दोपहर के डेढ़ बजे हैं. सोपोर के ‘मेन चौक’ के आस-पास की दुकानों के शटर एक-एक कर गिरने शुरू हो गए हैं. जुम्मे का दिन है और यहां का बच्चा-बच्चा जानता है कि आज हर हाल में पत्थरबाजी होगी. पत्थरबाजी कितने बजे होगी, यह भी सबको मालूम है. पास की जामिया मस्जिद में जुम्मे की नमाज़ करीब दो बजकर दस मिनट पर ख़त्म होगी, इसके तुरंत बाद पत्थरबाजी शुरू हो जाएगी.

प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों को छोड़ दें तो कश्मीर के लगभग सभी हाईस्कूल और इंटर कॉलेज आज बंद हैं. क्योंकि प्रशासन को बच्चों की सुरक्षा का ख़तरा नहीं बल्कि बच्चों से सुरक्षा का खतरा है. बीते कुछ समय से हाईस्कूल और इंटर कॉलेज के बच्चे पत्थरबाजी में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगे हैं. इसलिए लगभग हर शुक्रवार उनके स्कूल बंद कर दिए जाते हैं ताकि उनके पास इकठ्ठा होने का कम-से-कम एक कारण तो कम हो.

सोपोर मेन चौक से कुछ पहले एक कब्रिस्तान में पांच पुलिस वाले हेलमेट पहने खड़े हैं. कब्रिस्तान की दीवार के ठीक बाहर पुलिस की तीन गाड़ियां तैनात हैं जिनमें दर्जन भर से ज्यादा पुलिसकर्मी सवार हैं. सफ़ेद रंग की इन गाड़ियों पर चारों तरफ चेचक जैसे दाग हैं जो बता रहे हैं कि ये गाड़ियां हजारों पत्थर खा चुकी हैं.

कब्रिस्तान के पास ही एक तांगा खड़ा है. अधेड़ उम्र का तांगेवाला इस पर बैठा सुस्ता रहा है. वहां से गुजरता एक कश्मीरी लड़का इस तांगेवाले से पूछता है, ‘कनी-जंग ग्वा शुरू?’ (पत्थरबाजी शुरू हुई क्या?) जवाब में तांगेवाला कहता है, ‘नमाज़ पत गछी’ (नमाज़ के बाद होगी.)

तभी अचानक एक पत्थर आकर पुलिस की गाड़ियों के पास गिरता है. ये पत्थर बटपोरा मोहल्ले की तरफ से आया है जो कब्रिस्तान के सामने ही है. बटपोरा सोपोर का वह इलाका है जहां से सबसे ज्यादा पत्थरबाजी होती है.

अपनी तरफ आए पत्थर का जवाब पुलिस तुरंत ही दे देती है. करीब छह फुट लंबा एक पुलिस वाला रस्सी के एक छोर पर पत्थर फंसाकर उसे गोल-गोल हवा में घुमाता है और फिर जैसे ही वह उस रस्सी को झटका देता है उसमें से पत्थर किसी गोली की तरह से छूटकर बटपोरा की दिशा में चला जाता है. पत्थर चलाने का यह तरीका पुलिस ने पत्थरबाजों से ही सीखा है. बटपोरा मोहल्ले से पुलिस की तरफ फिलहाल और पत्थर नहीं आते हैं.

सोपोर मेन चौक पर तौसीफ की कपड़ों की दुकान अब भी खुली है. तौसीफ कहते हैं, ‘असल पत्थरबाजी नमाज़ के बाद ही शुरू होगी. अभी उसमें कुछ समय बाकी है. एक-दो पत्थर तो ऐसे ही किसी ने चला दिए होंगे. दरअसल कब्रिस्तान के पास जो सीआरपीएफ का बंकर है, पत्थरबाज़ उसे हमेशा निशाना बनाते हैं. हम लोग कब से मांग कर रहे हैं कि इस बंकर को कहीं और ले जाया जाए. इसकी वजह से कभी भी पत्थर चल जाते हैं.’ तौसीफ अपनी दुकान का सामान समेटते हुए कहते हैं, ‘कई साल के जख्म हैं साहब, कहीं तो गुस्सा फूटेगा ही. देखिएगा अभी दो बजे के बाद क्या हालात होते हैं.’

हर जुम्मे नमाज के बाद पत्थरबाजी होती है
हर जुम्मे नमाज के बाद पत्थरबाजी होती है

पौने दो हो चुके हैं और अब मेन चौक से जामिया मस्जिद तक लगभग सभी दुकानें बंद हो चुकी हैं. एक-दो दुकानदार अपना सामान समेट रहे हैं ताकि जल्द-से-जल्द वे भी शटर गिरा सकें. जम्मू-कश्मीर पुलिस (जेकेपी), जम्मू कश्मीर आर्म्ड पुलिस (जेकेएपी), सीआरपीएफ और स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (एसओजी) की दर्जनों गाड़ियां और सैकड़ों जवान मेन चौक के आस-पास पहुंच चुके हैं. जवानों के सर पर हेलमेट हैं, चेहरे पर कपड़ा बंधा है, हाथों में लाठियां हैं, कंधों पर बंदूकें हैं और कमर में गोलियों से भरी मैगज़ीन, टियर गैस के शेल और पैपर शेल्स के छोटे-छोटे बक्से लटके हैं. गाड़ियों में ‘207 वज्र’ भी है जो एक साथ सात टियर गैस या पेपर शेल लंबी दूरी तक फेंक सकता है.

ठीक सोपोर मेन चौक पर कई पत्रकार एक-साथ जमा हो गए हैं. इनमें अधिकतर स्थानीय पत्रकार हैं, कुछ दिल्ली से आए हैं और एक विदेशी पत्रकार हैं. दो बजने ही वाले हैं और नमाज़ ख़त्म होने का वक्त अब करीब है. पुलिस, पत्रकार, दुकानदार, स्थानीय लोग - सभी जानते हैं कि पत्थरबाजी अब शुरू होने ही वाली है. सब इसके लिए अपनी-अपनी तैयारी कर रहे हैं. सैन्य बलों के जवान मेन चौक पर ही रुक जाते हैं और सभी पत्रकार जामिया मस्जिद की तरफ बढ़ते हैं.

थोडा ही आगे बढ़ने पर जामिया मस्जिद से तक़रीर की आवाज़ सुनाई देने लगती है. अब तक एक-एक दुकान बंद हो चुकी है. जामिया मस्जिद झेलम के बिलकुल पास है जिस पर बने हातिशा पुल पर करीब 50-60 लड़के खड़े हैं. इनमें 5-6 साल के छोटे-छोटे बच्चे भी शामिल हैं. ये लोग सोपोर के अलग-अलग इलाकों से यहां आए हैं इसलिए पुलिस के लिए इनकी शिनाख्त करना आसान नहीं है.

पत्रकारों के यहां पहुंचते ही सभी लड़के नारे लगाना शुरू करते हैं. ‘गो इंडिया, गो बैक’ और ‘हम क्या चाहते- आज़ादी’ जैसे नारों से पूरा माहौल गूंज उठता है. इसके कुछ ही देर बाद मस्जिद के लाउडस्पीकर से नारा उछाला जाता है - ‘नारा-ए-तकबीर...’, मस्जिद के बाहर और भीतर मौजूद सभी लोग एक स्वर में कहते हैं ‘अल्लाह हु अकबर.’ मस्जिद के लाउडस्पीकर से कुछ और नारे लगते हैं - हम क्या चाहते-आज़ादी, बुरहान के सदके आज़ादी, आज़ादी का मतलब क्या, ला इलाहा इल्लल्लाह और पाकिस्तान से रिश्ता क्या, ला इलाहा इल्लल्लाह.’ बाहर से आए लोगों को यकीन नहीं होता कि ये सब भारत के ही एक हिस्से में हो रहा है.

मस्जिद के भीतर जब ये नारे लग रहे हैं तो बाहर खड़े लड़के अपने चेहरों पर कपड़े बांधना शुरू करते हैं. कई लड़कों के हाथों में गुलेलें हैं जिनका परीक्षण वे फिलहाल झेलम की ओर पत्थर फेंककर कर रहे हैं. इन लड़कों में मीडिया के प्रति रोष है कि इनकी आज़ादी की मांग को सही संदर्भ में दिखाया नहीं जाता. लेकिन इस रोष को जताने के लिए लड़के पत्रकारों पर तंज़ कसने से ज्यादा कुछ नहीं करते. कश्मीर से बाहर के पत्रकारों को सभी लड़के ‘इंडियन मीडिया’ कहकर संबोधित करते हैं. कई बार वे उनसे पूछ भी लेते हैं, ‘आप इंडिया से आए हैं?’

मस्जिद में नारे लगने के बाद नमाज़ शुरू हो चुकी है जो पांच-दस मिनट में पूरी हो जाएगी. इस दौरान लड़के अपनी ‘आज़ादी की लड़ाई’ के लिए कमर कसते हैं और आगे बढ़ने को तैयार हो जाते हैं. सभी पत्रकार इन लड़कों की तस्वीरें ले रहे हैं, नारे लगाते हुए इनके वीडियो बना रहे हैं और जल्द से जल्द से इन लड़कों से अलग होने की तैयारी भी कर रहे हैं. ‘श्रीनगर टाइम्स’ के फोटोजर्नलिस्ट आरिफ अहद तेली, ‘ग्रेटर कश्मीर’ के जुनैद बट और ‘कश्मीर रीडर’ के आसिम शाह यहां मौजूद हैं और अपना काम करने के साथ ही वे बाहर से आए पत्रकारों की सुरक्षा को भी अपनी जिम्मेदारी की तरह निभा रहे हैं.

ठीक दो बजकर दस मिनट पर जुम्मे की नमाज़ पूरी होती है. नमाज़ी सलाम फेरकर बाहर निकले ही हैं कि लड़कों का कारवां आगे बढ़ने लगता है. मस्जिद से निकले कुछ लोग इस कारवां में शामिल हो जाते हैं और कुछ, जो बुजुर्ग हैं, दूसरी तरफ से अपने घरों को लौट जाते हैं. ये लड़के अब ‘नकाबपोश पत्थरबाज़’ हो चुके हैं जो ‘भारत की बर्बादी’ के नारे लगाते हुए सैन्य बलों पर पत्थर बरसाने निकल रहे हैं. पत्रकार जानते हैं कि अब इनके साथ रहना जान जोखिम में डालना है, इसलिए वे इनसे अलग होने लगते हैं. पिछले शुक्रवार ही स्वतंत्र फोटोजर्नलिस्ट पीरज़ादा वसीम इस पत्थरबाज़ी में चोटिल हो गए थे. उनकी आंख के पास चार टांकें आए हैं और आंख में खून के थक्के अब भी बने हुए हैं. लड़कों की टोली मुख्य बाज़ार की तरफ से मेन चौक की तरफ बढ़ रही है जबकि पत्रकार ‘मुस्लिम पीर गली’ से होते सोपोर मेन चौक की तरफ भाग रहे हैं.

पत्थरबाजी अब आम जनजीवन का ही हिस्सा हो गई है
पत्थरबाजी अब आम जनजीवन का ही हिस्सा हो गई है

गलियों में पत्थरबाजी तब तक नहीं होती जब तक हालात बहुत ज्यादा न बिगड़ जाएं. लेकिन फिर भी पुलिस और अन्य सैन्य बलों के जवान गलियों में भी तैनात हैं. ये जवान वहां से गुज़रते हुए मीडिया के लोगों को उत्सुकता से देख रहे हैं. अचानक एक जवान अपना सर बचाते हुए नीचे झुकता है. लेकिन फिर उसे एहसास होता है कि ऊपर से उड़ते हुए एक परिंदे को उसने पत्थर समझ लिया था. वह मुस्कुराते हुए मीडिया वालों से कहता है, ‘मुझे लगा पत्थर आया. यहां पत्थर कभी भी, किसी भी दिशा से आ सकता है.’

सोपोर के इस बाज़ार की सभी दुकानों के शटर और छत टिन के हैं. इस टिन पर जब पत्थर गिरते हैं तो बिलकुल धमाकों जैसी आवाज़ होती है. लड़कों की टोली पत्थरों से ये धमाके करते हुए चौक की ओर बढ़ती जाती है. तभी एक जवान पेपर शेल उनकी तरफ फेंक देता है. इसके गिरते ही लड़कों की टोली कुछ पीछे चली जाती है. शेल से इतना तीखा धुआं उठ रहा है कि सैन्य बल खुद भी इससे बचने के लिए पीछे हटने को मजबूर हो जाते हैं. पत्रकार जहां से फोटो ले रहे हैं वहां तक ये धुआं पहुंचता दिख नहीं रहा लेकिन उनकी सांस घुटने लगी है, छाती जलने लगी है और आंखों से लगातार पानी बह रहा है. विदेशी पत्रकार खांसते हुए वहां से पीछे हट जाते हैं. ‘ये धुआं तो भारतीय मसालों से भी ज्यादा तीखा है’, उनकी इस टिप्पणी पर बाकी पत्रकार अपनी-अपनी आंखें पोंछते हुए हंसने लगते हैं. आस-पास के कई सारे घरों में ये धुआं सीधा जाता दिखाई पड़ रहा है. लेकिन फिलहाल इसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता.

लड़के जिस तरकीब से पत्थर चला रहे हैं, उससे मालूम हो जाता है कि पत्थरबाजी करने में अब वे माहिर हो चुके हैं. इसके लिए उन्होंने कई नए तरीके खोज निकाले हैं. ये लोग गीले कपड़ों से गैस के जलते गोलों को वापस पुलिस की तरफ फेंक रहे हैं, कभी पानी की बाल्टियों से धुएं का असर कम कर रहे हैं और कभी किसी जवान को इस तरह से ललकार रहे हैं कि वह कुछ आगे बढ़े और पीछे वाला पत्थरबाज उसे निशाना बना सके. पत्थर जमा करने का काम उन छोटे बच्चों को सौंप दिया गया है जो खुद ज्यादा दूर तक पत्थर नहीं फेंक सकते. रणनीति यह भी है कि सारे लड़के एक-साथ पत्थर न चलाएं. जब आगे वाले थक जाते हैं तो पीछे वाले लड़के आगे आकर मोर्चा संभालते हैं.

सैन्य बलों की भी इनसे निपटने के लिए कई रणनीतियां हैं. कुछ जवान बिलकुल सामने से इनका मुकाबला कर रहे हैं और पत्थर का जवाब पत्थर से दिया जा रहा है. जबकि कुछ जवान गलियों से निकलकर अचानक इनके नजदीक पहुंच रहे हैं और टियर गैस या पेपर शैल दाग रहे हैं. इससे लड़कों की टोली पीछे हटने को मजबूर हो रही है. कभी-कभी गलियों से निकलने वाले जवान पत्थर को ही इस अंदाज़ में लुड़का रहे हैं जैसे टियर गैस का गोला हो. इससे लड़के चकमा खाकर पीछे भी हो जाते हैं और गैस का एक गोला भी बच जाता है. सैन्य बलों के पास पैलेट गन्स भी हैं, जिनके इस्तेमाल से बीते साल कई लड़कों की आंखें चली गई थी, लेकिन फिलहाल उनका इस्तेमाल नहीं किया जा रहा.

आमने-सामने की इस लड़ाई में एक दूसरे को ललकारते हुए जमकर गलियां भी दी जा रही हैं. पत्थरबाज कश्मीरी में गालियां दे रहे हैं और सैन्य बलों के जवान हिंदी में. सबसे आगे जेकेएपी के जवान विकास डोगरा हैं जो अपनी लाठी लिए ऐसे खड़े हैं जैसे क्रिकेट खेल रहे हों. अपनी लाठी को किसी बल्ले की तरह जमीन पर पटकते हुए वे पत्थरबाजों को पत्थर फेंकने के लिए ऐसे ललकार रहे हैं जैसे कोई बैट्समैन किसी बॉलर को बॉल फेंकने के लिए ललकारता है.

ये लड़ाई जितनी हाथों से लड़ी जा जरी है, उतनी ही जुबान से भी. उस तरफ से जैसे ही नारा लगता है, ‘हम क्या चाहते - आज़ादी’, जवान विकास डोगरा जवाब में उतनी ही जोर से चीखते हैं, ‘हम नहीं देंगे - आज़ादी.’ लड़के चीखते हैं, ‘हम छीन के लेंगे -आज़ादी’, जवाब में विकास गाली देते हुए कहते हैं, ‘### नहीं मिलेगी आज़ादी.’

सैन्य बलों की तरफ से नारे लगाने वाले विकास अकेले ही हैं. उनके साथ कुछ कश्मीरी पुलिस वाले खड़े हैं लेकिन वे नारों में उनका साथ नहीं देते. सीआरपीएफ वाले इनसे पीछे की पंक्ति में हैं. पत्थर फेंक रहे लड़के कश्मीरी भाषा में कुछ चीखते हैं तो राज्य पुलिस के कश्मीरी जवान हंसते हुए सीआरपीएफ वालों से कहते हैं, ‘तुम्हारी डिमांड आ रही है भाई. लड़के कह रहे हैं कि भारतीय सीआरपीएफ को आगे करो.’ सीआरपीएफ का जवान इसके जवाब में कहता है, ‘अगर हम आगे आ गए तो इन्हें बहुत भारी पड़ जाएगा भाई.’

एक घंटे की पत्थरबाजी के बाद मीडिया के लोग अब लौटने लगे हैं. जब तक मीडिया मौजूद रहता है, सैन्य बल ज्यादा कठोर नहीं होते. वे सीमित संख्या में शेल्स चलाते हैं और उन्हें इन लड़कों से निपटने की कोई जल्दबाजी नहीं होती. लेकिन मीडिया के जाते ही यहां का नज़ारा कुछ बदलता है. कैमरे जब पास नहीं होते तो शेल्स ज्यादा तेजी से और ज्यादा संख्या में चलने लगते हैं.

पत्थरबाजी देखने वाले स्थानीय लोगों की संख्या भी यहां कम नहीं है. कई लोग जवानों के पीछे खड़े होकर ये लड़ाई देख रहे हैं. लेकिन थोड़ी-थोड़ी देर में सैन्य बल इन लोगों को डांट कर वहां से हटा देते हैं. जवानों को डर है कि उनके पिछली तरफ अगर भीड़ ज्यादा बढ़ गई तो उसकी आड़ में पत्थरबाज वहां घुस सकते हैं और तब वे दोनों तरफ से घिर जाएंगे. ऐसे में हालात पर काबू पाना बेहद मुश्किल हो सकता है इसलिए जवान अपने पीछे लोगों को जमा नहीं होने देते.

अचानक ही फिरन पहने एक कश्मीरी लड़का पुलिस की पिछली तरफ से चिल्लाता हुआ निकलता है और हाथों से ही गोलियां चलाने का नाटक-सा करते हुए आगे बढ़ता है. उसकी चीख से सैन्य बल के जवान हड़बड़ाकर पीछे घूमते हैं और उसकी तरफ बंदूक तान देते हैं. लेकिन उसे देखते ही जवान हंसते हुए कहते हैं, ‘यो-यो आया है.’

इस कश्मीरी लड़के को पूरा सोपोर ‘यो-यो’ और ‘हनी सिंह’ के नाम से जानता है. स्थानीय लोगों के अनुसार इसे 2010 में पुलिस ने थाने ले जाकर बुरी तरह से पीटा था जिसके बाद से इसका मानसिक संतुलन बिगड़ गया. अब यो-यो दिनभर पुलिस और सैन्य बलों के साथ ही घूमता रहता है. सभी जवान उसे पहचानते हैं और यो-यो कहकर ही बुलाते हैं. वह भी जवानों को देखकर मुस्कुराते हुए यो-यो चिल्ला देता है.

चार बजे तक पत्थरबाजी कुछ कम होने लगी है. लेकिन खतरा भी अब सबसे ज्यादा बढ़ गया है. क्योंकि अब कई लड़के गलियों से छिपकर पत्थर फेंक रहे हैं. वे इस फिराक में हैं कि किसी जवान को चोटिल करते ही भाग निकलें. पुलिस भी अब गलियों में टियर शेल्स छोड़ने लगी है. अब तक किसी को गंभीर चोट नहीं आई है. लेकिन गलियों के जिन घरों के बाहर ये शेल्स गिर रहे हैं, उन घरों में रह रहे लोगों की क्या हालत हो गई होगी, यह कहना मुश्किल है. इतना तो साफ़ दिखाई दे ही रहा है कि जाली लगी खिड़कियों में से यह धुआं तेजी से इन घरों में भर रहा है.

पत्थरबाजी अब धीमी जरूर हो गई है लेकिन बीच-बीच में इसमें अचानक ही तेजी आ जाती है. दर्शक अब भी यहां मौजूद हैं जिनमें बशीर अहमद कचरू भी एक हैं. पास के ही एक मोहल्ले के रहने वाले बशीर बेहद मायूसी से पत्थरबाजी के इस नज़ारे को देख रहे हैं. 2010 में सीआरपीएफ की गोली लगने से उनके बेटे मुद्दसिर की मौत हुई थी. मुद्दसिर तब 17 साल का उभरता हुआ फुटबॉल खिलाड़ी था. बशीर कहते हैं, ‘उसका कोई कसूर नहीं था. वो नमाज़ पढ़ के मस्जिद से निकला ही था कि उसे सीधे सीने पर गोली मार दी गई. इन बच्चों को देखकर मैं सहम जाता हूं. न जाने कश्मीर की लड़ाई में अभी और कितने बच्चे शहीद होंगे.’

पत्थरबाजों से निपटने के लिए स्थानीय पुलिस के जो जवान यहां तैनात हैं, वे सभी दूसरे जिलों के हैं. अपने जिलों में इन लोगों को कई स्वाभाविक कारणों से तैनाती नहीं दी जाती. लेकिन जेकेएपी के कश्मीरी जवानों में ऐसे कई हैं जो खुलकर पत्थर चला रहे लड़कों की आजादी की मांग को जायज़ ठहराते हैं. ये जवान कहते हैं, ‘सिर्फ इन लड़कों को ही नहीं, हमें भी आज़ादी चाहिए. हर कश्मीरी चाहता है कि कश्मीर आजाद हो. हम तो इस नौकरी में अपने ही लोगों की नज़रों में दुश्मन बन रहे हैं और बदले में सरकार रिस्क अलाउंस के नाम पर हमें 75 रूपये प्रति माह दे रही है.’

पत्थरबाजी लगभग अंधेरा होने तक जारी रहती है और आखिर में दोनों पक्ष अगले शुक्रवार को फिर से आमने-सामने होने का एक अनकहा वादा करते हुए अपने-अपने ठिकानों पर लौट जाते हैं. यह सिलसिला कश्मीर के लोगों की आम जिंदगी का अब एक हिस्सा जैसा बन चुका है. इसका अंदाज़ा इस बात से भी लगता है कि जिस वक्त सोपोर के मेन चौक से जामिया मस्जिद तक पत्थरों, टियर गैस और पेपर शेल्स की बरसात हो रही होती है, भारत की बर्बादी के और कश्मीर की आजादी के नारे लग रहे होते हैं, सैकड़ों लोग अपनी जान हथेली पर लिए एक खूनी खेल में उलझे होते हैं, उस वक्त बाकी के शहर में आम जनजीवन सामान्य जैसा ही चल रहा होता है. बिलकुल चौक से निकलते ही कबाब भुनते दिख जाते हैं और पुलिस के जो जवान अतिरिक्त सेना के तौर पर वहां मौजूद होते हैं, उन्हें खाते हुए भी दिख जाते हैं.

जुम्मे के दिन का ये नज़ारा सिर्फ सोपोर तक ही सीमित नहीं है. कश्मीर के लगभग हर जिले में ऐसी जगहें हैं जहां हर शुक्रवार बिलकुल यही नज़ारा होता है. पूरे कश्मीर में जुम्मे की नमाज़ के बाद करीब दो बजे एक साथ पत्थरबाजी शुरू होती है. इससे निपटने के लिए जब पुलिस या सैन्य बल ज्यादा बर्बर हो जाते हैं तो हालात और बिगड़ने लगते हैं. क्योंकि तब कश्मीर के लिए ‘शहीद’ होने वालों की संख्या कुछ और बढ़ जाती है और उससे जो आक्रोश पूरी घाटी में पैदा होता है, वह फिर से कई नौजवानों को ‘शहीद’ हो जाने की एक नई वजह दे देता है.

पिछले कई सालों से कश्मीर इसी दुष्चक्र में फंसा है और समाधान इसलिए नहीं निकल रहा क्योंकि जिन्हें समाधान करना है, वे मूल समस्या को कभी स्वीकारना ही नहीं चाहते.