इस्माइल लहरी देश के जाने-माने कार्टूनिस्ट हैं और इंदौर में रहते हैं.

मैं कार्टूनिस्ट हूं. दुनिया को अपनी तरह के विजुअल्स में देखता हूं और पिक्सल्स में बदलने कोशिश करता हूं. जब मैं पैदा हुआ तो ठीक वैसे ही रोया था, जैसे दुनिया के तमाम बच्चे पैदा होते ही रोते हैं. जैसी ही मैं रोया तो घर में लोगों ने खुशियां मनाईं, मिठाइयां बांटी और ढोल बजाए. जाहिर है कि यह बात मुझे उस दिन नहीं मालूम थी, बहुत बाद में पता चली. यह पता चलते ही मेरे दिमाग में दुनिया की एक नई तस्वीर उभरी और मुझे इस बात का एहसास हुआ कि इस धरती पर कभी-कभी किसी के रोने पर कोई हंस भी सकता है.

उम्र बढ़ने के साथ मुझे कुछ और जरूरी बातें समझ आईं लेकिन यह धारणा भी अपनी जगह बनी रही. मेरा बालमन हमेशा इस कोशिश में रहता कि कोई ऐसा काम किया जाए जिसमें दूसरों को थोड़ा-बहुत हंसाया जा सके. कहते हैं न कि बचपन में ईश्वर हमारा दोस्त होता है और हमारा मार्गदर्शन करता है. मुझे लगता है कि मेरी इन कोशिशों को अंजाम देने के लिए ही ईश्वर ने मुझे कार्टून में रुचि दी है.

तो मेरे कार्टूनिस्ट बनने के सफर की शुरुआत एक तरह से बचपन में ही हो गई थी. स्कूल में भी यह किसी न किसी रूप में जारी रहा और वहीं एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने मेरे जीवन को दिशा दे दी. मैं मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले का रहने वाला हूं. वहीं के एक छोटे से गांव निवाली में मेरी पढ़ाई-लिखाई हुई. पढ़ने-लिखने, खासकर लिखने से तो मैं अच्छी-खासी दूरी बनाकर रखना पसंद करता था. लिखने में मैं इतना आलसी था कि जब भी कुछ बहुत सारा लिखने का काम आ जाता, तो मैं उसे पूरा करने के लिए अपने दोस्तों की मदद लेता था. खासकर लड़कियों की. मुझे लगता था (आज भी लगता है) कि लड़कियां लिखने में बड़ी तेज होती हैं और वो खूबसूरत हैंडराइटिंग में सुंदर अक्षर बना-बनाकर लिखती हैं.

मैं शायद नौवीं क्लास में पढ़ता था. हाई स्कूल में हमें विज्ञान की प्रैक्टिकल कॉपी बनानी पड़ती थी. इसे सुंदर हैंडराइटिंग में लिखे जाने की परंपरा थी, क्योंकि यह हमारी सालभर की मेहनत का रिकॉर्ड होता था. उस मेहनत का जो हम कभी करते ही नहीं थे, अच्छे से लिखने की कोशिश के अलावा. हमें सुंदर प्रैक्टिकल कॉपी बनाने के नंबर मिला करते थे. तो उस समय मैंने हमेशा की तरह क्लास की लड़कियों से डील कर ली कि वे मेरी प्रैक्टिकल कॉपी लिखेंगी और बदले में मैं उनकी कापियों के चित्र बनाउंगा. मैं मन ही मन खुश हो रहा था कि कैसी बुद्धू लड़कियां हैं, लिखने जैसा कठिन काम खुद कर रही हैं और चित्र बनाने जैसा आसान काम मुझे दे दिया है. अब मुझे इस बात का पूरा यकीन है कि वे भी मेरे बारे में ऐसा ही कुछ सोच रही होंगी, लेकिन यह वो घटना नहीं है जिसने मेरा जीवन बदला.

असल में इस तरह के चित्र बनाने के अलावा भी मैं अक्सर अपनी क्लास में बैठा-बैठा सहपाठियों के और शिक्षकों के टेढ़े-मेढ़े कार्टून खींचा करता था. उस दिन शायद हमारी प्रैक्टिकल की ही क्लास चल रही थी और मैं अपने शिक्षक का भद्दा-सा कार्टून बना रहा था. विषय गंभीर था और उसी गंभीरता के साथ हमारे शिक्षक हिम्मतराव सोनी जी बोर्ड पर कुछ लिखकर समझा रहे थे. पास बैठे मेरे एक दोस्त ने वो कार्टून देखा और अपनी हंसी रोक न सका. सन्नाटे में उसकी हंसी ऐसी गूंजी कि सारे लोग उसे देखने लगे. फिर क्या! सोनी सर का पारा गरम होना ही था. उन्होंने भारी गुस्से के साथ उससे कहा कि यह क्या बद्तमीजी है? उस दोस्त ने खुद को बचाने के चक्कर में असली बात बता दी कि मैंने उनका कार्टून बनाया है.

यह सुनना था कि अब मुझे काटो तो खून नहीं. मैं यह सोचकर ही अंदर तक कांप गया कि सर मुझे बहुत पीटेंगे या बाहर निकाल देंगे या फिर पिताजी को बुलावाएंगे और इस तरह के जाने कौन-कौन से डर पलभर में कौंध गए. सर ने मुझे खड़ा किया और उस कार्टून को गौर से देखा. उसके बाद जो हुआ वो बिल्कुल कल्पना से परे था. सपने जैसा, पर सपना नहीं. सर ने कंधे पर हाथ रखा और शाबासी दी, फिर कहा- ‘बेटा, कार्टून बनाना बहुत अच्छी बात है. तुम बड़े होकर कलाकार बन सकते हो पर कभी-भी क्लास के दौरान मत बनाओ. पढ़ते समय केवल पढ़ाई, उसके बाद कार्टून बनाओ.’ उनकी इन दो-तीन लाइनों ने मेरे भीतर जाने क्या असर किया कि मेरी आंखों में आंसू आ गए. यह देखकर सर प्यार से मुस्कराए और मुझे थपकी देते हुए ब्लैक-बोर्ड की तरफ मुड़ गए. क्लास में पढ़ाई फिर शुरू हो गई.

ऊपर-ऊपर से देखने पर यह घटना बहुत मामूली सी लगेगी. लेकिन जिस पल यह घटी, मेरे लिए मानो जीने-मरने का सवाल खड़ा हो गया था. सर के इस समझदारी भरे रवैये ने मुझे ऊर्जा से भर दिया. मुझे पूरा यकीन है कि अगर उस दिन मैं पिट जाता तो कभी कार्टूनिस्ट नहीं बन सकता था, वहीं उनके प्यार ने मुझे पूरी तरह बदल दिया. अब मैं मन लगाकर पढ़ाई करता और घर जाकर कुछ-कुछ कार्टून की प्रैक्टिस भी करता.

निरन्तर अभ्यास चलता रहा. हाथों में निखार आता गया. इसी का नतीजा है कि एक दिन एक अखबार में हल्का-फुल्का मौका मिल गया. लोगों की सराहना भरी प्रतिक्रियाओं ने मेरा उत्साह बढ़ाया और आखिरकार मेरी मेहनत ने मुझे कार्टूनिस्ट बनाकर ही छोड़ा. मेरे कार्टून लोगों को गुदगुदाते हैं इसलिए मैं इस पेशे में आकर खुश हूं. इससे मेरा वह उद्देश्य पूरा होता है जो मेरी पैदाइश वाले दिन शुरू हुआ था.