बीते बुधवार को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) के संवेदी सूचकांक ‘सेंसेक्स’ ने एक बार फिर 30 हजार के स्तर को छू लिया. 26 अप्रैल 2017 इसलिए भी यादगार रहेगा कि इसी दिन सेंसेक्स पहली बार खुलने से बंद होने तक 30 हजार के पार रहा. नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) का ‘निफ्टी’ भी अपने सर्वकालिक उच्च स्तर पर जाकर बंद हुआ. बीच में थोड़ी गिरावट के बाद यह फिलहाल फिर 30 हजार के पार पहुंच गया है.

सेंसेक्स ने 30 हजार तक का मनौवैज्ञानिक स्तर सबसे पहले चार मार्च 2015 को पार किया था. लेकिन उसके बाद शेयर बाजार गिरता ही चला गया. मार्च 2016 से बाजार में एक बार फिर सुधार का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह नवंबर में नोटबंदी के फैसले और डोनाल्ड ट्रंप की अप्रत्याशित जीत से प्रभावित तो जरूर हुआ पर थमा नहीं.

पिछले 12 महीनों में सेंसेक्स में करीब 36 फीसदी की वृद्धि हो चुकी है. जानकारों की नजर में सेंसेक्स की यह तेजी ऐतिहासिक और अर्थव्यवस्था में वास्तविक सुधार का संकेत है. लेकिन अब कइयों के मन में यह सवाल भी उभरने लगे हैं कि क्या इस बार शेयर बाजार की तेजी बरकरार रह पाएगी या पहले की तरह गिरावट का लंबा दौर फिर शुरू हो जाएगा.

2014-15 में बाजार की उछाल राजनीतिक वजहों से थी

विश्लेषकों का मानना है कि मार्च 2014 से मार्च 2015 के बीच बाजार में जो तेजी आई थी उसके पीछे अर्थव्यवस्था की मजबूती के बजाय केंद्र की राजनीति में नरेंद्र मोदी का उदय जिम्मेदार था. कॉरपोरेट जगत को प्रधानमंत्री के रूप में मोदी से बहुत उम्मीदें थीं. इस चलते उस दौरान महज 12 महीनों में सेंसेक्स ने 22 हजार से 30 हजार का सफर तय कर लिया.

जानकारों के अनुसार, तब शेयरों के मूल्य वास्तविक मूल्यांकन से आगे निकल गए थे. लेकिन मोदी सरकार से की गई उम्मीदें आसानी से पूरी होते नहीं दिखीं. साथ ही लगातार दूसरे साल सूखा पड़ने की आशंका जताई गई जो सही भी साबित हुई. इन वजहों से बाजार गिरता चला गया. घरेलू निवेशकों की स्थिति तो पहले से ही खराब थी, विदेशी निवेशकों ने भी उम्मीद से कम निवेश किया. इसका परिणाम यह हुआ कि मार्च 2015 से मार्च 2016 तक बाजार गिरता ही रहा.

बाजार में वास्तविक मजबूती 2016-17 से ही आई

पिछले साल नए वित्त वर्ष की शुरुआत से अर्थव्यवस्था में फिर सुधार होना शुरू हुआ. मानसून के बेहतर रहने और मोदी सरकार की आर्थिक सुधार की कोशिशें परवान चढ़ने से सितंबर 2016 से अर्थव्यस्था में सुधार के पुख्ता संकेत मिलने लगे. नोटबंदी ने परेशानी जरूर खड़ी की लेकिन जल्द ही इससे पैदा हुई मुश्किलें दूर हो गईं. अब आलोचक भी मान रहे हैं कि अर्थव्यवस्था के हालात सामान्य होने लगे हैं. अर्थव्यवस्था के कई बुनियादी संकेतकों में मजबूती अर्थव्यस्था के स्थिर होते जाने का प्रमाण है. ऐसे में शेयर बाजार की उछाल इस बार लंबी अवधि तक बने रहने के आसार हैं. इसके प्रमुख कारणों पर विस्तार से नजर डालते हैं.

1 - घरेलू निवेश में वृद्धि

जानकारों की नजर में शेयर बाजार की मजबूती के पीछे जो सबसे महत्वपूर्ण कारण दिख रहा है वह घरेलू निवेशकों का बाजार की ओर लौटना है. इसका प्रमाण नोटबंदी की अवधि यानी नवंबर और दिसंबर का महीना है. इस दौरान विदेशी निवेशकों ने देश से करीब 26 हजार करोड़ रुपए बाजार से निकाल लिए. इसी दौरान ​घरेलू निवेशकों ने बाजार में 23 हजार करोड़ रुपए का निवेश किया. यानी इस मुश्किल समय में निवेश में महज तीन हजार करोड़ रु की कमी आई. विश्लेषक मानते हैं कि यदि घरेलू निवेशकों का निवेश न होता तो 2016 के अंत में बाजार में भारी गिरावट हो सकती थी. अब निजी कंपनियों की ओर से पूंजीगत व्यय फिर से शुरू हो गए हैं. जानकारों की नजर में यह सरकार के कदमों से अर्थव्यवस्था के मजबूत होने से हुआ है.

2 - बढ़ती मांग

घरेलू उपभोग के आंकड़ों में भी सुधार दिख रहा है. उम्मीद जताई जा रही है कि जल्द ही इसमें और तेजी आएगी. जनवरी से मार्च की तिमाही में कंपनियों के मुनाफे उम्मीद से बेहतर आ रहे हैं. यह भी इसकी पुष्टि करता है कि अलग-अलग क्षेत्रों में मांग बढ़ी है. इससे भी बाजार में तेजी बढ़ने की उम्मीद है.

3 -सुधार समर्थक सरकार का लगातार मजबूत होना

शेयर बाजार की तेजी की एक और वजह केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को विभिन्न राज्यों में लगातार मिल रही जीत है. बाजार का मानना है कि इससे राज्यसभा में पार्टी की स्थिति सुधरेगी और राजनीतिक मोर्चे पर देश में स्थिरता बढ़ेगी. इससे केंद्र की मोदी सरकार का रवैया सुधारों के पक्ष में आक्रामक हो सकता है. केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी हाल में कहा कि उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में भाजपा को मिली जीत उसके आर्थिक सुधारों का जनता द्वारा समर्थन है. उन्होंने यह भी कहा कि आर्थिक सुधारों के 25 साल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि देश की जनता को आर्थिक सुधारों से डर नहीं उम्मीदें दिख रही हैं. जानकारों का मानना है कि निवेशकों में इन वजहों से उत्साह है. वे अब मध्यम अवधि से लंबी अवधि के निवेश करने में नहीं हिचकेंगे.

4 - अमेरिका का सुधरता प्रदर्शन

शेयर बाजार की यह तेजी आगे भी जारी रहेगी, इस उम्मीद की चौथी वजह दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यस्था अमेरिका का आर्थिक मोर्चे पर सुधरता प्रदर्शन है. अमेरिका का प्रदर्शन सुधरने से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और शेयर बाजारों में तेजी देखी जा रही है. इस वजह से भारत का भी निर्यात अब नकारात्मक वृद्धि के दौर से निकल चुका है.

अमेरिका की डोनाल्ड ट्रंप सरकार ने अगस्त 2017 तक पिछले 31 सालों का सबसे बड़ा कर सुधार करने का ऐलान कर दिया है. इसके तहत कॉरपोरेट कर की दरों को 35 से घटाकर 15 फीसदी किया जाएगा और कर की सबसे उच्च दर को भी 40 से घटाकर 35 फीसदी तक सीमित किया जाएगा. जानकारों का मानना है कि इससे अमेरिका की कंपनियों का मुनाफा बढ़ेगा और कारोबार में तेजी आएगी.

5 - वस्तु और सेवा कर

वस्तु और सेवा कर यानी जीएसटी को पहली जुलाई से लागू किए जाने का अनुमान है. देश के इतिहास के सबसे बड़े अप्रत्यक्ष कर सुधार से देश की अर्थव्यवस्था को जबरदस्त फायदा होने का अनुमान है. हालांकि इसे अपनाने में कंपनियों को अगले कुछ महीनों तक भारी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है. लेकिन कंपनियां आश्वस्त हैं कि लंबे समय में नई व्यवस्था उन्हें फायदा पहुंचाएगी.

6 - बैंकिंग सुधारों को लेकर सरकार की गंभीरता

अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले बैंकों को लेकर सरकार संजीदा है. सरकारी बैंकों के फंसे हुए कर्ज यानी एनपीए, उनके पुनर्पूंजीकरण और बैंकों के आपसी विलय को लेकर लगातार कदम उठा रही है. इससे अगली कुछ तिमाहियों में बैंकों का प्रदर्शन और सुधरेगा. इससे बैंकोंं के शेयर निवेशकों को आकर्षित करेंगे.

7 - मानसून के लगभग सामान्य रहने की उम्मीद

मानसून के जो शुरुआती अनुमान सामने आए हैं उससे पता चलता है कि इस बार देश में करीब 96 फीसदी बारिश हो सकती है. यह तकरीबन सामान्य स्थिति होगी. इससे देश के प्राथमिक सेक्टर कृषि की विकास दर सामान्य रहने की उम्मीद बनी है.

8 - रुपए की मजबूती
डॉलर की तुलना में रुपया भी लगातार मजबूत हो रहा है. ऐसा देश में विदेशी निवेश बढ़ने से रुपए की बढ़ती मांग के चलते भी हो रहा है. जानकारों का मानना है कि रुपये के मजबूत होने से आयात किए जाने वाले कई सामान सस्ते होंगे और देश में महंगाई कम होगी. इससे मध्यम अवधि में ब्याज दरों में कमी होने की उम्मीदें बढ़ गई हैं. इससे भी बाजार में निवेशक करने वालों की उम्मीदें मजबूत हुई हैं.

9 - फ्रांस में बाजार समर्थक राष्ट्रपति बनने की उम्मीद
फ्रांस में यूरोपीय संघ और बाजार के समर्थक माने जाने वाले इमैनुएल मैक्रों ने पहले चरण के चुनाव में बढ़त बना ली है. चुनाव विश्लेषकों की नजर में उनके विजयी होने के आसार सबसे अधिक हैं. उनकी विरोधी मरीन ली पेन यूरोपीय संघ की विरोधी मानी जाती हैं. मैक्रों की जीत की संभावनाओं से भी पूरी दुनिया के बाजारों को मजबूती मिली है. यदि वे जीतते हैं तो कॉरपोरेट जगत के लिए यह सकारात्मक खबर होगी.

आलोचकों की राय

हालांकि कई जानकार इस तेजी को लेकर आशंकित भी हैं. उनका मानना है कि बाजार में इस समय तरलता ज्यादा है. इस चलते कई कंपनियों के शेयर ‘ओवर वैल्यूड’ हैं. इससे निकट भविष्य में बाजार में मुनाफावसूली होगी. वहीं कई जानकार बॉन्ड मार्केट की तेजी को लेकर आशंकित हैं. वे मानते हैं कि बॉन्ड मार्केट की तेजी का गुब्बारा कभी भी फट सकता है. ये दोनों कारण बाजार में गिरावट का कारण बन सकते हैं.

निष्कर्ष

हालांकि ज्यादातर विश्लेषक इस बात से सहमत हैं कि मुनाफावसूली के चलते बाजार में गिरावट आ सकती है. लेकिन यह ज्यादा समय तक नहीं रहेगी. उनके मुताबिक अब भारत की अर्थव्यवस्था के बुनियादी संकेतक बता रहे हैं कि देश के शेयर बाजार और कंपनियों के और आगे जाने की गुंजाइश है.