सुप्रीम कोर्ट ने यमुना की सफाई से जुड़े 23 साल पुराने एक मामले को नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल (एनजीटी) को भेज दिया है. डेक्कन हेराल्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक सोमवार को चीफ जस्टिस जगदीश सिंह खेहर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड की बेंच ने कहा, ‘हमारे पास एक ही मुद्दे पर समानांतर सुनवाई करने का अधिकार नहीं है.’ यह मामला यमुना की सफाई की निगरानी से जुड़ा है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 1994 में एक खबर पर स्वयं संज्ञान लेते हुए शुरू किया था.
रिपोर्ट के मुताबिक शीर्ष अदालत ने कहा कि अगर एनजीटी में सुनवाई के दौरान कोई भी संवैधानिक सवाल खड़ा होता है तो एमीकस क्यूरी या न्यायमित्र रंजीत कुमार शीर्ष अदालत से संपर्क कर दिशा-निर्देश ले सकते हैं. हालांकि, सोमवार को इस मामले की सुनवाई के दौरान रंजीत कुमार ने यमुना की दुर्दशा को लेकर शीर्ष अदालत से सख्त निर्देश देने की मांग की. उन्होंने कहा कि बीते 23 सालों में यमुना की सफाई पर करोड़ों रुपये खर्च हो चुके हैं, लेकिन सूरत नहीं बदली है. उन्होंने यमुना की सफाई पर केंद्र के अलावा दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश सरकारों द्वारा खर्च किए गए करोड़ों रुपये का ऑडिट कराने की भी मांग की.
इस पर शीर्ष अदालत ने कहा कि एनजीटी ऐसे मामलों से काफी प्रभावी तरीके से निपट रहा है, इसलिए इस मामले को भी उसके पास भेजना ही अच्छा रहेगा. सुप्रीम कोर्ट पहले भी पर्यावरण से जुड़े ऐसे मामलों को एनजीटी के पास भेज चुका है. इससे पहले गंगा में प्रदूषण से जुड़ी पर्यावरणविद एमसी मेहता की याचिका को भी उसने एनजीटी के पास भेज दिया था.
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