कश्मीर में पत्थरबाजों से बचने के लिए सेना द्वारा युवक को जीप से बांधने पर मचा विवाद अभी थमा नहीं है. इस बीच मध्यप्रदेश के झबुआ के आदिवासी युवाओं ने सरकार को एक अनोखा प्रस्ताव बनाकर भेजा है. इनका मानना है कि वे कश्मीर घाटी के पत्थरबाजों से निपटने में सेना के लिए मददगार साबित हो सकते हैं.

इन युवाओं ने सरकार को आदिवासी गोफन बटालियन बनाने की सलाह दी है. उनका कहना है कि यदि सरकार बाकायदा उनकी एक बटालियन बनाकर कश्मीर भेजती है तो कुछ ही दिनों में वे उपद्रवियों को सेना पर पत्थर फेंकना भुला देंगे. गोफन एक पारंपरिक हथियार है जिसका इस्तेमाल किसानों द्वारा खेतों से पक्षियों और जानवरों को भगाने में किया जाता है. गोफन से लगभग 400-500 मीटर की हद तक वार किया जा सकता है. अभी तक इसके इस्तेमाल पर कोई पाबंदी भी नहीं है.

गोफन एक पारंपरिक हथियार है जिसका इस्तेमाल पक्षियों और जानवरों को भगाने में किया जाता है
गोफन एक पारंपरिक हथियार है जिसका इस्तेमाल पक्षियों और जानवरों को भगाने में किया जाता है

देश में पहले भी ऐसी असैन्य बटालियनों का निर्माण होता रहा है जिनसे सैनिक कार्यवाहियों में मदद ली गयी और वे इनमें अप्रत्याशित ढंग से सफल भी रहीं. सबसे पहले 1947 में कश्मीर में कबायलियों के आक्रमण को विफल करने के लिए स्थानीय लड़ाकों का अर्धसैनिक बल गठित किया गया था जो गृह मंत्रालय के अधीन था. इसमें ज़्यादातर युवक कश्मीर और आसपास के क्षेत्रों के ही थे. वहां की भौगोलिक परिस्थतियों से वाकिफ होने के कारण इन्हें काफी सफलता भी मिली.

चीन से हुए युद्ध के बाद इसी सैनिक बल में से ‘लदाख स्काउट्स’ का गठन किया गया था. 1965 की लड़ाई में इस अर्धसैनिक बल ने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ अद्भुत पराक्रम दिखाया और जंग के बाद मांग रखी कि उन्हें भी पूर्ण सैनिक बल की तरह मान्यता दी जाए. इसे सरकार ने स्वीकार कर लिया. इस तरह 1972 में इसका नाम बदलकर जम्मू कश्मीर लाइट इन्फेंट्री हो गया. अब यह सेना की एक नियमित रेजिमेंट है. 1999 में भी कारगिल में ‘ऑपरेशन विजय’ में इस रेजिमेंट ने अतुल्य शौर्य का परिचय दिया था.

यदि सरकार इन युवाओं के प्रस्ताव को मान लेती है तो इसके कई सीधे फायदे नजर आते हैं. पहला तो यही कि कश्मीर में पत्थरबाजों से तंग आ चुके सुरक्षा बलों को थोड़ी राहत की सांस मिलेगी. दूसरे, आदिवासियों को रोज़गार के साथ मुख्यधारा में शामिल होने का अवसर मिलेगा. और इससे झाबुआ जैसे नक्सल प्रभावित इलाकों में लोगों का सरकार पर भरोसा यकीनन तौर पर बढ़ेगा.

भले ही इस तरह के कदम अक्सर सेना के लिए लाभप्रद साबित हुए हैं लेकिन अभी तक इनका उपयोग शत्रु फौजों और घुसपैठियों के खिलाफ ही होता रहा है. अपने ही देश में इस तरह के प्रयोग करना कितना उचित है यह एक बड़ा सवाल है. हालांकि इसके समर्थन में कुछ लोग यह कह सकते हैं कि सेना भी तो शत्रु की फौजों के साथ लड़ने के लिए होती है, अपने ही नागरिकों का सामना करने के लिए नहीं.