अगर भाजपा जीतनराम मांझी को अपने साथ लाने में कामयाब नहीं होती है तो वह भी चाहेगी कि बिहार में यह नया गठबंधन आकार ले ले.
इसी साल सितंबर-अक्टूबर में होने वाले बिहार विधानसभा चुनावों में वहां के मतदाताओं को एक बिल्कुल नया गठबंधन देखने को मिल सकता है. इस नए गठबंधन को आकार देने के लिए पटना और दिल्ली के साथ—साथ हैदराबाद में भी बातचीत के दौर चल रहे हैं. इसकी अभी तक जो रूपरेखा देखने में आ रही है, उसके हिसाब से इसमें तीन प्रमुख साझेदार होंगे - जीतनराम मांझी, पप्पू यादव और असदुद्दीन ओवैसी.
जीतनराम मांझी हाल तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे हैं और बड़ी मुश्किल से जनता दल यूनाइटेड ने उन्हें मुख्यमंत्री के पद से हटाया था. इसके बाद उन्होंने हिंदुस्तान आवाम मोर्चा का गठन किया है. पप्पू यादव भी कुछ समय पहले तक राष्ट्रीय जनता दल में थे. राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की वंशवादी राजनीति का विरोध करने का नतीजा यह हुआ कि उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया. पप्पू यादव ने अब तक कोई पार्टी नहीं बनाई है. अगर जनता परिवार का विलय हो गया तो वे राष्ट्रीय जनता दल के नाम और चुनाव चिन्ह - लालटेन - पर अपना दावा ठोंकने की योजना बना रहे हैं.
हैदराबाद से चलकर बिहार के राजनीतिक अखाड़े में उतरने के पीछे असदुद्दीन ओवैसी की क्या सोच हो सकती है? जानकार इसके लिए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं.
बिहार के सियासी पटल पर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (एमआईएम) और इसके प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के दस्तक देने की योजना बिल्कुल नई है. सवाल यह उठता है कि हैदराबाद से चलकर बिहार के राजनीतिक अखाड़े में उतरने के पीछे उनकी क्या सोच हो सकती है? जानकार इसके लिए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं. इनका कहना है कि केंद्र की सत्ता में बैठे लोग और सत्ताधारी पार्टी के दूसरे नेता जितना अधिक हिंदुत्व की बात करेंगे, ओवैसी जैसे नेताओं के लिए अपनी सियासी जमीन का विस्तार करना आसान होगा.
पिछले एक साल में हुए कुछ चुनावों में एमआईएम को मिली सफलता इस बात की तसदीक करती है. महाराष्ट्र के औरंगाबाद में हुए निगम चुनावों में भले भाजपा-शिव सेना गठबंधन को बहुमत मिला हो लेकिन इन चुनावों में एमआईएम ने 23 सीटों पर जीत हासिल करते हुए कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को काफी पीछे छोड़ दिया. इन दोनों पार्टियों को केवल 10 और तीन सीटें ही हासिल हुईं. 2014 में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में भी एमआईएम को दो सीटों पर कामयाबी हासिल हुई.
ओवैसी इन सफलताओं से उत्साहित हैं और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराना चाहते हैं. यही वजह है कि वे कुछ महीनों से खासे सक्रिय दिख रहे हैं. जब भी सत्ताधारी पक्ष से कोई मुस्लिम विरोधी बयान आता है तो दूसरी तरफ बिना नागा, मोर्चा संभाले ओवैसी नजर आने लगते हैं. कुल मिलाकर देखा जाए तो ओवैसी खुद को मुसलमानों के सबसे बड़े प्रवक्ता के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं.
बिहार में यादव मतदाताओं की हिस्सेदारी 11 फीसदी है. जानकारों की मानें तो भले ही अब भी लालू प्रसाद यादवों के सबसे बड़े नेता हों लेकिन अब यादव मतदाता पूरे बिहार में एक तरह से वोट नहीं डालता.
जब असदुद्दीन ओवैसी से इस बारे में सीधा सवाल किया जाता है तो वे इसे सिरे से खारिज कर देते हैं. लेकिन उनकी राजनीति को देखने—समझने की कोशिश करने वाले यह मानते हैं कि ओवैसी न सिर्फ पारंपरिक सोच रखने वाले मुसलमानों को अपने साथ जोड़ना चाहते हैं बल्कि तर्कपूर्ण ढंग से अपनी बात रखकर नई सोच वाली नई पीढ़ी को भी अपने साथ लाना चाहते हैं. ओवैसी हर मंच पर यह भी कहते हैं कि वे सिर्फ मुसलमानों की राजनीति नहीं बल्कि गरीबों और वंचितों की राजनीति करते हैं. उनकी पार्टी के लोग इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाना नहीं भूलते कि मुसलमानों के गढ़ माने जाने वाले हैदराबाद में भी उनकी पार्टी ने तीन बार हिंदू मेयर बनाए हैं.
बिहार के बारे में यह कहना गलत नहीं होगा कि यह अब भी जात और जमात की राजनीति में उलझा हुआ है. यहां वोटों का ध्रुवीकरण आज भी इसी आधार पर होता है. ऐसे में मांझी, पप्पू यादव और ओवैसी को लगता है कि वे साथ हो गए तो कुछ खास वर्गों को अपनी ओर आकर्षित कर बिहार की राजनीति में अपनी धमक बढ़ा सकते हैं.
बिहार के कुल मतदाताओं में 14.3 फीसदी हिस्सेदारी मुसलमानों की है. पप्पू यादव और जीतन राम मांझी का मानना है कि यदि ओवैसी उनके साथ आ गए तो इस वोट बैंक में वे सेंध लगा सकते हैं. अब तक बिहार में यह माना जाता रहा है कि मुसलमान लालू यादव के साथ रहे हैं. लेकिन आज लालू की जो स्थिति है उसमें इन तीनों को लगता है कि वे मुसलमानों को लालू से अलग कर सकते हैं.
भाजपा को यह लग सकता है कि इस नए गठबंधन के चलते अगर नीतीश और लालू के वोटों में बिखराव हो जाएगा तो इसका सबसे अधिक फायदा उसे ही होगा.
बिहार में यादव मतदाताओं की हिस्सेदारी 11 फीसदी है. जानकारों की मानें तो भले ही अब भी लालू प्रसाद यादवों के सबसे बड़े नेता हों लेकिन अब यादव मतदाता पूरे बिहार में एक तरह से वोट नहीं डालता. सहरसा और मधेपुरा क्षेत्र के चार जिलों में पप्पू यादव का अच्छा प्रभाव माना जाता है. इन इलाकों के अधिकांश यादव उन्हें अपना नेता मानते हैं.
एक सबसे बड़े तबके की बात करें तों बिहार में दलितों की आबादी 15.1 फीसदी है. वहीं सूबे में अति पिछड़े मतदाताओं की हिस्सेदारी 38 फीसदी है. जीतन राम मांझी को लगता है कि इसमें से एक ठीक—ठाक हिस्सा उनके साथ आ सकता है.
कुल मिलाकर प्रदेश में जो जातिगत समीकरण हैं उनमें इन तीनों नेताओं को यह लगता है कि अगर ये ठीक से चुनाव लड़े तो बिहार की राजनीति में सत्ता की चाबी इनके हाथ आ सकती है. क्योंकि भाजपा, लोजपा और रालोसपा की गठबंधन अभी उतना मजबूत नहीं दिख रहा जितना लोकसभा चुनावों के वक्त था. और नीतीश और लालू जनता परिवार का गठबंधन तमाम विरोधाभासों में फंसकर बीरबल की खिचड़ी बन चुका है.
कुछ लोग तो यह भी कह रहे हैं कि अगर भाजपा मांझी को अपने साथ लाने में कामयाब नहीं होती है तो वह चाहेगी कि बिहार में यह नया गठबंधन आकार ले ले. भाजपा को यह लग सकता है कि इस नए गठबंधन के चलते अगर नीतीश और लालू के वोटों में बिखराव हो जाएगा तो इसका सबसे अधिक फायदा उसे ही होगा. क्योंकि जिस वोट बैंक पर इस नए गठबंधन की नजर है, उसमें भाजपा के मुकाबले नीतीश—लालू की जड़ें काफी ज्यादा गहरी हैं.