यह दक्षिण भारत में ‘आईएस (इस्लामिक स्टेट) का हब है.’ केरल के तटवर्ती पादन्ना गांव को पिछलीे जुलाई से यह तमगा दे दिया गया है. उस वक्त राज्य के दूसरे इलाकों से ताल्लुक रखने वाले 10 अन्य लोगों के साथ इस गांव के 11 लोग लापता हो गए थे. उनके बारे में पहले पहल संदेह रहा कि ये सभी लोग कहीं आतंकी संगठन आईएस (इस्लामिक स्टेट) में न शामिल हो गए हों. और महज 10 महीने बाद ही संदेह पुख्ता यकीन में बदल गया, जब ये खबरें आईं कि आईएस के लिए लड़ते हुए अफगानिस्तान नागरहार प्रांत में इन 21 में से तीन युवकों की मौत हो चुकी है. इसके बाद अब पादन्ना गांव एक बार फिर मीडिया की सुर्खियों का केंद्र बना हुआ है.

इनमें से पहली मौत की खबर बीती 27 फरवरी को आई. इसमें पता चला कि एक दिन पहले गांव के 23 साल के लड़के हफीजुद्दीन की अमेरिकी ड्रोन हमले में मौत हो गई है. यह सूचना हफीज के एक रिश्तेदार व सामाजिक कार्यकर्ता बीसी अब्दुल रहमान को अशफाक मजीद नाम के लड़के ने टेलीग्राम एप के जरिए दी थी. मजीद भी इस गांव से गायब होने वालों में से एक है. उसने अपने संदेश में लिखा था, ‘हफीज 26 फरवरी को ड्रोन हमले में मारा गया. वह शहीद हो गया. हम सब शहीद होने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं.’ मजीद ने 13 अप्रैल को एक और टेलीग्राम भेजा और इसमें पादन्ना के ही मुहम्मद मुर्शिद की मौत की सूचना दी.

अशफाक मजीद ने मुहम्मद मुर्शिद की मौत के बारे में जो टेलीग्राम संदेश भेजा, उसका स्क्रीन शॉट.
अशफाक मजीद ने मुहम्मद मुर्शिद की मौत के बारे में जो टेलीग्राम संदेश भेजा, उसका स्क्रीन शॉट.

मजीद का ही सबसे ताजा संदेश बीते 29 अप्रैल को आया. इसमें पलक्कड़ जिले के याह्या नाम के युवक की मौत की सूचना दी गई है. मलयालम में भेजे संदेश में उसने लिखा है, ‘याह्या, जिसे आप यहूदी समझते हैं, आज अमेरिकी काफिरों से लड़ते हुए शहीद हो गया.’ अफगानिस्तान में आईएस के ठिकानों पर अमेरिकी हमले तेज होने के बाद इस तरह की सूचनाएं भी उतनी ही तेजी से आ रही हैं. अभी 14 अप्रैल को ही अमेरिका ने अफगानिस्तान के नागरहार प्रांत में दुनिया के सबसे बड़े गैर-परमाणु बम (मदर ऑफ ऑल बम- एमओबी) से हमला किया था. खबरों के मुताबिक, इस हमले में आईएस के 36 लड़ाके मारे गए.

लोग बुरी खबरों के इंतजार में हैं

इस तरह की खबरें सामने आते ही पादन्ना गांव के वे सभी परिवार अब बुरी खबर के लिए दिल पर पत्थर रखकर सचेत हो गए हैं, जिनके युवा कुछ समय पहले लापता हुए थे और फिर बाद में आईएस से जा मिले. बल्कि कुछ तो ऐसे हैं, जो ये चाहते हैं कि यह दु:स्वप्न जल्द खत्म हो. भले ही उन्हें अपने बच्चे क्यों न खोना पड़ें. ऐसे ही लोगों में एक हैं, अब्दुल रहमान हमज़ा. वे कहते हैं, ‘मैं उम्मीद करता हूं कि मेरे बेटे जल्द ही अमेरिकी बम हमले में मार दिए जाएं.’ उनके दो बेटे इजाज़ रहमान (34) और शिहाज़ रहमान (28) आईएस में शामिल हो चुके हैं. जबकि गांव के तीन युवकों की मौत की सूचना देने वाला अशफाक मजीद उनका भतीजा है.

पादन्ना की सलाफी मस्जिद के बाहर सत्याग्रह की सहयोगी वेबसाइट स्क्रोल से बातचीत में हमज़ा कहते हैं, ‘उनके बुरे कामों ने गांव के कई लोगों को मुश्किल में डाल दिया है. यह अब और नहीं होना चाहिए. अल्लाह! मैं इन दिनों यही दुआ करता हूं.’ उन्हें इस बात का दुख है कि उन्होंने हर तरह का संघर्ष कर के बेटों को पढ़ाया-लिखाया और ‘बदले में यह नतीजा मिला.’ गौर करने लायक है कि उनका एक बेटा इजाज़ डॉक्टर है. जबकि शिहाज़ मैनेजमेंट की डिग्री ले चुकी है. भतीजे मजीद ने भी कॉमर्स की डिग्री ले रखी है. इन तीनों की तरह गांव के आठ अन्य लड़के भी इंजीनियर, अकाउंटेंट या मैनेजमेंट के पेशेवर हैं.

पादन्ना भी काफी समृद्ध गांव है. यहां के कई लोगों का देश के विभिन्न हिस्सों, दक्षिण पूर्व एशिया और खाड़ी के देशों में बड़ा कारोबार है. हमज़ा खुद 1976 से मुंबई में कारोबार करते हैं. उन्हें अच्छी तरह पता है कि उनके बेटे और भतीजे अब गांव नहीं लौट सकते. शायद इसी एहसास में वे भर्राई सी आवाज में कहते हैं, ‘वे लोग (बेटे और भतीजा) जान देने के लिए अफगानिस्तान चले गए. उनका लौटना अब मुमकिन नहीं है. मैं उनकी शक्ल तक नहीं देखना चाहता.’ दुख और चिंता से हमज़ा के स्वास्थ्य पर भी असर पड़ा है. उन्हें उच्च रक्तचाप की बीमारी है. इसे नियंत्रित रखने के लिए उन्हें लगातार दवाएं लेनी पड़ रही हैं.

हमज़ा आस्थावान मुस्लिम हैं. वे कहते हैं, ‘ये लड़के इस्लाम के सच्चे झंडाबरदार नहीं हैं. ये इस्लाम को समझ ही नहीं पाए. ये गलत रास्ते पर चल पड़े हैं.’ गांव की सलाफी मस्जिद में वे जब भी नमाज़ के लिए जाते हैं, वहां मौजूद लोगों से इस बात का जिक्र अक्सर ही किया करते हैं.

कई लोगों का मानना है कि सलाफी मस्जिद (तस्वीर में) में दी जा रही शिक्षा की वजह से गांव के लड़के आईएस की तरफ आकर्षित हुए. फोटो क्रेडिट : टीए अमीरुद्दीन
कई लोगों का मानना है कि सलाफी मस्जिद (तस्वीर में) में दी जा रही शिक्षा की वजह से गांव के लड़के आईएस की तरफ आकर्षित हुए. फोटो क्रेडिट : टीए अमीरुद्दीन

सलाफी मस्जिद में दी जा रही शिक्षा संदेह के घेरे में

गांव के इतने सारे युवाओं के आईएस में शामिल होने के बाद यहां की सलाफी मस्जिद में दी जा रही शिक्षा संदेह के घेरे में आ गई है. सलाफी, सुन्नी इस्लाम की कट्‌टरपंथी शाखा है. कई लोगों का मानना है कि सलाफी सिद्धांतों ने ही राज्य के 21 युवाओं को आईएस में शामिल होने के लिए उकसाया है. पिछले साल तो सलाफी मस्जिद के मौलवी हनीफ को पुलिस ने गिरफ्तार भी किया था. अशफाक के पिता अब्दुल मजीद ने पुलिस में शिकायत की थी कि उनके बेटे को मौलवी की तक़रीरों ने गुमराह किया है. हालांकि बाद में अब्दुल शिकायत से मुकर गए. उन्होंने पुलिस पर ही आरोप लगा दिया कि उसने खुद उनके नाम से शिकायत दर्ज कर ली है.

अब्दुल ने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस ने जबरन उनसे शिकायत पर दस्तखत कराए हैं. इसके बाद फरवरी में मौलवी को जमानत पर छोड़ दिया गया. अभी बीते मंगलवार की ही बात है. सलाफी मस्जिद में दोपहर की नमाज़ के लिए करीब 20 लोग जमा हुए थे. इनमें से अधिकांश का मानना था कि उनके गांव के लड़के आम जिंदगी में अब नहीं लौट सकते. उनके लिए यह बेहद मुश्किल होगा. अमेरिकी हमले में मारे गए हफीज़ुद्दीन के पिता मोहम्मद अशरफ कहते हैं, ‘हमारे लड़के गुमराह हुए हैं. कैसे हुए, हम नहीं बता सकते. लेकिन इनके पहले और बाद में पादन्ना से कभी कोई युवा इस तरह से राह नहीं भटका.’

परिवारों को उन लड़कों की हर जानकारी मिल रही है

हालांकि यह गौर करने लायक है कि गांव से जो लड़के गायब हुए थे, उनके परिवारों को पूरी जानकारियां मिल रही हैं. उच्च सुरक्षा वाले टेलीग्राम एप के जरिए घरों से दूर बैठे ये लड़के अपनी खैर-खबर नियमित रूप से परिजनों को दे रहे हैं. अब्दुल रहमान इसकी पुष्टि करते हैं. उनके मुताबिक, ‘जब से मैंने टेलीग्राम एप डाउनलोड किया और उससे मजीद (भतीजा) के साथ जुड़ा, तभी से मुझे उन लोगों के संदेश मिल रहे हैं.’ गांव में रहमान पहले शख्स थे, जिन्हें हफीजुद्दीन, मुहम्मद मुर्शिद और याह्या की मौत की सूचना मिली. वे बताते हैं, ‘किसी भी घटना की मुझे तुरंत जानकारी मिलती है. मैं उसे संबंधित लड़कों के रिश्तेदारों की तरफ भेज देता हूं.

याह्या की मौत का संदेश, जो कि मलयालम में लिखकर भेजा गया था.
याह्या की मौत का संदेश, जो कि मलयालम में लिखकर भेजा गया था.

रहमान बताते हैं कि वे इसी माध्यम से उन लड़कों को घर लौटने की समझाइश देते रहते हैं. हालांकि उन लोगों की तरफ से प्रतिक्रिया हमेशा ठंडी ही होती है. रहमान के मुताबिक, ‘वे लोग कहते हैं- हमें यहां जो सुकून मिल रहा है, वह आपको दुनिया में किसी जगह नहीं मिल सकता. अप्रैल में मुर्शिद की मौत की खबर मिली तो मैंने एक बार फिर मजीद से मिन्नत की कि घर लौट आओ. लेकिन उसने जवाब दिया- हम अल्लाह के लिए लड़ रहे हैं.’ रहमान की मानें तो ‘ये लड़के हर बार संदेश भेजकर यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि वे अपने फैसले से खुश हैं. एक बड़े मकसद के लिए उन्हें अपनी जिंदगी दांव पर लगाने से भी कोई परहेज नहीं है.’