हमें शायद आश्चर्य हो, लेकिन आत्म-दर्शन और अध्यात्म के प्रति महात्मा गांधी की जिज्ञासा अफ्रीका में ईसाइयों की संगति में ही पैदा हुई थी. इस बारे में उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है- ‘मैं तो यात्रा करने, काठियावाड़ के षड्यंत्रों से बचने और आजीविका खोजने के लिए दक्षिण अफ्रीका गया था. लेकिन पड़ गया ईश्वर की खोज में – आत्मदर्शन के प्रयत्न में. ईसाई भाइयों ने मेरी जिज्ञासा को बहुत तीव्र कर दिया था. वह किसी भी तरह शांत होनेवाली न थी. मैं शांत होना भी चाहता तो भी ईसाई भाई-बहन मुझे शांत होने न देते.’

लेकिन अध्यात्म और स्वयं को जान लेने की जिज्ञासा जब एक बार फूट पड़ती है, तो वह किसी पंथ, संप्रदाय और ग्रंथ में बंधकर नहीं रह पाती. यही महात्मा गांधी के साथ भी हुआ. वे जिन ईसाइयों के संपर्क में आए, उनकी श्रद्धा ईसा के बाद सबसे अधिक गौतम बुद्ध में ही थी. लेकिन ध्यान रहे कि स्वाभाविक रूप से ईसाई गौतम बुद्ध को ईसा के बाद दूसरे स्थान पर ही रखते थे. ईसा और बुद्ध की यह तुलना गांधी के मन में कुछ समय के लिए एक गुत्थी की तरह बैठ गई थी.

एक बार डरबन में किसी ईसाई श्रद्धालु लेकिन मांसाहारी महिला के सामने ही ईसा और बुद्ध के जीवन की तुलना करते हुए गांधी ने कहा- ‘गौतम की दया को देखिए. वह मनुष्य-जाति को लांघकर दूसरे प्राणियों तक पहुंच गई थी. उनके कंधे पर खेलते हुए मेमने का चित्र आंखों के सामने आते ही क्या आपका हृदय प्रेम से उमड़ नहीं पड़ता? प्राणिमात्र के प्रति ऐसा प्रेम मैं ईसा के चरित्र में नहीं देख सका.’ हालांकि गांधी की यह तुलनात्मक प्रवृत्ति उनकी आध्यात्मिक जिज्ञासाओं के शुरुआती दौर की बात है.

जब गांधी की आध्यात्मिक जिज्ञासाएं शांत नहीं होती थीं, तो वे गुजरात के ही एक जैन साधक श्रीमद् राजचंद्र (रायचंदभाई) को पत्र में अपने प्रश्न लिख भेजते थे  

इस दौरान गांधी अपनी आध्यात्मिक जिज्ञासाओं के समाधान के लिए अलग-अलग धर्मों के बारे में लिखी गई कई पुस्तकों के शरण में गए. उन्होंने नर्मदाशंकर की ‘धर्म-विचार’ नाम की पुस्तक पढ़ी. मैक्स मूलर की लिखी पुस्तक ‘हिन्दुस्तान क्या सिखाता है?’ भी उन्होंने बड़ी दिलचस्पी के साथ पढ़ी. थियॉसॉफिकल सोसायटी द्वारा प्रकाशित उपनिषदों के अनुवाद भी उन्होंने पढ़े. वाशिंगटन इरविंग की लिखी ‘लाइफ ऑफ मोहम्मद एंड हिज़ सक्सेसर्स’ और थॉमस कार्लाइल द्वारा मुहम्मद की प्रशंसा में लिखी गई पुस्तक भी उन्होंने पढ़ी. ‘दी सेइंग्स ऑफ ज़रथ्रुस्ट्रा’ भी उन्होंने पढ़ी. थोड़ी मात्रा में ध्यान और प्राणायाम भी उन्होंने करना शुरू किया. टॉल्सटॉय की ‘गॉस्पेल्स इन ब्रीफ’ और ‘व्हॉट टू डू’ भी उन्होंने पढ़ी. एडविन अर्नॉल्ड की गौतम बुद्ध पर लिखी प्रसिद्ध पुस्तक ‘लाइट ऑफ एशिया’ वह पहले ही पढ़ चुके थे. अर्नॉल्ड द्वारा ‘द सॉन्ग सेलेस्टियल’ के नाम से गीता के किए गए अनुवाद को भी वे पढ़ चुके थे.

लेकिन जब उनकी आध्यात्मिक जिज्ञासाएं फिर भी शांत नहीं होतीं, तो वे गुजरात के ही एक जैन साधक श्रीमद् राजचंद्र (रायचंदभाई) को पत्र में अपने प्रश्न लिख भेजते थे. इसी कड़ी में उन्होंने जून. 1894 के आसपास रायचंदभाई को एक लंबी चिट्ठी लिखी. इसमें गांधी ने आत्मा, मोक्ष, ईश्वर, कर्म, पुनर्जन्म, अवतार, ईसा और बुद्ध आदि के बारे में कई दो-टूक और दिलचस्प सवाल पूछे थे. उन्होंने वेदों के ‘अनादि’ होने का अर्थ पूछा था. गीता के ‘ईश्वरकृत’ होने का प्रमाण मांगा था. इन सवालों में एक सवाल यह भी था कि आप किस आधार पर कहते हैं कि ‘बुद्धदेव तक ने मोक्ष नहीं पाया था?’

गांधी के इस प्रश्न के जवाब में रायचंदभाई ने जो लिखा उसका तात्पर्य यह था कि यदि आज के बौद्ध शास्त्रों को आधार बनाया जाए, तो ऐसा नहीं लगता कि बुद्ध का राग-द्वेष समाप्त हो चुका था. और यदि राग-द्वेष बना ही रहेगा, तो उन्हें बुद्धत्व प्राप्त हुआ, ऐसा कैसे कहा जा सकेगा. जाहिर है रायचंदभाई ने आज के बौद्ध ग्रंथों और बौद्धमत की कसौटी पर ही बुद्ध को कसकर ऐसा निष्कर्ष निकाला था.

इस पत्राचार के करीब 33 वर्ष बाद यानी 1927 में गांधी श्रीलंका के दौरे पर गए. वहां उन्हें अखिल लंका बौद्ध परिषद् (ऑल-सीलोन कांग्रेस ऑफ बुद्धिस्ट एसोसिएशन्स) ने कोलंबो को विद्योदया कॉलेज में आमंत्रित किया. 15 नवंबर, 1927 को हुई बौद्धों की इस सभा को संबोधित करते हुए गांधी ने बुद्ध और बौद्ध-धर्म के बारे में कई महत्वपूर्ण बातें कही थीं. उन्होंने कहा- ‘आपको शायद पता नहीं है कि मेरे बड़े लड़के ने मुझपर बौद्ध होने का इल्जाम लगाया था और मेरे कुछ हिंदू देशवासी भी यह कहने में नहीं हिचकते कि मैं सनातन हिंदू धर्म की आड़ में बौद्ध-धर्म का प्रचार कर रहा हूं. मेरे लड़के द्वारा लगाए गए आरोप और हिंदू मित्रों के इल्जाम के प्रति मेरी सहानुभूति है. और कभी-कभी मैं बुद्ध का अनुयायी होने के इल्जाम में गर्व का अनुभव करता हूं और इस सभा में आज यह कहने में जरा भी हिचक नहीं है कि मैंने बुद्ध के जीवन से बहुत-कुछ प्रेरणा पाई है.’

महात्मा गांधी के अर्थों वाला हिंदू धर्म यहां के लोक-समाज को अभिव्यक्त करनेवाली एक व्यापक सामुदायिक संस्कृति मात्र थी, जिनमें तमाम भिन्नताओं के बावजूद आपस में जोड़नेवाले कुछ सामान्य तत्व मौजूद थे  

वास्तव में गांधी मानते थे कि बुद्ध के अपने जीवन और उनके उपदेशों से तत्कालीन भारतीय समाज, जिसे आमतौर पर आज हिंदू समाज का नाम दिया जाता है, में आमूलचूल परिवर्तन हुआ. वे मानते थे कि भारत के हिंदू समाज ने बुद्ध के प्रमुख सिद्धांतों को आत्मसात् कर लिया. अपने इस भाषण में गांधी ने कहा था- ‘गहरे विचार के बाद मेरी यह धारणा बनी है कि बुद्ध की शिक्षाओं के प्रमुख अंग आज हिंदू धर्म के अभिन्न अंग हो गए हैं. गौतम ने हिंदू धर्म में जो सुधार किए, उनसे पीछे हटना आज भारत के हिंदू समाज के लिए असंभव है. अपने महान त्याग-वैराग्य, अपने जीवन की निर्मल पवित्रता से गौतम बुद्ध ने हिंदू धर्म पर अमिट छाप डाली है और हिंदू धर्म उस महान शिक्षक से कभी उऋण नहीं हो सकता.’

जैसा कि हम जानते हैं कि महात्मा गांधी के अर्थों वाला हिंदू धर्म आज के सांप्रदायिक और संकीर्ण अर्थों वाला हिंदू धर्म नहीं था. वह कट्टर और राजनीतिक लामबंदी वाला धर्मपंथ नहीं था. वह इस भौगोलिक क्षेत्र में बसी सभ्यता और यहां के लोक-समाज को अभिव्यक्त करनेवाली एक व्यापक सामुदायिक संस्कृति मात्र थी, जिनमें तमाम भिन्नताओं के बावजूद आपस में जोड़नेवाले कुछ सामान्य तत्व मौजूद थे. जो एक अत्यंत प्राचीन और आध्यात्मिक ज्ञान-परंपरा के हिस्सा थे. बल्कि गांधी ने इसमें दुनियाभर के अन्य सभी धर्मों की अच्छाइयों का समावेश कर इसे और व्यापक बनाने की कोशिश की थी. 22 अप्रैल, 1938 को अखबारों को दिए गए एक वक्तव्य में उन्होंने कहा था- ‘मेरा हिंदुत्व किसी संप्रदाय की सीमा में बंधा हुआ नहीं है. इस्लाम, ईसाई धर्म, बौद्ध धर्म, जरथुस्त धर्म की जितनी भी अच्छाइयों से मैं अवगत हूं, वे सब इसमें शामिल हैं.’

लेकिन आध्यात्मिक संघर्षों को राजनीतिक संघर्षों में बदलनेवाले तत्व हमेशा ही समाज में मौजूद रहते हैं. इसलिए अध्येताओं को हमेशा यह सतर्कता बरतनी चाहिए कि वह इतिहास को एकांगी नज़रिए से न देखें. बुद्ध को वेदों के खिलाफ और आज हिंदू धर्म के खिलाफ खड़ा करके राजनीतिक संघर्ष पैदा करने की कोशिश हमें कहीं नहीं ले जाती. अध्यात्म को सांप्रदायिकता के साथ गड्ड-मड्ड करने के मामले में इतिहासकारों से भी बड़ी भूलें हुई हैं. इसी का खामियाजा आज हमें हिंदू सांप्रदायिकता के रूप में भुगतना पड़ रहा है. और आज इसी मूढ़तापूर्ण हिंदुत्व की प्रतिक्रिया में बौद्ध सांप्रदायिकता भी फिर से अपना सिर उठाने लगी है.

गांधी जैसे साधक ने अपनी सहज और उदार दृष्टि से जब बुद्ध को देखा, तो उन्होंने पाया कि बुद्ध ने तो वास्तव में वैदिक चिंतन की धारा को समृद्ध और परिशोधित करने का कार्य किया था. ज्ञान परंपरा में ऐसे ही तो नए ज्ञान का विकास होता है. नए विचारों का सूत्रपात ऐसे ही तो होता है. हर नई पीढ़ी पुराने चिंतन की अच्छी और तार्किक बातों को ग्रहण कर लेती है, और लंबे कालक्रम में जो बुराइयां इसमें आ जाती हैं, उसे दूर करने का प्रयास करती है. बुद्ध ने भी ऐसा ही किया.

बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित करना जहां एक प्रकार की पुरोहितवादी मूढ़ता हो सकती है, वहीं यह भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की प्रवाहमान धारा में बुद्ध को स्वीकार करने या आत्मसात करने की उत्कंठा भी हो सकती है  

श्रीलंका के बौद्धों को संबोधित करते हुए गांधी ने कहा था- ‘मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि बौद्ध-धर्म या कहिए कि बुद्ध की शिक्षाएं हिंदुस्तान में पूरी तरह फलीभूत हुईं. और इसके सिवा दूसरा कुछ हो भी नहीं सकता था, क्योंकि गौतम स्वयं हिंदुओं में श्रेष्ठ हिंदू थे. उनकी नस-नस में हिंदू धर्म की सभी खूबियां भरी पड़ी थीं. वेदों में दबी हुईं कुछ शिक्षाओं में, जिनके सार को भुलाकर लोगों ने छाया को ग्रहण कर रखा था, उन्होंने जान डाल दी. उनकी महान हिंदू भावना ने निरर्थक शब्दों के जंजाल में दबे हुए वेदों के अनमोल सत्यों को जाहिर किया. उन्होंने वेदों के शब्दों से ऐसे अर्थ निकाले, जिनसे उस युग के लोग बिल्कुल अपरिचित थे और उन्हें हिन्दुस्तान में इसके लिए सबसे अनुकूल वातावरण मिला.’

‘जहां कहीं बुद्ध गए, उनके चारों ओर अहिंदू लोग नहीं, बल्कि ऐसे हिंदू विद्वान ही घिरे रहते थे जो स्वयं वेदों के ज्ञाता थे. मगर बुद्ध के हृदय की तरह ही उनकी शिक्षा भी अत्यंत व्यापक और सर्वग्राही थी और इसी कारण उनके मरने के बाद भी वह जीवित रही, और संसारभर में फैल गई. और बुद्ध का अनुयायी कहे जाने का खतरा उठाकर भी मैं इसे हिंदू धर्म की विजय कहता हूं. उन्होंने हिंदू धर्म को कभी अस्वीकार नहीं किया, केवल इसका आधार विस्तृत कर दिया. उन्होंने इसमें एक नई जान फूंक दी. इसको एक नया ही रूप दे दिया.’

बुद्धवाणी से परिचित लोग जानते होंगे कि बुद्ध ने वैदिक कर्मकांडों, अंधविश्वासों और पशु-बलि जैसी हिंसक मूढ़ताओं से समाज को उबारना चाहा. लेकिन उनकी भाषा आज के प्रतिक्रियावादियों की भाषा नहीं थी. उनकी भाषा में केवल प्रेम, करुणा और सहानुभूति झलकती है. सत्याग्रह पर ही प्रकाशित एक अन्य लेख में इस पर विस्तार से चर्चा की गई है.

बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित करना जहां एक प्रकार की पुरोहितवादी मूढ़ता हो सकती है, वहीं यह भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की प्रवाहमान धारा में बुद्ध को स्वीकार करने या आत्मसात करने की उत्कंठा भी हो सकती है. इसके लिए ‘अवतार’ शब्द की वास्तविक भावना को समझने की जरूरत होगी. राम, कृष्ण या बुद्ध को अवतार घोषित किए जाने के प्रश्न पर विनोबा ने एक बार कहा था- ‘विचार का भी अवतार होता है, बल्कि विचार का ही अवतार होता है. लोग समझते हैं कि रामचन्द्र एक अवतार थे, कृष्ण, बुद्ध, अवतार थे. लेकिन उन्हें हमने अवतार बनाया है. वे आपके और मेरे जैसे मनुष्य थे. ...हम अपनी प्रार्थना के समय लोगों से सत्य प्रेम, करुणा का चिन्तन करने के लिए कहते हैं. भगवान किसी न किसी गुण या विचार के रूप में अवतार लेता है और उन गुणों या विचार को मूर्त रूप देने में, जिनका अधिक से अधिक परिश्रम लगता है, उन्हें जनता अवतार मान लेती है. अवतार व्यक्ति का नहीं विचार का होता है और विचार के वाहन के तौर पर मनुष्य काम करते हैं. किसी युग में राम के रूप में सत्य की महिमा प्रकट हुई, किसी में कृष्ण के रूप में प्रेम की, किसी में बुद्ध के रूप में करुणा की.’

बुद्ध ने व्यक्तिवाचक या मानवीकृत बाहरी ईश्वर का स्वरूप बदलकर उसे एक नवीन स्वरूप दिया था. कार्य-कारण संबंध या प्रकृति के शाश्वत नियम के रूप में उन्होंने एक नए प्रकार के ईश्वर की खोज की थी  

बुद्ध के बारे में दूसरी बात यह कही जाती है कि वे अनीश्वरवादी थे. दार्शनिकों और इतिहासकारों ने इस एक बात को आधार बनाकर उन्हें भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में एक समानांतर और विरोधी धारा के रूप में स्थापित किया है. आज इस विरोधी भावना का भी राजनीतिक इस्तेमाल कर बौद्ध सांप्रदायिकता को हवा दी जा रही है. हीनयान और महायान की तर्ज पर नवयान और भीमयान की राजनीतिक लहर पैदा की जा रही है. जबकि बुद्ध ने व्यक्तिवाचक या मानवीकृत बाहरी ईश्वर का स्वरूप बदलकर उसे एक नवीन स्वरूप दिया था. कार्य-कारण संबंध या प्रकृति के शाश्वत नियम के रूप में उन्होंने एक नए प्रकार के ईश्वर की खोज की थी. भारतीय परंपरा में पहले से इसके बीज मौजूद रहे हो सकते हैं, जिसे बुद्ध ने अपनी अनुभूति से समझा था और तभी माना था.

महात्मा गांधी ने इसकी सुंदर व्याख्या करते हुए श्रीलंका के बौद्धों से कहा था- ‘मैंने यह बात अनगिनत बार सुनी है और बौद्ध धर्म की भावना को प्रकट करने का दावा करनेवाली किताबों में पढ़ी है कि बुद्ध ईश्वर में विश्वास नहीं करते थे. मेरी नम्र सम्मति में बुद्ध की शिक्षाओं की मुख्य बात के यह बिल्कुल विरुद्ध है. मेरी नम्र सम्मति में यह भ्रान्ति इस बात से फैली कि बुद्ध ने अपने जमाने में ईश्वर के नाम पर चलनेवाली सभी बुरी चीजों को अस्वीकार कर दिया था और यह उचित ही किया था. उन्होंने बेशक इस धारणा को अस्वीकार किया कि जिसे ईश्वर कहते हैं, उसमें द्वेष-भाव होता है, वह अपने कामों के लिए पछताता है, वह पृथ्वी के राजाओं की तरह लोभ और घूस का शिकार हो सकता है, या वह कुछ व्यक्तियों पर विशेष कृपालु हो सकता है...’

‘…बुद्ध संपूर्ण आत्मा इस विश्वास के साथ विद्रोह कर उठी कि जिसे ईश्वर कहते हैं, वह अपनी तुष्टि के लिए अपने ही रचे हुए पशुओं के खून की आवश्यकता महसूस करता है. इसलिए उन्होंने परमात्मा को उसके सच्चे आसन पर पुनः प्रतिष्ठित किया और उस पवित्र सिंहासन पर बैठे हुए लुटेरे को हटा दिया. उन्होंने यह बात जोर देकर समझाई और इस सत्य की एक बार फिर से घोषणा की कि यह संसार कुछ शाश्वत और अटल नैतिक नियमों शासित है. उन्होंने बिना किसी हिचक के कहा है कि यह नियम ही परमात्मा है.’ (यंग इंडिया, 24 नवंबर, 1927)

बुद्ध, ईसा मसीह या पैगंबर मुहम्मद जैसे किसी भी महापुरुष के स्वयं के जीवन में और उनके बाद उनके विचारों के आधार पर बने पंथों और ग्रंथों में बहुत फर्क हो जाता है. बौद्ध धर्म इसका एक जीता-जागता उदाहरण है  

अभी हाल में जब बर्मा में दंगे छिड़ने के समाचार आए, तो दुनिया भर में लोगों ने इसपर आश्चर्य जताया था कि बुद्ध के अनुयायी भी क्या इस कदर हिंसक हो सकते हैं. लेकिन यह केवल आज की बात नहीं है. 1938 में भी बर्मा में बौद्धों और मुसलमानों के बीच भयंकर दंगे छिड़े थे. गांधीजी को जब इस बारे में तार मिला, तो उन्होंने 20 अगस्त, 1938 को ‘हरिजन’ में एक लेख में लिखा- ‘भगवान बुद्ध पर मुझे अत्यंत श्रद्धा है. वे शांति के महानतम उपदेशकों में से हैं. बुद्ध का संदेश प्रेम का संदेश है. यह बात मेरे समझ में नहीं आती कि उस धर्म के अनुयायी भी कैसे एकदम बर्बर बन सकते हैं और वह भी जाहिरा तौर पर एक बहुत ही मामूली वजह से. अखबारों की खबरें अगर सही हैं तो यह और भी अफसोस की बात है कि बुद्ध के संदेश के मुख्य प्रचारक और प्रतिपादक, पुरोहित लोग खुद भी उपद्रवियों के बीच देखे गए— और देखे गए उपद्रवियों के शांत करते हुए नहीं, बल्कि लूट-मार, अग्निकांडों और हत्यायों में भाग लेते हुए.’

वास्तव में बुद्ध, ईसा मसीह या पैगंबर मुहम्मद जैसे किसी भी महापुरुष के स्वयं के जीवन में और उनके बाद उनके विचारों के आधार पर बने पंथों और ग्रंथों में बहुत फर्क हो जाता है. बौद्ध धर्म इसका एक जीता-जागता उदाहरण है. संगठित धर्मपंथ के रूप में बौद्धवाद सामाजिक द्वेष, राजनीतिक लामबंदी और सांप्रदायिक प्रतिक्रिया का हथियार बनता जा रहा है. लेकिन भारतीय राजनीतिक संदर्भ में इसके लिए जिम्मेदार हमारा दलित वर्ग नहीं है. बल्कि राजनीतिक हिन्दुत्व के नाम पर हो रही सांप्रदायिक मूढ़ता ही इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार दिखाई देती है. हमारे कथित सवर्णों के बड़े हिस्से का खोखला अहंबोध इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार दिखाई देता है.

हम याद रखें कि ऐतिहासिक रूप से अन्याय और अपमान के शिकार पीड़ित तबके आपस में एकजुट होने के लिए आखिरकार किसी संगठित धर्मपंथ का सहारा लेते रहे हैं. फिर चाहे वह अलग-अलग संदर्भों में राजनीतिक हिंदूवाद हो, मुस्लिमवाद हो या प्रतिक्रियावादी बौद्धवाद. लेकिन कई बार इस प्रतिक्रिया को उभारने के लिए केवल मनोवैज्ञानिक स्तर पर पैदा किया गया पीड़ाबोध ही काफी होता है. गांधी ने बुद्ध के उपदेशों का इस्तेमाल स्वयं को और समाज को ऐसे हिंसक प्रतिक्रियाबोध से उबारने के लिए किया था. लेकिन आज हम उन्हीं बुद्ध के नाम पर क्या कर रहे हैं?