इस हफ्ते की सात तारीख को फ्रांस अपना नया राष्ट्रपति चुनने जा रहा है. चुनाव स्वतंत्र उम्मीदवार और फ्रांस में उदारवाद का नया चेहरा बनकर उभरे इमानुएल माक्रों और घोर दक्षिणपंथी मरीन ले पेन के बीच होना है. यूरोप सहित पूरी दुनिया के राजनीतिक विश्लेषकों की निगाहें इस चुनाव पर लगी हुई हैं. सभी देखना चाहते हैं कि क्या फ्रांस भी उसी राह चलेगा जिस पर चलकर बीते साल ब्रिटेन में ब्रेक्जिट का विकल्प और अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप को चुना गया.

राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया

फ्रांस के मौजूदा कानून के अनुसार यदि किसी नेता को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनना है तो उसे सबसे पहले अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में देश के 500 मेयरों के हस्ताक्षर करवाने जरूरी हैं. इसके बाद फ्रांस का सुप्रीम कोर्ट इन हस्ताक्षरों की प्रमाणिकता की जांच करता है और उम्मीदवारी के लिए अंतिम मंजूरी देता है. फ्रांस में राष्ट्रपति का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है. आम तौर पर राष्ट्रपति चुनाव दो चरणों में होता है लेकिन, यदि कोई उम्मीदवार पहले चरण में 50 फीसदी से ज्यादा मत हासिल करने में कामयाब हो जाता है तो उसे विजयी घोषित कर दिया जाता है और इस स्थिति में दूसरे चरण का चुनाव नहीं कराया जाता. लेकिन, यदि पहले दौर में कोई भी उम्मीदवार 50 फीसदी से ज्यादा वोट नहीं हासिल कर पाता तो दूसरे दौर का चुनाव कराया जाता है. पहले दौर में शीर्ष पर रहे दो उम्मीदवारों के बीच ही दूसरे दौर में वोटिंग होती है. इस साल 23 अप्रैल को हुए मतदान में इमानुएल माक्रों 24.1 फीसदी वोट पाकर पहले स्थान पर रहे जबकि, मरीन ले पेन 21.3 फीसदी वोट के साथ दूसरे स्थान पर रहीं. 7 मई को इन दोनों के बीच ही दूसरे और अंतिम दौर का मुकाबला होगा.

राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री में से कौन ज्यादा अहम है?

फ्रांस में प्रधानमंत्री फ्रांसीसी सरकार का प्रमुख होता है. लेकिन, वहां का राष्ट्रपति उसके अधीन नहीं होता. प्रधानमंत्री का संसदीय कामकाज में ज्यादा दखल होता है जबकि, राष्ट्रपति के हाथ में राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेशी मामलों जैसी महत्वपूर्ण शक्तियां होती हैं. फ्रांस में संसदीय चुनाव राष्ट्रपति चुनाव के करीब एक महीने बाद कराया जाता है. इस साल का संसदीय चुनाव दो चरणों में 11 और 18 जून को होगा. संसदीय चुनाव के बाद फ्रांस का राष्ट्रपति ही इन चुनावों में बहुमत पाने वाली पार्टी के नेता को प्रधानमंत्री के रूप में चुनता है. कई बार ऐसा भी होता है राष्ट्रपति की पार्टी को संसदीय चुनाव में बहुमत न मिलने पर उन्हें अपनी विरोधी पार्टी के नेता को प्रधानमंत्री चुनने के लिए मजबूर होना पड़ता है.

इस बार के चुनाव में उम्मीदवार और उनकी लोकप्रियता

फ्रांस में इस बार के राष्ट्रपति चुनाव में 11 उम्मीदवार मैदान में थे. लेकिन, मुख्य मुकाबला पांच उम्मीदवारों के बीच ही माना जा रहा था. मतसर्वेक्षणों में इन पांच में से नेशनल फ्रंट पार्टी की मरीन ले पेन और पूर्व बैंकर इमानुएल माक्रों को सबसे लोकप्रिय उम्मीदवार बताया जा रहा था. पहले दौर के चुनाव के नतीजों में भी यही दोनों सबसे आगे रहे हैं. इन दोनों के अलावा साम्यवादी विचारधारा वाले जौं-लुक मेलान्शों को तीसरा सबसे लोकप्रिय चेहरा माना जा रहा था लेकिन, वे पहले दौर के नतीजों में 19.58 फीसदी वोट पाकर चौथे नंबर पर रहे.

इस साल की चुनावी दौड़ में फ्रांस की प्रमुख पार्टी रिपब्लिकन की ओर से फ्रोंस्वा फ़ियों और सत्ताधारी सोशलिस्ट पार्टी की ओर से बेनोआ आमों मैदान में थे. लेकिन, फ्रोंस्वा फ़ियों के एक स्कैंडल में फंसने और सोशलिस्ट पार्टी की सरकार के प्रति लोगों की नाराजगी के चलते इन दोनों की स्थिति शुरू से ही अच्छी नहीं मानी जा रही थी. हालांकि, पहले दौर के नतीजों में फ्रोंस्वा फ़ियों उम्मीद से अच्छा प्रदर्शन किया और 20.01 फीसदी वोटों के साथ तीसरे पायदान पर रहे. लेकिन, बेनोआ आमों को महज 6.36 फीसदी वोट ही मिल सके.

आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा

फ्रांस के इस बार के चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा इस्लामिक आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा बना हुआ है. इसका कारण साल 2015-2016 में हुए कई आतंकी हमले हैं. जहां एक वर्ग मरीन ले पेन को आतंकवाद के खिलाफ सबसे मजबूत उम्मीदवार मानता है. वहीँ, दूसरा वर्ग उन्हें फ्रांस में उदारवाद के लिए खतरनाक मानता है.

फ्रांस में आतंकी हमलों को देखते हुए नवंबर 2015 से आपातकाल लागू कर दिया गया था जो अभी भी लागू है. फ्रांस के संविधान के अनुच्छेद 16 के द्वारा राष्ट्रपति को आपातकाल लागू करने का अधिकार है. इससे राष्ट्रपति की शक्तियों में भारी इजाफा हो जाता है. पिछले साल आतंकी हमलों की संभावना को देखते हुए फ्रांस की संसद ने आपातकाल के दौरान राष्ट्रपति की शक्तियों में और भी कई तरह बढ़ोत्तरी कर दी.

कुछ लोगों के डर का यही कारण है, ये लोग मानते हैं कि यदि मुस्लिम विरोधी और घोर दक्षिणपंथी मरीन ले पेन राष्ट्रपति बन गई तो वे आपातकाल के दौरान राष्ट्रपति की बढ़ाई गई शक्तियों का दुरूपयोग कर सकती हैं. इस संभावना के चलते हाल ही में फ्रांस के कुछ वकीलों और न्यायविदों के एक समूह ने वहां के लोगों से पेन को वोट न देने की अपील की है. इन्होंने एक पत्र जारी कर कहा है कि फ्रांस का वर्तमान संविधान राष्ट्रपति को बहुत अधिक शक्ति दे देता है और ऐसे में ले पेन का राष्ट्रपति बनना फ़्रांसीसी लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा साबित हो सकता है.

बन्लुज भी चुनाव का रुख तय करेंगे

बन्लुज फ्रांस के बड़े शहरों के बाहर स्थित उन बस्तियों को कहते हैं जिनमें अप्रवासी, निम्न मध्यमवर्गीय और मजदूर रहते हैं. इन बस्तियों में रहने वालों की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी होती है. फ्रांस में रह रहे कुल मुसलमानों (जो आबादी का आठ फीसदी हिस्सा हैं) में से अधिकांश इन्हीं बस्तियों में रहते हैं. 2012 के चुनाव में तत्कालीन राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी ने इन बस्तियों को देश की सबसे बड़ी समस्या बताया था जिसके बाद इन बस्तियों में रहने वालों के 90 फीसदी तक वोट सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार फ्रांस्वा ओलांद को मिले थे. इस बार के चुनाव में ले पेन ने इन बस्तियों में रहने वाले मुस्लिमों पर जमकर निशाना साधा है और इन्हें फ्रांस के लिए खतरनाक बताया है. साथ ही पेन ने इन बस्तियों में रहने वाले लोगों के आर्थिक और सांस्क्रतिक पिछड़ेपन के लिए उनकी आदतों को ही जिम्मेदार ठहराया है.

दक्षिणपंथी मरीन ले पेन के जीतने की कितनी संभावना ?

फ्रांस में ले पेन और इमानुएल माक्रों के बीच कांटे का मुकाबला माना जा रहा है. ले पेन के चुनाव प्रचार की रणनीति लगभग वैसी ही है जैसी अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की थी. माना जाता है कि चुनाव से पहले अमेरिका में हुए आतंकी हमले और उसके बाद ट्रंप के मुस्लिम विरोधी बयानों ने उन्हें चुनाव में बड़ा फायदा पहुंचाया था. फ्रांस में ले पेन को लेकर भी ऐसा ही माना जा रहा है.

फ्रांस में पिछले सालों में हुए आतंकी हमलों और ले पेन के नस्लभेद और मुस्लिम विरोधी बयानों ने उन्हें युवाओं के बीच खासा लोकप्रिय बना दिया है. इसके अलावा उनके यूरोपीय संघ (ईयू) विरोधी रुख की वजह से फ्रांस में ईयू को पसंद न करने वाला एक बड़ा वर्ग भी उनसे जुड़ गया है. लेकिन, इस सबके बावजूद पहले दौर में आगे रहे इमानुएल माक्रों को अधिकतर चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में पेन से आगे बताया जा रहा है. हालांकि, इन सर्वेक्षणों में एक तिहाई मतदाता ऐसे भी हैं जिन्होंने अभी तक अपना रुख स्पष्ट नहीं किया है.

(यह आलेख मूल रूप से द कनवर्जेशन पर प्रकाशित हुआ है)