बॉम्बे हाईकोर्ट ने बिलकिस बानो दुष्कर्म मामले में 11 दोषियों की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी है. गुरुवार को सुनाए फैसले में अदालत ने निचली अदालत का वह फैसला भी पलट दिया, जिसमें छह लोगों को बरी किया गया था. इनमें डॉक्टर और पुलिसवाले शामिल हैं, जिन पर सबूतों से छेड़छाड़ का आरोप है. गुजरात में 2002 में हुए दंगों के दौरान 19 साल की बिलकिस के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया था. तब वह पांच महीने की गर्भवती थीं.

न्यायमूर्ति वीके ताहिलरमानी और मृदुला भटकर की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया. कोर्ट ने इस दौरान सीबीआई की वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें इस मामले के तीन दोषियों को फांसी देने की अपील की गई थी. अदालत ने बचाव पक्ष की यह दलील भी नहीं मानी कि बिलकिस के बयान ‘झूठे और विरोधाभास से भरपूर’ हैं. गौरतलब है कि तीन मार्च 2002 को गुजरात के दाहोद जिले में दंगाइयों ने बिलकिस सहित 17 लोगों पर हमला किया था. इनमें आठ लोग मारे गए और छह लापता हो गए थे. जबकि बिलकिस सहित उनके परिवार के तीन लोग जिंदा बच सके. बिलकिस को तो दंगाइयों ने दुष्कर्म के बाद मरा समझकर छोड़ दिया था.

राज्य सरकार ने इस मामले की न्यायिक जांच के आदेश दिए थे. लेकिन जब न्यायिक मजिस्ट्रेट ने मार्च 2003 में सबूतों का अभाव बताकर केस बंद कर दिया तो बिलकिस ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की मदद से सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई. सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2003 में मामले की सीबीआई जांच के आदेश दिए. केस की निष्पक्ष सुनवाई हो सके, इसलिए शीर्ष अदालत ने ही अगस्त 2004 में मामले को मुंबई की ट्रायल कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया. ट्रायल कोर्ट ने जनवरी 2008 में अपना फैसला सुनाया. इसमें 11 लोगों को उम्र कैद की सजा सुनाई गई थी. इन सभी ने अदालत के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.