पंजाब में विधानसभा चुनावों के तकरीबन डेढ़ साल पहले से छह महीने पहले तक यह माना जा रहा था कि वहां आम आदमी पार्टी की सरकार बन सकती है. कहा जा रहा था कि दिल्ली के बाद पंजाब ऐसा दूसरा राज्य होगा जहां ‘आप’ सत्ता में आ सकती है. लेकिन आखिरी के छह महीनों में यह स्थिति बदल गई और चुनावी नतीजे आने से पहले ही यह लगने लगा था कि कांग्रेस पंजाब में वापस आ रही है.

पंजाब के चुनावी नतीजों में आम आदमी पार्टी को चौंकाने वाली दूसरी बात यह थी उसने भाजपा-अकाली गठबंधन की जितनी बुरी स्थिति की उम्मीद की थी, उसकी उतनी बुरी स्थिति नहीं हुई.

दिल्ली नगर निगम चुनावों में भी कमोबेश यही हुआ. हालिया विधानसभा चुनावों के नतीजे आने से पहले यह माना जा रहा था कि देश के तकरीबन हर राज्य के स्थानीय निकाय चुनाव जीतने वाली भाजपा को दिल्ली में कड़ी चुनौती मिलने वाली है. कुछ उत्साही लोग तो यह भी कह रहे थे कि इस बार दिल्ली के तीनों निगमों में आप को बहुमत मिलने वाला है. लेकिन अंतिम बाजी यहां भी आप के हाथ नहीं लगी.

दरअसल, दिल्ली में स्थिति बदलनी शुरू हुई 11 मार्च, 2017 से. इसी दिन पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आए. उत्तर प्रदेश में भाजपा को ऐतिहासिक बहुमत मिला. पंजाब में सरकार बनाने को लेकर पूरी तरह आश्वस्त आम आदमी पार्टी ने जश्न की पूरी तैयारी कर ली थी लेकिन नतीजे उसके पक्ष में नहीं आए. उत्तराखंड में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला. बहुमत से पीछे होने के बावजूद भाजपा ने गोवा और मणिपुर में सरकार बनाने में कामयाबी हासिल कर ली.

इन सबका असर दिल्ली पर पड़ा. दिल्ली राजनैतिक तौर पर ऐसा है कि यहां के चुनावों पर किसी भी बड़ी राजनीतिक घटना का असर बहुत जल्दी होता है और यहां का सियासी मूड बदल जाता है. इसे एक उदाहरण के जरिए समझते हैं. 2013 के अंत में जब दिल्ली विधानसभा चुनावों के नतीजे आए तो किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला. लेकिन 2014 में जब लोकसभा चुनाव हुए तो सभी सात संसदीय सीट भाजपा के खाते में चली गईं. फिर इसके साल भर के अंदर हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा को सात विधानसभा सीटें भी नहीं मिलीं. उसे तीन सीटों पर संतोष करना पड़ा और कांग्रेस शून्य पर चली गई. 70 सीटों वाली विधानसभा में दिल्ली की जनता ने आप को 67 सीटें दे दीं.

इस पृष्ठभूमि में अगर दिल्ली नगर निगम चुनावों के नतीजों को समझने की कोशिश करें तो तस्वीर साफ हो जाती है. पंजाब में आप की हार से जहां एक तरफ उसके कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटा, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली के आम लोगों को लगने लगा कि आज भाजपा जिस स्थिति में है, उसमें आप या खुद अरविंद केजरीवाल उसका मुकाबला करने की स्थिति में नहीं हैं.

इसके अलावा केजरीवाल सरकार के अब तक के कार्यकाल को लेकर भी जो सवाल विपक्ष उठा रहा था, उन पर दिल्ली के आम लोग बात करने लगे. दरअसल, केजरीवाल पहाड़ सरीखी उम्मीदों पर सवार होकर दिल्ली के मुख्यमंत्री बने. ऐसे में भले उनके पद की संवैधानिक स्थिति को देखते हुए जानकार लोग उनसे बड़े बदलावों की उम्मीद नहीं रखते हों. लेकिन एक निश्चित समय तक इंतजार के बाद आम लोगों का उनकी सरकार से मोहभंग होना स्वाभाविक है. विपक्ष ने या यों कहें कि भाजपा ने बड़े रणनीतिक ढंग से इसका फायदा उठाया.

इन चुनावों में आम आदमी पार्टी की दुर्गति का पहला संकेत तो राजौरी गार्डन विधानसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव से ही मिल गया था. आप विधायक जरनैल सिंह के इस्तीफे से खाली हुई सीट को भाजपा उम्मीदवार ने बड़े अंतर से जीता. आश्चर्य की बात यह थी कि इस सीट पर आप दूसरे नंबर पर भी नहीं रही. लेकिन उस वक्त इसे पार्टी ने एक सीट विशेष का मामला बताया.

हालांकि, जिस आक्रामक ढंग से केजरीवाल इलैक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन पर पूरे चुनाव अभियान में सवाल उठा रहे थे, उसकी व्याख्या कई राजनीतिक जानकारों यह कहकर भी कर रहे थे कि केजरीवाल को अपनी हार का अंदाज लग गया है.

अब सवाल यह उठता है कि इन नतीजों के बाद आम आदमी पार्टी और केजरीवाल के लिए आगे का क्या रास्ता है? इनमें सबसे पहली बात तो यह है कि आम लोगों में पार्टी की साख गिरी है और उसके समर्थक वर्ग में कमी आ रही है. इन चुनावों में आप की यह स्थिति देखकर उसके पक्ष में मतदान करने वालों में निराशा आना स्वाभाविक है. संभव है कि आने वाले दिनों में जो चुनाव हों, उनमें वे दूसरे विकल्पों पर विचार करने की दिशा में बढ़ जाएं.

लेकिन चुनावी राजनीति को समझने वाले लोगों से पूछा जाए तो वे इससे बड़ी चुनौती दूसरी मानते हैं. ऐसे लोगों का कहना है कि समर्थक तो आते-जाते रहते हैं, असल चीज होती है संगठन. इनका कहना है कि निगम चुनावों के नतीजों के बाद सबसे बड़ा संकट आम आदमी पार्टी के संगठन पर है. भाजपा जिस तरह से हर जगह दूसरी पार्टियों के नेताओं का आयात कर रही है, आने वाले दिनों में आप के कई नेताओं के भाजपा से जुड़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. नए सक्षम लोग आप से जुड़ने में परहेज करेंगे. ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि केजरीवाल अपने संगठन को बचाए रखें.

जो लोग राजनीतिक संगठनों की आंतरिक कार्यप्रणाली को समझते हैं, वे एक दूसरी समस्या की ओर इशारा करते हैं. इनका कहना है कि किसी भी पार्टी को मिलने वाला आर्थिक सहयोग उसकी मौजूदा राजनैतिक हैसियत और भविष्य की संभावनाओं पर आधारित होता है. आप को अब इस मोर्चे पर भी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा.

ऐसे में अन्ना आंदोलन की रूपरेखा तैयार करने से लेकर आप बनने के दौरान केजरीवाल के साथ काम करने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं कि उन्हें पहला काम यह करना चाहिए कि योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और आनंद कुमार को वापस पार्टी में लाने के गंभीर प्रयास करने चाहिए. उनका कहना है कि इससे न सिर्फ कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ेगा बल्कि आम लोगों को भी यह लगेगा कि केजरीवाल अपनी गलतियों को सुधारने की दिशा में बढ़ रहे हैं.

दूसरा उन्हें जगह-जगह और बेकार में पार्टी की ऊर्जा और संसाधन व्यय करने के बजाय उन्हें सोच-समझकर एक या दो स्थान पर लगाने और वहां कुछ कर दिखाने पर जोर देना चाहिए.