ही मारा. कोई और मारता तो शायद कम मारता. बचाया फिर मुझे मेरी बड़ी मां ने ही. बाकी बच्चे सन्नाटे में थे और एक तरफ सावधानी से खड़े थे. उनको मालूम था कि गुस्से का रुख़ मुझसे होकर इधर-उधर भी बहक सकता है.

मारपीट के कार्यक्रम के बीच गुड़िया का इलाज भी शुरू हो गया था. तरह-तरह के नुस्खे उसके जले हाथ पर आजमाए गए. पहले बहुत देर तक उसे ठंडे पानी में रखा गया. फिर उस पर सरसों का तेल लगाया गया. उसे दर्द की एक टेबलेट भी दी गई. उस दिन पढ़ने-लिखने का किस्सा कुछ इस तरह तमाम हो गया. इस घटना को हुए आज सोलह-सत्रह साल हो गए. हमारे चेहरे बदल गए. हमारी आवाज और बोलने का हमारा तरीका भी बदल गया, पर उस घटना का अफसोस आज भी ताजा है. अब भी जब रक्षाबंधन पर मेरी छोटी बहन मुझे राखी बांधती है तो उसके हाथ पर बना वो दाग दिखाई देता है. और कुछ इस तरह की तकलीफ देता है, जैसे गटका हुआ पानी सीने में अटक जाए. हालांकि वो उस समय भी हंसकर उसे मेरी निशानी बताती है.

प्यारी बहन, मैं तुमसे कहने की हिम्मत कभी नहीं जुटा पाया. एकाध बार कोशिश की, लेकिन तुम्हारे पास जाकर बोलने से पहले ही फफकने लगा. इस माध्यम से कह पा रहा हूं - जब तुम बिलकुल फूल-सी बच्ची थी. मैंने तुम्हें बिला वज़ह पीड़ा दी. उस वक़्त तो नहीं लेकिन होश संभालने से लेकर आज तक मुझे इस बात का पछतावा है और शायद ताउम्र रहेगा. तुम्हारे जले हाथ का वह छाला मेरे सीने में छप गया है. जब कभी अकेले में यह वाक़या याद करता हूं, सांसे चढ़ जाती हैं और आंखें भर-भराकर उतर आती हैं. जानता हूं, तुमसे माफ़ी मांगूगा तो तुम इतनी जोर से हंसोगी कि पंछी-परेवा भी ठिठक जाएंगे और कहोगी ‘कि दादा, तोहूं गजबे करै छोऽ!’ (क्या दादा, आप भी गजब करते हैं!)

(पाठक बचपन से जुड़े अपने संस्मरण हमें mailus@satyagrah.com या anjali@satyagrah.com पर भेज सकते हैं.)