झुंझनू आने में अभी समय है, मैं बैग से डायरी निकाल कर वे सारे नाम दोहरा लेता हूं, जिनसे मिलना है. पहला नाम है कैप्टन अली हसन खान. अली हसन ने ही दो साल पहले प्रधानमंत्री कार्यालय को खत लिखकर यह जानकारी दी थी कि झुंझनू का मुस्लिम बहुल गांव ‘धनूरी’ राजस्थान में सर्वाधिक सैनिक कुर्बानियां देने वाला गांव है. इस खत में प्रथम विश्वयुद्ध से लेकर कारगिल तक के उन सभी शहीदों की जानकारी शामिल थी जो धनूरी से ताल्लुक रखते थे. आंकड़ों की तरफ देखें तो राजस्थान से फौज में भर्ती होने वाले सर्वाधिक युवा शेखावाटी (सीकर-झुंझनू जिले) से ही आते हैं. हाल ही में छत्तीसगढ़ के सुकमा नक्सली हमले के शहीदों में से एक, बन्नाराम भी सीकर से ही थे.

डायरी में दूसरा नाम 90 साल की सायरा बानो का है. उनके पति दूसरे विश्वयुद्ध में शहीद हो गए थे. पन्ने के दूसरी तरफ भारत-पाक युद्ध (सन 71) में शहीद हुए वीर-चक्र से सम्मानित मेजर महमूद हसन खान और कारगिल में शहीद हुए जीडीआर रमजान खान से जुड़ी कुछ जानकारियां हैं.

कम भीड़-भाड़ वाले झुंझनू स्टेशन के बाहर एक डीज़ल रिक्शा वाले से धनूरी की दूरी पूछने पर जवाब मिलता है, ‘आधो घंटो.’ राजस्थान के कई दूसरे इलाकों की तरह यहां भी दूरी को किलोमीटर की बजाय आज भी घंटों और मिनटों में ही नापा जाता है.

धनूरी आने पर रिक्शा सड़क किनारे रूक जाता है. पास की दुकान पर एक युवक नजर आता है. फौजियों, शहीदों के परिवार वालों के बारे में पूछने पर वह कहता है, ‘फिर तो मुझसे ही मिल लो. इस दुकान वाले से मिल लो’. पास ही में तिरपाल की छांव तले बस के इंतजार में उकड़ू बैठे दो बुजुर्गों की तरफ इशारा करते हुए, ‘उनसे मिल लो. वे तो फौज में ही थे. यहां तो हर घर से कोई न कोई सेना में है.’

धनूरी-झुंझनू
धनूरी-झुंझनू

सभी के नाम पूछने पर वह युवक बताता है, ‘दुकान वाले भाई का नाम है अब्दुल हमीद, चचा का सब्बीर खान और मेरा इस्माइल.’ इस्माइल आगे खुद ही बताने लगता है, ‘हमें इस बात का फख़्र है भाई जी कि हमारे यहां से लोग पांच-पांच पीढ़ियों से फौज में भर्ती हो रहे हैं. मेरे वालिद भी फौज में थे और मेरा भाई भी फौज में ही है.’ यह सुनकर सोशल मीडिया पर चल रही वे सारी पोस्ट आंखों के सामने आ जाती हैं जिनमें देश के प्रति मुसलमानों की वफादारी हमेशा कटघरे में खड़ी रहती है. ‘आपने कोशिश नहीं की सेना में जाने की?’ मैं पूछता हूं. ‘की थी लेकिन रह गया’ कुछ दुखी से स्वर में जवाब मिलता है.

फौजियों को मिलने वाली सुविधाओँ से जुड़ा सवाल पूछने पर वह थोड़ा गंभीर हो जाता है. ‘पता है भाई जी उस समय उतना दुख नहीं होता जब कोई सैनिक शहीद होता है, अफसोस तो तब होता है जब शहीदों के परिवार वालों, जंग के अपाहिजों और रिटायर्ड फौजियों को अपने हक के लिए दफ्तरों की ख़ाक छाननी पड़ती है’ इस्माइल आगे कहता है, ‘आप गांव में चल कर देखना, बिल्कुल साधारण सा गांव है जहां सुविधा के नाम पर कुछ नहीं है. सालों से कोशिश कर रहे हैं स्कूल 12वीं तक करवाने की लेकिन वह तक नहीं हुआ.’

चलते-चलते इस्माइल से आखिरी बात पूछता हूं, ‘गोरक्षा के नाम पर जो हो रहा है, उस पर क्या कहना है?’ इस्माइल व्यंग्य भरी मुस्कराहट के साथ जवाब देता है, ‘हमारे यहां पर भी सक्रिय हैं ऐसे ही कुछ गोरक्षक. आप गायों को ले जाने की सूचना पुलिस को दो, पता नहीं कैसे, पहुंचते गोरक्षक हैं! पिछले दिनों गाएं ले जा रहे एक आदमी ने उनको पैसे देने से मना कर दिया तो उसके साथ मारपीट कर उसकी गायें और बछड़े छुड़वा दिए. अब वो पूरे गांव में चारे-पानी के लिए भटकते फिर रहे हैं.’

आज की वीरांगनाएं

इस्माइल से बातचीत पूरी हो गयी है. शहीदों के घर का पता पूछने पर वह खुद ही बाइक पर बिठाकर रमजान खान के घर चल देता है. यहां हमारी मुलाकात होती है वीरांगना अलहमदो बानो से. इस इलाके में किसी शहीद सैनिक की विधवा को यही ओहदा दिया जाता है.

पूछने पर बानो अपनी भाषा में बताने लगती हैं, ‘रमजान 14 ग्रेनेडियर्स में जीडीआर पोस्ट पर काम करतां. कुपावाड़ा में 1997 में शहादत हुई.’ बातों से पता चलता है कि बानो को कैंसर है. संक्रमण के चलते एक आंत भी निकाली जा चुकी है. हालांकि इस बात को लेकर उनके चेहरे पर कतई रंज नहीं है, लेकिन सरकारी महकमों की लालफीताशाही से वे काफी परेशान हैं. वे कहती हैं, ‘छोटां-छोटां कामां खातर दफ्तरों का कत्ता ई (काफी) चक्कर काटना पड़सी. बठै कोई ने चिंता ई कोनी कै म्हे शहीदां रे परिवार वाला हां.’

शहीद रमजान की एक बेटी और दो बेटे हैं. इस्माइल कहता है कि बानो की ही हिम्मत है जो तमाम विपरीत हालातों में भी बच्चों की परवरिश से कभी समझौता नहीं किया. इसका नतीजा ये है कि एक छोटे से गांव में पलने के बावजूद उनकी बेटी एमबीबीएस कर दिल्ली के सफदरगंज अस्पताल में डॉक्टर है. एक बेटा जयपुर से इंजीनियरिंग कर रहा है और दूसरा रूस से डॉक्टरी. बानो बताती हैं कि तौफीक (रूस) री स्कॉलरशिप जारी कोनी हुई. बठै रहबा खात्तर पीशा (पैसों) की जरूरत है. दफ्तरां मां कोई सुनवा ने ही तैयार कोनी. बीमारी के हालातां में भी ऑफिसों के चक्कर काटना पड़सी.

उनकी बातों के बीच बानो का 15-16 साल का भतीजा तैय्यब पानी लेकर आता है. तैय्यब के अब्बू भी फौज में हैं. पूछने पर वह कहता है, ‘10वीं कर ली है, बड़ा होकर मैं भी फौज में जाऊंगा.’ इतने में कहीं से रंभाने की आवाज आती हैं. बानो एकदम झटके से उठती हैं जैसे कुछ भूल गयीं हों. थोड़ी देर में लौटकर बताती हैं ‘धानी’ प्यासी थी.’ धानी बानो की गाय का नाम है. बानो बताती हैं, ‘म्हारे सगला टाबर (सभी बच्चे) गाय रो दूध पी-पीकर मोह्टा (बड़े) हुआ हैं. अठे तो हर घर में थने गाय मिलसी.’

यहां से आगे मुझे तैयब ले जाता है. अगला घर सायरा बानो का है. गांव का एक और साधारण सा घर. अंदर सायरा बीड़ी पी रहीं हैं. उन्हें कम सुनाई देता है, सो घर की दूसरी औरतों से बातें हुईं. वे बताती हैं कि जब सायरा के पति ताज मोहम्मद दूसरे विश्व युद्ध के दौरान शहीद हुए थे तब वे महज 15 साल की थीं. इसके बाद भी वे हमेशा गांव के बच्चों को फौज में जाने के लिए प्रेरित करती रही हैं.

सायरा बानो (बीच में)
सायरा बानो (बीच में)

गांव के हक के लिए लड़ने वाले बुजुर्ग

सायरा बानो के घर से निकलने के बाद तैयब इशारा करते हुए बताता है, ‘भैया उस तरफ के घरों में आज भी बिजली नहीं है.’ गांव की ऐसी ही परेशानियों के बारे में बातें करते-करते हम कप्तान अली हसन के घर पहुंच जाते हैं. सन 96 में रिटायर्ड हुए कप्तान अब सरहद की बजाय गांव वालों के हक के लिए अलग-अलग महकमों से लड़ते हैं. वे अंदर से फाइलों का एक गठ्ठर लाकर हमें दिखाते हैं और बताते हैं, ‘बेटा सीमा से बड़ी जंग हमें देश में लड़नी पड़ती है. वहां हमें पता होता है कि दुश्मन कौन है लेकिन यहां तो अपने ही...’

‘धनूरी से सत्रह शहीद होने के बावजूद हमारे गांव में एक शहीद स्मारक तक नहीं है’ कप्तान साहब बताते हैं, ‘हमारे मजहब में बुत नहीं बनवाए जाते, तो हम चाहते हैं कि शहीदों की याद में एक स्मारक बन जाए जिस पर पहले विश्वयुद्ध में शहीद हुए हमारे बुजुर्गों से लेकर रमजान खान तक सभी शहीदों के नाम लिखे हों. विधायकों और कलेक्टरों से लेकर मुख्यमंत्रियों तक न जाने कितनी अर्जियां पहुंचा दी लेकिन सालों से सिर्फ आश्वासन मिलते आ रहे हैं.’

प्रशासन से ख़फा हसन कहते हैं, ‘हमारे 1000 घरों से 250 युवा फौज में कार्यरत हैं और करीब 300 सेवानिवृत हो चुके हैं. यानी लगभग हर घर ने अपना एक बेटा देश को सौंपा है. इसके बावजूद हमारे बच्चों के लिए गांव में हायर सैकंडरी स्कूल तक नहीं है. सरकार से कितनी ही बार दर्ख्वास्त कर ली लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं. प्रधानमंत्री कार्यालय में दरख्वास्त लगाई तो अफसरों ने उसे गलत जानकारी दे दी कि यहां पहले से ही स्कूल है. गांव के छोटे स्कूल की सालों से कोई मरम्मत नहीं हुई है. उसकी खराब हालत देखकर फौज से ही रिटायर्ड हुए परवेज खान ने अपनी जेब से पैसे लगाकर स्कूल का गेट बनवाया है.’

कप्तान अली हसन आगे कहते हैं, ‘अंधेरगर्दी देखिए, गांव के स्कूल में एनसीसी थी, जिससे गांव के बच्चों को कम उम्र से ही ट्रेनिंग मिलना शुरू हो जाती थी और आगे नौकरी मिलने में भी मदद रहती थी. लेकिन उसे यहां से हटाकर दूर के निजी स्कूल में शिफ्ट कर दिया गया है. शिकायत करने पर शिक्षा विभाग बहाना बनाता है कि विद्यालय में एनसीसी के लिए 40 वर्ष की आयु से कम के अध्यापक नहीं है. ये तो सरकार का काम है, लेकिन उन्होंने अपना पल्ला झाड़ लिया.’

अली हसन बताते हैं कि अमूमन सभी विभागों का एक सा हाल है. वे कहते हैं, ‘जंग में घायल हुए सैनिकों को अनुकंपा जमीन से लेकर अन्य रियायतें प्राप्त करने के लिए दफ्तरों के चक्कर पर चक्कर लगाने पड़ते हैं. जिन्होंने पैसा दे दिया उनका काम हो गया बाकियों की सुनने वाला कोई नहीं है. अब हम भी बूढ़े हो चले हैं, समझ नहीं आता किस-किस बात के लिए लड़ें.’ यह कहकर हसन उन कार्यवाहियों से जुड़े दस्तावेज दिखाने लगते हैं जिनमें सरकारी विभागों और उनके बीच हुए पत्राचार हैं. वे उन कागजातों को भी दिखाते हैं कि किस तरह अधिकारियों ने प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा पूछे जाने पर झूठ बोल दिया कि गांव में उच्च माध्यमिक विद्यालय पहले से ही है.

कुर्ते में कैप्टन अली हसन, आसमानी शर्ट में सद्दीक खान
कुर्ते में कैप्टन अली हसन, आसमानी शर्ट में सद्दीक खान

ढाई बज चला है, इसी बीच घूम फिरकर बात मंदिर और मस्जिद पर आ जाती है. अली हसन के एक रिश्तेदार सद्दीक खान जो राजस्थान पुलिस में सब इंस्पेक्टर के पद से रिटायर हुए हैं, कहते हैं, ‘जब पूरे देश में हिंदू-मुसलमान एक साथ रहते हैं. तहजीबें एक दूसरे में गहराई तक समाई हुई हैं तो मंदिर और मस्जिद भी तो आस-पास ही होंगी, इसमें दिक्कत क्या है? हिंदू भाइयों की श्रद्धा का ख्याल हमें रखना होगा और हमारी का उन्हें.’

सद्दीक खान कहते हैं, ‘बुरा लगता है जब एक मुसलमान को बार-बार अपने देशभक्त होने का सबूत देना पड़ता है. जबकि न तो वफादारों की कोई निश्चित कौम होती ही और न ही गद्दारों का कोई मजहब. लेकिन शुक्र है हमारे गांव में इस तरह का माहौल नहीं है. हमारे यहां हिंदू-मुसलमानों के बीच किसी तरह का कोई बैर नहीं. सभी भाइयों की तरह रहते हैं और एक-दूसरे के हर कार्यक्रम में वैसे ही शिरकत करते हैं जैसे किसी अपने के में.’

वे बताते हैं, ‘हमारे गांव की बेटी है संजू पारिक, अभी चूरू जिले में एसडीएम हैं. उनके पति भी फौज में शहीद हो गए थे. उसके बाद बिटिया वापिस गांव आ गयी. उसे अपनी बच्ची समझकर हम लोगों से जो कुछ बन पड़ा, हमने किया. खान फोन पर एसडीएम पारिक से बात भी करवाते हैं. संजू पारिक बताती हैं कि जब उनके पति शहीद हुए थे तब वे महज 12वीं पास थीं. उस मुश्किल वक्त में घर वालों से ज्यादा सहयोग गांव वालों ने दिया था. पारिक कहती हैं, ‘इन सभी ने बिना किसी मजहबी भेद के कदम-कदम पर भाई और पिता बनकर मेरा साथ दिया है. इन्ही की दुआ और प्यार है कि मैं यहां तक पहुंच सकी.’

सद्दीक खान कहते हैं, ‘सरकार सर्जिकल स्ट्राइक जैसी मुहिमों के नाम पर वोट मांगती है, जीत भी जाती है. लेकिन फौजियों के लिए जब कुछ करने की बारी आती है तो हमारे हाथ सिर्फ निराशा लगती है.’ इन दोनों ही बुजुर्गों की बातों और परेशानियों से जी जुड़ सा जाता है. वहां से जाने का मन नहीं होता लेकिन ट्रेन का समय हो चला है.