‘हम तो केंद्रीय विश्वविद्यालय के नाम पर भरोसा करके एडमिशन लिए थे. हमारे साथ धोखा हुआ है. घर में मां-पिताजी को उम्मीद थी कि कोर्स पूरा होने के बाद भविष्य उज्ज्वल होगा लेकिन, अब तो जिंदगी में अंधेरा छा गया है. आगे क्या होगा पता नहीं. मान्यता के बिना हमारे सर्टिफिकेट तो रद्दी ही होंगे.’

नवीन कुमार (बदला हुआ नाम) के इन शब्दों से उनकी हताशा झांकती है. नवीन गया स्थित दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय में बीएससी-बीएड के छात्र हैं. उन जैसे दर्जनों छात्रों का भविष्य अधर में है क्यों कि उनकी डिग्री किसी काम की नहीं होगी. एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार से आने वाले नवीन बीती 18 से 21 अप्रैल तक विश्वविद्यालय परिसर में चली उस हड़ताल में शामिल थे जो बीए-बीएड और बीएससी-बीएड कोर्स के 90 विद्यार्थियों ने की थी.

हड़ताल की वजह

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के निर्देश पर गया स्थित दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय में 2013 में चार वर्षीय एकीकृत बीए-बीएड और बीएससी-बीएड पाठ्यक्रम शुरू किया गया था. इन पाठ्यक्रमों में दाखिला लेने वाले छात्रों को बाद में पता चला कि इन्हें राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) से मान्यता ही नहीं मिली है. बीएड (शिक्षा में स्नातक) से जुड़े पाठ्यक्रमों को एनसीटीई मान्यता देती है.

विश्वविद्यालय के सूत्रों की मानें तो प्रशासन ने इस मामले में लापरवाही बरती. जरूरी मान्यता न लेने के बावजूद उसने छात्रों को अंधेरे में रखा. हड़ताल पर बैठे एक छात्र ने नाम सार्वजनिक न करने की शर्त पर बताया, ‘हमें इस बारे में जानकारी एक अखबार में छपी खबर के बाद मिली. इसमें कहा गया था कि बिना मान्यता के ही विश्वविद्यालय में इन पाठ्यक्रमों को चलाया जा रहा है.’ वे आगे बताते हैं, ‘अखबार से मिली जानकारी के बाद हमने प्रशासन से इस बारे में बात की. उन्होंने इस खबर को ही फर्जी बता दिया और भरोसा दिलाया कि मान्यता मिल जाएगी.’

पाठ्यक्रमों को मान्यता दिलाने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन ने एनसीटीई के पास 2014 में आवेदन किया. यानी एक साल बाद. विश्वविद्यालय का दौरा करने के बाद एनसीटीई ने 2015 से इन कोर्सों को मान्यता दे दी. हालांकि उसने पिछले दो सत्रों यानी 2013-17 और 2014-18 को कानून और नियमों के आधार पर मान्यता देने से इनकार कर दिया. छात्रों के मुताबिक इसके बाद उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने अपनी चिंता जाहिर की लेकिन, उन्हें धीरज रखने और इंतजार करने के लिए कहा जाता रहा. इस मामले को लेकर बीते साल भी छात्रों ने 10 दिनों तक हड़ताल की थी. बताया जाता है कि उस वक्त भी प्रशासन ने दिसंबर तक का समय मांगा था लेकिन, इसका कोई भी नतीजा नहीं निकला. नतीजा यह है कि दर्जनों छात्रों का भविष्य अधर में है.

विश्वविद्यालय प्रशासन का रुख

हड़ताल पर बैठे छात्रों से मिली जानकारी के मुताबिक पहले तो प्रशासन ने इस मामले से अपना पल्ला झाड़ दिया था. हालांकि, बाद में भूख हड़ताल पर छात्रों के डटे रहने की वजह से विश्वविद्यालय ने बीते शुक्रवार को लिखित रूप से आश्वासन दिया कि तीन महीने के अंदर उनके कोर्स को मान्यता दिलाई जाएगी. ऐसा न होने पर इसकी जवाबदेही लेते हुए अदालत में छात्रों के साथ खड़े होने की बात कही गई है.

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक विश्वविद्यालय प्रशासन का खुद ही मानना है कि अब मामला मानव संसाधन विकास मंत्रालय और एनसीटीई के हाथों में ही है. मंत्रालय में सचिव स्तर के एक अधिकारी ने बीते गुरुवार को छात्रों से बात की थी. इन छात्रों में से एक ने बताया कि अधिकारी ने 45 दिनों का समय मांगा है और कहा है कि इससे संबंधित प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है. छात्रों के मुताबिक अधिकारी ने उनसे हड़ताल खत्म करने के लिए भी कहा.

उधर, 2013-17 सत्र के छात्रों का कहना है कि मई, 2017 में उनकी आखिरी परीक्षा होने वाली है. इन परिस्थितियों में उनके सामने यह दुविधा थी कि वे हड़ताल जारी रखते या फिर विश्वविद्यालय के आश्वासन को मानकर इसे खत्म कर देते. छात्रों के मुताबिक उन्हें कई तरह से डराया-धमकाया भी जा रहा था. हिंदी विभाग में सहायक प्रोफेसर योगेश प्रताप शेखर भी इसकी पुष्टि करते हैं. वे कहते हैं, ‘छात्र संघ जैसे संगठन के बिना छात्रों के पास प्रशासन की बात मानने के अलावा और कोई उपाय नहीं था.’

लापरवाही केवल बीएड पाठ्क्रमों तक सीमित नहीं

दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय की लापरवाही का मामला केवल बीएड से जुड़े पाठ्यक्रमों तक ही सीमित नहीं है. 2016 में एमएड में छात्रों का नामांकन करने के बाद उन्हें इस कोर्स की मान्यता न मिलने की जानकारी दी गई और इसके बाद कोर्स बंद कर दिया गया. इससे पहले 2015 में कला एवं शिल्प कला में स्नातक पाठ्यक्रम भी शुरू हुआ था. लेकिन 2016 में पाठ्यक्रम में गड़बड़ी होने की वजह बताकर इसे बंद कर दिया गया. इसमें एडमिशन लेने वाले छात्रों को दूसरे कोर्स में जाने का विकल्प दिया गया जिसके बाद कुछ छात्रों ने विश्वविद्यालय छोड़ दिया.

एनसीटीई से मान्यता लिए बिना कोर्स शुरु करने का यह अकेला मामला नहीं है

गया स्थित केंद्रीय विश्वविद्यालय एनसीटीई से मान्यता लिए बिना कोर्स शुरु करने वाला देश में अकेला विश्वविद्यालय नहीं है. रांची स्थित झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय, मध्य प्रदेश के अमरकंटक स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय और राज्य के ही सागर में स्थित डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय में भी इसी तरह के मामले सामने आए हैं. इसके अलावा गुजरात के गांधीनगर स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टीचर एजुकेशन (आईआईटीई) में भी बिना मान्यता के ही चार वर्षीय बीए-बीएड और बीएससी-बीएड कोर्स शुरू कर दिया गया है. इस संस्थान की स्थापना 2010 में हुई थी.

झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय में इन पाठ्यक्रमों को साल 2013 में एनसीटीई से बिना मान्यता हासिल किए ही शुरु किया गया था. एक साल बाद छात्रों को मालूम हुआ कि उनके कोर्स को तो मान्यता ही हासिल नहीं है. 2013 में एडमिशन लेने वाले 50 छात्रों में एक रवि कुमार बताते हैं, ‘मान्यता नहीं मिलने के बारे में जब हमने विश्वविद्यालय प्रशासन से बात की तो समाधान के रूप में हमें स्नातक में एडमिशन लेने के लिए कहा गया. साथ में यह विकल्प दिया गया कि इसके बाद हम विश्वविद्यालय में ही दो वर्षीय बीएड कोर्स की पढ़ाई पूरी कर सकते हैं.’ वे आगे बताते हैं, ‘हमारा एक साल तो बीत ही चुका था, आखिर में हमें यही विकल्प चुनना पड़ा.’ रवि से मिली जानकारी के मुताबिक इसके बाद विश्वविद्यालय ने 2014 में नामांकन नहीं लिया. 2015 में एनसीटीई से मान्यता मिलने के बाद फिर से चार वर्षीय बीए-एड और बीएससी-बीएड की शुरुआत की गई.

गांधीनगर स्थित आईआईटीई को परिषद से 2016 में मान्यता हासिल हुई. इससे पहले पांच सत्रों यानी 2011 से 2016 के बीच के छात्र अभी भी संस्थान के आश्वासन पर एनसीटीई से मान्यता मिलने की उम्मीद लिए बैठे हैं. विश्वविद्यालय में मौजूद एक सूत्र बताते हैं, ‘मान्यता न मिलने की बात जब छात्रों को मालूम हुई तो संस्थान ने इस बात को कबूल किया कि उनसे गलती हुई है. इसके साथ ही उसने छात्रों को भरोसा दिया है कि केंद्र सरकार इससे संबंधित अध्यादेश पर काम कर रही है और जल्द ही मान्यता मिल जाएगी.’

अमरकंटक स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय को अभी तक एनसीटीई से मान्यता नहीं मिली है. इस विश्वविद्यालय में 2013 से इन पाठ्यक्रमों को शुरु किया गया. पहले सत्र (2013-17) में एडमिशन लेने वाले 100 में से एक छात्र बताते हैं, ‘हमें पढ़ाई शुरू होने के करीब 10 महीने के बाद इसकी जानकारी हुई कि अभी तक परिषद से मान्यता नहीं मिली है. इसके बाद प्रशासन के सामने हमलोगों ने अपनी चिंता रखी. हमसे कहा गया है कि मान्यता लेने की प्रक्रिया चल रही है. साथ ही, अन्य विकल्पों के रूप में दूसरे कोर्स में एडमिशन देने की बात कही गई है.’ प्रशासन के आश्वासन के आधार पर आईआईटीई के छात्रों की तरह इन छात्रों को भी उम्मीद है कि आज न कल तो उनके कोर्स को मान्यता मिल ही जाएगी.

डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय में भी मामला कुछ अलग नहीं है. सूत्रों से हासिल जानकारी के मुताबिक संस्थान को चार वर्षीय बीए-बीएड और बीएससी-बीएड कोर्स की मान्यता 2015 में मिली. इससे पहले दो सत्रों (2013-17 और 2014-18) में कुल 80 छात्रों ने एडमिशन कराया था. इन्हें 2015 में जानकारी मिली कि इन दो सत्रों को मान्यता नहीं मिली है. सूत्र बताते हैं, ‘इस मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन की लापरवाही साफ नजर आती है. जुलाई, 2012 में पहले सत्र की शुरुआत के चार महीने बाद प्रशासन ने मान्यता के लिए परिषद के पास आवेदन भेजा था. इसके बाद मान्यता हासिल न होने के बावजूद 2014 में छात्रों का एडमिशन लिया गया.’

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक छात्रों ने इस मामले को लेकर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री सहित सभी संबद्ध संस्थानों को पत्र लिखा. लेकिन कहीं से भी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली. नाम सार्वजनिक न करने की शर्त पर एक छात्र ने बताया, ‘फिलहाल मामला जबलपुर हाईकोर्ट में है. छात्रों ने मानव विकास संसाधन मंत्रालय, एनसीटीई और विश्वविद्यालय को पक्षकार बनाकर अपने सत्र को मान्यता देने की मांग की है.’ वे आगे बताते हैं कि पिछले 22 मार्च को सुनवाई थी, लेकिन संबंधित पक्षों द्वारा अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है. उधर, विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रों को लगातार आश्वासन दे रहा है कि मंत्रालय में इस पर काम किया जा रहा है और जल्द ही मान्यता मिल जाएगी.

अभी तक इस तरह के गड़बड़झालों में प्राइवेट शिक्षण संस्थानों का नाम आता रहा है. लेकिन ये नए मामले बताते हैं कि अब उन विश्वविद्यालयों पर भी भरोसा नहीं किया जा सकता जिन्हें खुद सरकार चला रही है.