रेलवे स्टेशन पर भीड़ ज्यादा नहीं है, लेकिन लोगों में एक हड़बड़ी सी है. सुरक्षाकर्मियों को अपनी-अपनी तलाशी देकर लोग तेजी से प्लेटफार्म की तरफ जा रहे हैं. बारामूला के इस रेलवे स्टेशन पर सुरक्षा के इंतजाम देश के अन्य रेलवे स्टेशनों की तुलना में कुछ ज्यादा हैं. लेकिन सैन्य बलों की संख्या स्टेशन के भीतर उतनी नहीं है जितनी स्टेशन के बाहर और कश्मीर के लगभग हर शहर की हर सड़क पर दिखाई देती है. स्टेशन पर फौज के जवान भी नहीं हैं. यहां ज्यादातर पुलिस और रेलवे पुलिस के जवान ही नजर आते हैं.

पिछले कई सालों से पूरा कश्मीर एक छावनी में बदल चुका है. बल्कि छावनियों में भी जवान इस तरह चौबीसों घंटे मुस्तैद नहीं दिखते. यहां हर पांच मिनट में करीब पांच फौज के ट्रक आपके सामने से गुज़रते हैं और हर ट्रक की छत से दो-तीन फौजी बंदूकें ताने बाहर झांक रहे होते हैं.

सुबह के साढ़े नौ बजे हैं और ट्रेन अब कुछ ही मिनटों में छूटने वाली है. इसलिए लोग तेजी से प्लेटफार्म की ओर दौड़ने लगे हैं. कश्मीर में ट्रेन का सफ़र बारामूला से बनिहाल तक का ही है. बनिहाल से आगे अभी रेलवे लाइन का काम अधूरा है. माना जा रहा है कि 2020 तक यह पूरा हो जाएगा और तब कश्मीर, कम-से-कम रेलवे के जरिये, सीधा दिल्ली से जुड़ सकेगा.

बारामूला से निकलने वाली इस ट्रेन में अधिकतर स्थानीय लोग ही सफ़र कर रहे हैं. इनमें कुछ स्कूली लड़कियां भी हैं जिनकी हंसी-ठिठोली और उत्साह से ट्रेन की इस बोगी का माहौल काफी जीवंत हो उठा है. लेकिन यह उत्साह ज्यादा देर नहीं टिकता. ट्रेन की इस बोगी में अभी-अभी एक लड़का दाखिल हुआ है जिसे देखते ही लड़कियों की हंसी काफूर हो गई है. यह लड़का इनमें से एक लड़की का मौसेरा भाई है और लड़कियां इसलिए घबरा गई हैं क्योंकि वे आज स्कूल बंक करके श्रीनगर घूमने जा रही थीं.

ये लड़कियां बारामूला के गुरु नानक हाई स्कूल से पास होकर इसी साल हायर सेकेंडरी में आई हैं. इनमें से एक लड़की निकलकर अपने भाई के पास आती है और बेहद मासूमियत से कहती है, ‘भाई, इस साल हमें फेयरवेल मिलनी थी लेकिन हालात खराब होने के कारण फेयरवेल भी कैंसिल हो गई. इसलिए पुराने स्कूल के सभी दोस्तों ने तय किया कि आज श्रीनगर घूमने जाएंगे. प्लीज भाई घर पे मत बताना. चाचू मेरी जान ले लेंगे.’ फिर सभी लड़कियां एक-साथ कोरस में ‘भाई प्लीज-भाई प्लीज’ गाती हुई उस लड़के को मनाने लगती हैं कि वह घर पे किसी को न बताए. लड़का उन्हें हिदायत देता है कि वे श्रीनगर में ‘डाउन-टाउन’ की तरफ बिलकुल न जाएं, वहां हालात कभी भी बिगड़ सकते हैं और समय रहते घर लौट आएं.

कश्मीर के छात्रों पर होने वाली चर्चा अक्सर उनकी पढ़ाई के प्रभावित होने तक ही सीमित रह जाती है. आंकड़े आपको यही बता पाते हैं कि पिछले पूरे साल सिर्फ 54 दिन ही स्कूल खुले और इसलिए स्कूलों में ‘मास प्रमोशन’ किये गए. लेकिन इस पर कभी चर्चा नहीं होती कि कश्मीरी बच्चों से उनके जीवन के सबसे खूबसूरत पल भी तो छिन रहे हैं. बड़े होने पर दसवीं की मार्कशीट की अहमियत तो सिर्फ ‘आयु प्रमाणपत्र’ तक सीमित हो जाती है लेकिन स्कूल की यादें हमेशा अनमोल बनी रहती हैं. इसलिए जब आप इन लड़कियों को कश्मीर के बिगड़ते माहौल में भी अपने भविष्य के लिए कुछ यादें चुराते हुए देखते हैं, तो आपको ख़ुशी होती है.

स्रोत : www.kashmirlife.net
स्रोत : www.kashmirlife.net

ट्रेन बारामूला स्टेशन से कुछ ही आगे बढ़ती है कि खिड़की से बाहर का नज़ारा देखकर आप स्वतः ही बोल उठते हैं, ‘धरती पर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है, यहीं है, यही है.’ हालांकि कश्मीर की खूबसूरती बयान करने के लिए ये पंक्ति इतनी बार दोहराई जा चुकी है कि अब इसे सुनना या पढ़ना अक्सर उबाऊ लगता है. लेकिन यकीन मानिए, जब आपको ट्रेन की खिड़की से बर्फीली पर्वत श्रृंखला के साथ ही दूर तक फैले पीले सरसों के खेत और सफ़ेद फूलों से लदे सेब के हजारों पेड़ ट्रेन की उल्टी दिशा में दौड़ते दिखते हैं, तो यह पंक्ति स्वतः ही आपके ज़ेहन में उभर आती है. ठीक वैसे ही जैसे यह पंक्ति आपको तब याद आई थी जब आप कश्मीर में दाखिल हुए थे. जब आपका प्लेन बर्फीली पहाड़ियों के बीच बसी हरी-भरी घाटी में उतरने को तैयार था. या जब आप सड़क के रास्ते कश्मीर में दाखिल हो रहे थे और जवाहर टनल पार करते ही आपने अनंतनाग में घाटी का विस्तार देखा था.

खिड़की से बाहर आपको लकड़ी के बने बेहद खूबसूरत पारंपरिक कश्मीरी घर भी दिखते हैं और फिरन पहने कश्मीरी किसान भी जो घुटनों तक पानी में डूबे हुए अपने खेतों में रुपाई कर रहे हैं. इन खेतों के पीछे जब आप छोटी-छोटी हरी पहाड़ियों पर बड़ा सा ‘इंडिया’ लिखा हुआ देखते हैं और उनके ऊपर लहराता हुआ तिरंगा भी तो एक भारतीय के तौर पर आपको गर्व होता है कि धरती का यह स्वर्ग आपके देश का हिस्सा है. लेकिन तुरंत ही आपके मन में यह सवाल भी उठता है कि क्या कश्मीर के अलावा देश में और भी कोई जगह है जिसे अपना हिस्सा बताने के लिए इस तरह जगह-जगह ‘इंडिया’ लिखने की ज़रुरत पड़ रही हो.

बारामूला से चली ये ट्रेन सबसे पहले सोपोर स्टेशन पर रूकती है और उसके कुछ ही देर बाद हामरे नाम के छोटे से स्टेशन पर. यहां एक जवान लड़का इस ट्रेन में चढ़ा है. उसके हाथ में मोबाइल है और उसकी नज़रें मोबाइल की स्क्रीन पर ही टिकी हैं. मोबाइल में तेज़ आवाज़ में कोई रैप गाना बज रहा है. इस गाने के बोल जब आप सुनते हैं तो आपको इस ट्रेन यात्रा में पहली बार उस ज्वालामुखी का आभास होता है जो कई सालों से कश्मीरी लोगों के दिलों में धधक रहा है.

इस रैप गाने में बार-बार दोहराया जा रहा है - ‘नो इलेक्शन, नो सिलेक्शन, वी वांट फ्रीडम...’ कश्मीर की आज़ादी के लिए लगने वाले कई मशहूर नारों को इस रैप में संगीतबद्ध किया गया है और इसके आगे के बोल हैं, ‘आज़ादी का नारा होगा, पाकिस्तान हमारा होगा, हम जीतेंगे उस दिन भाइयो, जिस दिन भारत हारा होगा... नो इलेक्शन, नो सिलेक्शन..’ ट्रेन में ये गाना ज़ोरों से बज रहा है लेकिन आस-पास बैठे लोग इससे बिलकुल भी असहज नहीं हैं.

ये रैप गाना पाकिस्तान के किसी ‘राजा रैपस्टार’ ने बनाया है. इन दिनों कश्मीरी लड़के भी आज़ादी पर कई गाने बना रहे हैं लेकिन आम युवाओं के बीच पकिस्तान से बनकर आ रहे रैप गाने ज्यादा तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं. पाकिस्तान में बने ऐसे भी कई विडियो इन दिनों कश्मीर घाटी में वायरल हो रहे हैं जिनमें बुरहान वानी या हिजबुल मुजाहिदीन के अन्य लड़ाकों की मौत का महिमामंडन किया जा रहा है. इन वीडियो में भारतीय फ़ौज की गोलियों से मरने वाले लोगों को ‘शहीद’ और ‘इस्लाम का सच्चा सिपाही’ बताया जाता है, उनकी मौत को कभी बेहद मार्मिक तो कभी बेहद भड़काऊ अंदाज़ में दर्शाया जाता है और उनके जनाज़ों में उमड़ी भीड़ से युवाओं को कश्मीर की आज़ादी की लड़ाई में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने के लिए प्रेरित किया जाता है. इसे आप पाकिस्तान की भारत को तोड़ने की साजिश मान सकते हैं लेकिन कश्मीरी नौजवान ऐसा नहीं मानते. उन्हें लगता है कि ऐसा करके पाकिस्तान आज़ादी की लड़ाई में उनकी मदद कर रहा है.

आप जब इस लड़के से पूछते हैं कि क्या उसे सार्वजनिक जगहों पर इस तरह के गाने बजाते हुए डर नहीं लगता तो वह जवाब में कहता है, ‘नहीं. इन गानों के जो बोल हैं, कश्मीर के बच्चे-बच्चे के मन में वही भावनाएं हैं.’ वह आपसे यह भी कहता है कि ‘भारतीय फ़ौज के सामने तो हम अब जान-बूझकर ऐसे गाने बजाते हैं ताकि उन्हें मालूम हो कि हम कश्मीरी उनसे नफरत करते हैं.’ यह सुनकर आपको कश्मीर में तैनात भारतीय फ़ौज की उस कठिन जिम्मेदारी का भी एहसास हो जाता है जिसे कश्मीरियों को सुरक्षित रखते हुए कश्मीर को कश्मीरियों से ही बचाने का काम सौंपा गया है.

बुरहान वानी के साथ दाऊद अहमद शेख
बुरहान वानी के साथ दाऊद अहमद शेख

रैप गाने बजाने वाला यह लड़का मूल रूप से अनंतनाग का रहने वाला है और बीएड कर चुका है. जब आप इससे कश्मीर के मौजूदा असंतोष पर कुछ और चर्चा करते हैं तो वह आपको अपने मोबाइल पर ऐसे दर्जनों वीडियो दिखाता है जिनमें भारतीय फ़ौज के जवान कश्मीरी युवकों को पीट रहे हैं, फ़ौज पर पथराव करने वालों के सीने पर गोली मारी जा रही है, आज़ादी की मांग करते हुए हजारों की संख्या में लोग नारे लगा रहे हैं और कुछ वीडियोज में ये आंकड़े दर्शाए जा रहे हैं कि भारतीय फौज ने कितनी कश्मीरी लड़कियों के साथ बलात्कार किये हैं. ये तमाम वीडियोज़ दिखाते हुए वह लड़का कहता है, ‘हमें उनसे खतरा नहीं जिन्हें आप मिलीटेंट कहते हैं. हमें भारत की फौज से खतरा है. ये फौज ही हमारी असली दुश्मन है और बुरहान जैसे मुजाहिद असल में हमारी फौज हैं.’

करीब 11 बजे का समय हुआ है और ट्रेन कश्मीर के सबसे खूबसूरत, सबसे बड़े स्टेशन - श्रीनगर पहुंच चुकी है. कई अन्य लोगों के साथ ही बारामूला से स्कूल बंक करके आई छात्राएं भी यहां ट्रेन से उतर गई हैं. बमुश्किल पांच मिनट रुकने के बाद ट्रेन यहां से आगे बढ़ चली है. अनंतनाग के लड़के से आपकी जो चर्चा शुरू हुई थी, उसमें अब ट्रेन में बैठे कई अन्य लोग भी शामिल हो चुके हैं. ये लोग अपने असंतोष का कारण बताते हुए आपको दर्जनों घटनाओं का हवाला दे रहे हैं. जैसे, 2009 में शोपियां जिले में हुई निलोफ़र और आसिया की सामूहिक बलात्कार के बाद हत्या, कुनन पोश्पोरा में हुए सामूहिक बलात्कार, कश्मीर में जगह-जगह मौजूद लावारिस कब्रें और वे सैकड़ों महिलाएं जिन्हें अब ‘हाफ-विडो’ कहा जाता है क्योंकि उनके पति को कभी फ़ौज के जवान उठा ले गए थे और फिर वे कभी नहीं लौटे. इन सब घटनाओं का सीधा आरोप ये लोग भारतीय सैन्य बलों पर लगाते हैं.

ट्रेन में मौजूद लोग जब आपको कई वीडियोज़ दिखा रहे हैं, तभी आपको ‘आज़ादी चाचा’ के बारे में भी मालूम चलता है. ‘आज़ादी-चाचा’ शोपियां जिले के रहने वाले अधेड़ उम्र के एक शख्स हैं जिनका असली नाम सरजन बरकाती है. बरकाती की लोकप्रियता बीते एक-दो साल में बेहद तेजी से बढ़ी है और माना जाता है कि दक्षिणी कश्मीर के युवाओं के ध्रुवीकरण में बरकाती की सबसे अहम भूमिका है. बरकाती आजादी के तराने गाते हैं और अपने ही अंदाज़ में नारे भी लगाते हैं. उनके ‘डाउन-डाउन, इंडिया डाउन’, ‘वन वे वन ट्रैक - गो इंडिया गो बैक’, और ‘देयर इस ओनली वन सोल्यूशन - गन सोल्यूशन, गन सोल्यूशन’ जैसे नारे सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहे हैं. जिस भी शहर में बरकाती तक़रीर के लिए पहुंचते हैं, हजारों की संख्या में भीड़ उन्हें सुनने के लिए उमड़ती है और उनके साथ पूरे जोश में नारे लगाती है.

आजादी की मांग को लेकर कश्मीर में जगह-जगह उमड़ रहे जनसैलाब के वीडियोज देखकर जब आप चर्चा में शामिल लोगों से पूछते हैं कि भारत सरकार को ऐसा क्या करना चाहिए कि कश्मीर के लोगों का असंतोष कुछ कम हो सके तो जवाब मिलता है, ‘भारत अगर कश्मीर की सड़कों को सोने का भी बना दे तो भी हम भारत से नफरत ही करेंगे.’ इस नफरत का कारण जब आप इन लोगों से पूछते हैं तो ट्रेन में मौजूद वकील काज़ी इरफ़ान कहते हैं, ‘कश्मीर के लोगों से भारत ने कुछ वादे किये थे. वे वादे कभी पूरे नहीं हुए. तब कश्मीरियों को बंदूक उठाने पर मजबूर होना पड़ा. लेकिन आतंकवाद को कुचलने के नाम पर जिस तरह से भारत ने बेगुनाहों को मारा, औरतों से बलात्कार किये और बच्चों तक को बेरहमी से पीटा, वह सब देखने-झेलने के बाद हम भारत से नफरत क्यों न करें?’

ट्रेन में कश्मीरी लोगों से जब यह चर्चा कुछ और गर्म होती है तो पास बैठे 28 वर्षीय मुद्दसिर अहमद शेख भी आकर इस चर्चा में शामिल हो जाते हैं. मुद्दसिर अनंतनाग के रहने वाले हैं और पिछले साल मारे गए हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकी दाऊद अहमद शेख के भाई हैं. वे कहते हैं, ‘मुझे मेरे भाई के मरने का अफ़सोस है लेकिन जिस रास्ते पर चलते हुए उसकी मौत हुई, पूरा कश्मीर उस पर गर्व करता है.’ क्या बंदूक के दम पर कश्मीर कभी आज़ादी ले सकता है? आपके इस सवाल के जवाब में मुद्दसिर शेख कहते हैं, ‘हम जानते हैं कि भारतीय फौज से हमारे लड़के कभी नहीं जीत सकते. भारतीय फौज बहुत बड़ी और ताकतवर है. लेकिन हार के डर से हम लड़ना नहीं छोड़ सकते. ये एक जिहाद है जिसे हमें जारी रखना है. फिर इंशा-अल्लाह आज नहीं तो कल कश्मीर आज़ाद भी ज़रूर होगा.’

ट्रेन में आपकी मुलाकात वसीम गुलज़ार मलिक से भी होती है. वसीम बारामूला जिला न्यायालय में वकालत करते हैं. वसीम से आपको मालूम चलता है कि कश्मीर में पत्थरबाज़ी करने वाले लड़कों को किस तरह से अन्य लोग भी मदद करते हैं. वे कहते हैं, ‘ये खबर बिलकुल झूठी है कि कश्मीर में पैसे देकर पत्थरबाज़ी होती है. हां, इन लड़कों की हम लोग मदद ज़रूर करते हैं. मैं खुद इन लड़कों के केस लड़ने की कोई फीस नहीं लेता. बारामूला के सैकड़ों लड़के हैं जिन पर 40-50 एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं. मेरे साथ कई वकील हैं जो इनके केस मुफ्त में लड़ते हैं.’ वसीम यह भी बताते हैं कि पत्थरबाज़ी के दौरान चोटिल होने वाले लोगों का इलाज कई डॉक्टर बिना पैसे लिए कर देते हैं और जिन लड़कों की सैन्य बलों की गोली लगने से मौत होती है, अगर वे गरीब घर से हैं तो आस-पड़ोस के लोग उनकी हरसंभव मदद करते हैं.

इस चर्चा में जितने भी लोग शामिल हैं, वे सभी कश्मीरी लोगों की आम भावनाओं को लेकर एकमत नज़र आते हैं. सिर्फ वकील काज़ी इरफ़ान के यह कहने से कुछ असहमतियां बनती हैं कि ‘80 प्रतिशत कश्मीरी पाकिस्तान से मोहब्बत करते हैं.’ ट्रेन में चिप्स बेचने वाला इम्तियाज़ - जो काफी देर से खड़ा होकर इस चर्चा को सिर्फ सुन रहा था - काज़ी इरफ़ान की बात से असहमत होते हुए कहता है, ‘हम लोग पाकिस्तान के साथ भी नहीं जाना चाहते. पाकिस्तान हमारी लड़ाई में हर तरीके से मदद करता है इसलिए हम उससे नफरत नहीं करते, लेकिन हम कश्मीर की आज़ादी चाहते हैं. ऐसा कश्मीर जो न हिंदुस्तान का हिस्सा हो और न पाकिस्तान का.’

इम्तियाज़ यह भी स्वीकारता है कि उसने ‘डाउन टाउन’ श्रीनगर में न जाने कितनी बार पत्थर चलाए हैं और पाकिस्तान व आईएस के झंडे भी लहराए हैं. आप जब उससे पूछते हैं कि अगर वे लोग पाकिस्तान के साथ नहीं जाना चाहते तो उसका झंडा क्यों लहराते हैं? वह कहता है, ‘पकिस्तान या आईएस का झंडा हम इसलिए लहराते हैं क्योंकि हमें मालूम कि ऐसा करने से इंडिया को सबसे ज्यादा दर्द होता है. हमारे पत्थर भी उतनी चोट नहीं करते जितनी बड़ी चोट पाकिस्तान या आईएस का झंडा लहराने से इंडिया को महसूस होती है.’ चर्चा में शामिल लगभग सभी लोग इम्तियाज़ की इस बात से सहमत नज़र आते हैं.

ट्रेन में मौजूद लोग कश्मीर के अलग-अलग जिलों और समाज के अलग-अलग तबकों से आते हैं. इनमें पढ़े-लिखे वकील भी हैं, कॉलेज जाते छात्र भी हैं और ट्रेन में नमकीन बेचने वाले गरीब तबके के कम पढ़े-लिखे युवा भी. लेकिन कश्मीर को लेकर इन सभी लोगों की राय बिलकुल एक है - आज़ादी. आज़ादी की यह लड़ाई ये सभी लोग अपनी-अपनी तरह से लड़ भी रहे हैं. कुछ पत्थर चलाकर, कुछ पत्थर चलाने वालों की मदद करके और कुछ सोशल मीडिया के जरिये. कान्वेंट स्कूल में दसवीं के छात्र रफीक कहते हैं, ‘हमारे स्कूल के बच्चे पत्थरबाज़ी में शामिल नहीं होते. लेकिन हम लोग कश्मीर की आज़ादी पर डिबेट आयोजित करते हैं, शांतिपूर्ण तरीके से रैलियां निकालते हैं और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स पर आज़ादी के मुद्दे को उठाते हैं. हमारी कोशिश रहती है कि ज्यादा-से-ज्यादा लोगों को कश्मीर के लोगों की वे भावनाएं पहुंचा सकें, जो मीडिया कभी नहीं पहुंचता.’

आप जब इन लोगों से कहते हैं कि कश्मीर के सभी लोग भारत से अलग नहीं होना चाहते और कई नौजवान भारतीय फ़ौज या राज्य पुलिस का हिस्सा बनकर मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं तो जवाब में काजी इरफ़ान कहते हैं, ‘क्या भारत की आज़ादी से पहले भारतीय लोग अंग्रेजों की फ़ौज या पुलिस में नौकरी नहीं करते थे? क्या जो लोग तब पुलिस की नौकरी करते थे उन्हें भारत की आज़ादी नहीं चाहिए थी? वैसे ही कश्मीरी लड़के भी अपना घर चलाने के लिए पुलिस या फौज में शामिल हो रहे हैं. लेकिन हर कश्मीरी आज़ादी ज़रूर चाहता है.’

इन सभी लोगों के पास आपको सुनाने के लिए ‘भारत और उसकी फौज द्वारा किये गये अत्याचारों’ के ढेरों व्यक्तिगत अनुभव हैं. यहां मौजूद लोगों में किसी का भाई फौज की गोली लगने से मारा गया, किसी के पिता को फ़ौज घर से उठाकर ले गई और फिर वे कभी नहीं लौटे, किसी के रिश्तेदार की आंखें पुलिस की पैलेट लगने से चली गईं, किसी का जवान बेटा पीएसए (पब्लिक सेफ्टी एक्ट) लगने के कारण जेल में बंद है और कुछ लोगों पर खुद देशद्रोह के आपराधिक मुक़दमे चल रहे हैं. ये वे कारण हैं जिनके चलते इन लोगों में भारत और भारतीय सैन्य बलों के प्रति नफरत है और बुरहान वानी जैसे लोग, जो भारत के लिए आतंकवादी हैं, इनके लिए शहीद और इनके सबसे बड़े हीरो हैं.

मुद्दसिर शेख कहते हैं, ‘कश्मीरियों ने अब इतना कुछ देख लिया है कि उनका डर खत्म हो चला है. अब वह समय नहीं है जब एक गोली चलने पर ही पूरा शहर घरों के दरवाज़े बंद कर लिया करता था. आज अगर हमारे मुजाहिदों को फ़ौज कहीं घेर लेती है या कहीं से एनकाउंटर की खबर आती है तो गांव का गांव उसी तरफ बढ़ जाता है. अब हमें मौत से भी डर नहीं लगता. गुलामी में जीने से मर जाना बेहतर है.’

दोपहर के साढ़े बारह बज चुके हैं और ट्रेन अब अनंतनाग से निकल कर कुछ ही देर में अपने आखिरी स्टेशन बनिहाल पहुंचने वाली है. खिड़की से बाहर इशारा करते हुए वकील काज़ी इरफ़ान कहते हैं, ‘वो भारतीय झंडा जो लहरा रहा है, आपको उसे देखकर गर्व होता होगा. लेकिन हमें वो अपनी गुलामी का एहसास कराता है. ये फौज देखकर हमें घुटन होती है, जैसे भारत ने कश्मीर की गर्दन दबोच के रखी हो. हमसे अपने ही कश्मीर में बिहार या बंगाल से आया कोई फौजी कभी भी पहचान-पत्र मांग लेता है.’ काज़ी इरफ़ान आगे कहते हैं, ‘आज की जवान पीढ़ी वो है जो 90 के दशक में पैदा हुई है. इस पीढ़ी ने अपने बचपन से ही कश्मीर को जलते हुए देखा है, अपने रिश्तेदारों को मरते हुए देखा है, आए दिन जनाज़े उठते देखे हैं, फ़ौज के अत्याचार को सहा है और इनका पूरा बचपन कर्फ्यू में बीता है. इस पीढ़ी में आज़ादी के लिए जो छटपटाहट है, वो आज से पहले कभी कश्मीर में नहीं थी. इसे किसी कीमत पर दबाया नहीं जा सकता.’

ट्रेन अपने आखिरी स्टेशन बनिहाल पहुंच चुकी है. विदा लेते हुए वसीम मलिक कहते हैं, ‘हम ये भी जानते हैं कि भारत कभी कश्मीर को नहीं छोड़ेगा, ये भारत की नाक सवाल है. भारत कश्मीरियों की गर्दन कटते देख सकता है लेकिन अपनी नाक कटते नहीं. इसलिए ये जंग खत्म होने वाली नहीं है. इसमें दोनों तरफ के जवान बेटे मरते रहे हैं और न जाने अभी और कितने मरेंगे. क्योंकि शहादत देने वाले न यहां कम हैं और न वहां. हम अपने मुजाहिदों के शहीद होने पर गर्व करेंगे और भारतीय फ़ौज को अपना दुश्मन मानेंगे. भारत अपने फौजियों की शहादत पर गर्व करेगा और हमें आतंकवादी कहेगा. वैसे कश्मीरी लोग भारत से भले ही नफरत करते हैं लेकिन भारतीयों से हमें मोहब्बत है. जबकि भारतीय लोग कश्मीर से तो मोहब्बत करते हैं लेकिन कश्मीरियों से उन्हें नफरत है.’