‘वे हमसे फोन पर बात करते हुए अक्सर रो पड़ते हैं.’

नादिया यूनुस अपने भाई के परिवार के बारे में बताते हुए इस बात पर खास जोर देती हैं. उनके भाई इराक के दूसरे सबसे बड़े शहर मोसुल में अपने घर में फंसे हुए हैं. सात महीने से संघर्षग्रस्त इस इलाके में यह परिवार घर के तहखाने में रहकर किसी तरह अपनी जिंदगी बचा रहा है. एक अनुमान के मुताबिक इस परिवार की तरह करीब पांच लाख लोग अब भी मोसुल के उस पश्चिमी इलाके में फंसे हैं जिस पर आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएस) का कब्जा है. बेहद घनी बसाहट वाले इस शहर पर आईएस ने जून-2014 में कब्जा किया था.

मोसुल को आईएस के कब्जे से छुड़ाने के लिए इराकी सेना ने अमेरिका के नेतृत्व वाली अंतर्राष्ट्रीय गठबंधन सेनाओं की मदद से अक्टूबर-2016 में अभियान शुरू किया था. इस संघर्ष में जिंदा बचे लोग बताते हैं कि सेना ने जैसे ही शहर की गलियों में कदम रखा, आईएस के लड़ाकों ने कार बम धमाकों से पूरे इलाके को थर्रा दिया और घरों की छतों पर अपने हथियारों के साथ पोजीशन संभाल ली. इसके बाद गठबंधन सेनाओं ने शहर पर हवाई हमले करने शुरू कर दिए.

बस, तब से हालात यूं हैं कि मरने वालों की गिनती भी अब किसी के लिए मुमकिन नहीं है. शहर में शवों के ढेर लगते जा रहे हैं. लोग मरने वालों को उन्हीं के हाल पर छोड़ दे रहे हैं. वे जहां पड़े हैं, वहीं दफन हो जाने के लिए. दूसरी तरफ, जो जिंदा बच गए हैं, वे भी मरने के कगार पर हैं क्योंकि खाना-पीना धीरे-धीरे खत्म हो रहा है.

सेनाओं के जमीनी और हवाई हमलों के बाद शहर के पूर्वी इलाके में स्थित मोसुल विश्वविद्यालय का यह हाल हो गया है. फोटो क्रेडिट : सुप्रिया शर्मा
सेनाओं के जमीनी और हवाई हमलों के बाद शहर के पूर्वी इलाके में स्थित मोसुल विश्वविद्यालय का यह हाल हो गया है. फोटो क्रेडिट : सुप्रिया शर्मा

नादिया के भाई का परिवार पश्चिमी मोसुल के अल-फारुक इलाके में रहता है. उनके घर की छत पर आईएस के किसी लड़ाके ने पोजीशन नहीं ले रखी थी. इसीलिए उन्हें लगता था कि सेनाएं उस परिसर को शायद निशाना न बनाएं. इसके बावजूद एक दिन दो मोर्टार उनके आंगन में आ गिरे और सब तहस-नहस हो गया.

नादिया बताती हैं, ‘इस हमले में मेरी भाभी लैला तुरंत ही जलकर खाक हो गईं. भतीजी जवाहर की बांह बुरी तरह जल गई. उसे भी जान से हाथ धोना पड़ा. मेरे रिश्ते के तीन भाई- अनवर, रियाद और नजाह भी मारे गए. मेरे भाई सलाह यूनुस की पीठ में गहरा जख्म हो गया. तीन भतीजे और एक अन्य बच्चा भी घायल है. उनके पास घावों पर लगाने के लिए मरहम तक नहीं है. उन पर सिर्फ कपड़ों की पटि्टयां बांध कर रखी हैं.’

नादिया आगे बताती हैं, ‘करीब 15 लोग उस घर में फंसे हुए हैं. सब के सब भूख से मर रहे हैं. आईएस के लड़ाकों ने उन्हें घर में ही बंद कर दिया है. वे लोग फोन भी नहीं कर सकते. अगर आईएस के लोगों ने उन्हें फोन करते देख लिया तो उनको जान से मार दिया जाएगा. वे किसी तरह हमें चोरी-छिपे फोन करते हैं. रो-रोकर अपना हाल बताते हैं. उनके साथ हम भी रोते हैं क्योंकि कुछ और करने की स्थिति में हम हैं नहीं.’

यह महिला भी मोसुल के पश्चिमी इलाके से ही ताल्लुक रखती है. लेकिन इतनी थक चुकी है कि बात भी नहीं कर सकती. फोटो क्रेडिट : सुप्रिया शर्मा
यह महिला भी मोसुल के पश्चिमी इलाके से ही ताल्लुक रखती है. लेकिन इतनी थक चुकी है कि बात भी नहीं कर सकती. फोटो क्रेडिट : सुप्रिया शर्मा

तिगरिस नदी के किनारे पर बड़े इलाके में फैला हुआ मोसुल शहर इराक के उत्तर-पश्चिम में है. यहां से करीब 120 किलोमीटर दूर पश्चिम की तरफ आगे बढ़ते हैं तो इराक की सीमा सीरिया से मिलने लगती है. साल 2014 की गर्मियों में सीरिया में छिड़ा गृह युद्ध इराक में भी घुस आया था. आईएस के पूर्व ख़लीफा अबू-बकर-अल-बगदादी के वफादार हथियारबंद लड़ाकों ने मोसुल पर कब्जा जमा लिया था. उस वक्त इराकी सेना उनसे संघर्ष करने की स्थिति में नहीं थी लिहाज़ा वह यहां से भाग निकली और इसी शहर से बगदादी को इस्लामिक स्टेट का ख़लीफा घोषित कर दिया गया. इस्लामिक स्टेट यानी वह राज्य जो इस्लाम के कानूनों और शरियत के कायदों से चलता हो. आईएस के कब्जे की पुख़्तगी के लिए शहर में लगे तमाम साइन बोर्डों को नए सिरे से लिखा गया. साथ ही इराक की राजधानी बग़दाद को आईएस का एक प्रांत घोषित कर दिया गया.

मोसुल के पश्चिमी इलाके पर कब्जा करने के बाद सेना ने आईएस के लगाए साइन बोर्डों पर काली स्याही पोत दी है. फोटो क्रेडिट : सुप्रिया शर्मा
मोसुल के पश्चिमी इलाके पर कब्जा करने के बाद सेना ने आईएस के लगाए साइन बोर्डों पर काली स्याही पोत दी है. फोटो क्रेडिट : सुप्रिया शर्मा

इराक के इलाकों में आईएस के कब्जे के बाद अमेरिकी नेतृत्व वाली सेनाओं ने अक्टूबर-2014 में ऑपरेशन इनहेरेंट रिजॉल्व शुरू किया. ताकि इराकी सेनाएं इन इलाकों को आतंकियों के कब्जे से वापस हासिल कर सकें. इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए गठबंधन सेनाओं ने पिछले साल मोसुल पर ध्यान केंद्रित किया है. अक्टूबर-2016 में मोसुल पर कब्जे की लड़ाई शुरू होने से पहले इराकी सरकार ने पैम्फलेट गिरवाकर शहर के लोगों को सचेत किया था कि वे अपने घरों के भीतर ही रहें. लोग रहे भी. लेकिन जैसे-जैसे सेना आगे बढ़ी, आईएस के लड़ाकों ने लोगों को घरों से निकालकर इकट्ठा करना शुरू कर दिया. शहर छोड़ चुके लोग बताते हैं कि आतंकी आम लोगों काे ढाल की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं. वहीं इमारतों के भीतर फंसे लोगों के मुताबिक, उन्हें उम्मीद नहीं थी कि गठबंधन सेनाएं उनके घरों पर बम हमले करेंगी. लेकिन ऐसा हो रहा है. इन हमलों को मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था- एमनेस्टी इंटरनेशनल चिंताजनक बताती है जिन्होंने घरों को भीतर फंसे परिवारों सहित जमींदोज कर दिया.

पूर्वी मोसुल के अल-सलाम इलाके में पूरी तरह मलबा बन चुकी एक इमारत. फोटो क्रेडिट : सुप्रिया शर्मा
पूर्वी मोसुल के अल-सलाम इलाके में पूरी तरह मलबा बन चुकी एक इमारत. फोटो क्रेडिट : सुप्रिया शर्मा

बीते मार्च की 17 तारीख को ही अल-जदीदा इलाके में हवाई हमला हुआ था. उसमें 100 से ज्यादा आम नागरिक मारे गए. अब अमेरिका ने भी यह बात मान ली है. इराकी सेना के एक कमांडर के मुताबिक हवाई हमले इसलिए किए जा रहे हैं, ताकि आईएस के निशानेबाजाें को इमारतों की छतों से नीचे उतरने पर मजबूर किया जा सके. वे कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि बमबारी रोकने के लिए आईएस के लड़ाकों ने जानबूझकर यह जाल बिछाया है ताकि आम लोगों को हमारे खिलाफ किया जा सके.’ हालांकि इस संघर्ष में बच निकले दो लोगों में से एक ने एसोसिएटेड प्रेस को बताया कि आईएस के लड़ाके तो इमारतों की छतों पर हैं ही नहीं. मार्च के हवाई हमले में बड़ी तादाद में आम लोगों के मारे जाने पर पूरी दुनिया में प्रतिक्रिया हुई. लेकिन इससे पश्चिमी माेसुल पर बमबारी और हमले बंद नहीं हुए.

ऐसे हमलों में आम नागरिकों की मौतों पर नजर रखने वाले स्वतंत्र समूह ‘इराक बॉडी काउंट’ के मुताबिक पश्चिमी माेसुल में ही करीब 1,254 लोगों की जान जा चुकी है. हालांकि गठबंधन सेनाएं नवंबर से अब तक सिर्फ 44 लोगों की मौत की ही पुष्टि करती हैं. वहीं इराक का दावा है कि अक्टूबर के बाद से इन हमलों में 1,000 से ज्यादा आईएस आतंकी मारे जा चुके हैं.

तिगरिस नदी मोसुल शहर के बीच से होकर बहती है. क्रेडिट : गूगल मैप
तिगरिस नदी मोसुल शहर के बीच से होकर बहती है. क्रेडिट : गूगल मैप

मोसुल शहर के बीच से बहने वाली तिगरिस नदी पर बने पांच पुल घने बसे हुए पुराने (पश्चिमी) और नए (पूर्वी) शहर को आपस में जोड़ते थे. ये सभी पुल हवाई हमलों में नष्ट कर दिए गए. ताकि आईएस के लड़ाके एक से दूसरी तरफ न आ सकें. लेकिन इससे आम नागरिकों का भाग पाना भी मुश्किल हो गया है. यही नहीं, जो भागने की कोशिश भी करते हैं, उन्हें आईएस के आतंकी निर्दयता से सजा देते हैं. अल-मग़रिब इलाके से ताल्लुक रखने वाले एक शख्स बताते हैं, ‘मेरा भाई हमारी 85 साल की मां को पीठ पर लादकर उन्हें बचाने की कोशिश कर रहा था. आईएस के लड़ाकों ने उसे गोली मार दी.’ इसी तरह से राजिम-अल-हदीद इलाके में रहने वाली फहीमा बताती हैं, ‘मेरी भाभी ने यहां से बचकर भागने की कोशिश की. लेकिन उसे आईएस के निशानचियों ने मार दिया.’

शहर के करीब 60 किलोमीटर दक्षिण में एक पीपे का पुल बनाया गया है. यहां से तिगरिस नदी के पश्चिमी किनारे पर स्थित अल-अकरब चैकप्वाइंट तक पहुंचा जा सकता है. यहां से शहर करीब 10 किलोमीटर रह जाता है. यहां एक मई को काफी चहल-पहल नजर आ रही थी. लोग ट्रक, बस और सटूटा (मोटरसाइकिल से खींची जाने वाली गाड़ी) चढ़ने की जद्दोजहद करते नजर आ रहे थे. अपने घर जाने के लिए, जिन्हें सेना ने आतंकियों के कब्जे से छुड़ा लिया था. कुछ लोग नए गद्दे वगैरह भी लाद रहे थे. जबकि कइयों के हाथ में सिर्फ पानी की बोतलें ही थीं.

आम नागरिकों को यहां से गुजरने की इजाजत थी लेकिन इराक की आतंक निरोधी सेवा (आईसीटीएस) के जवान पत्रकारों को आगे नहीं जाने दे रहे थे. ऐसे ही सत्याग्रह की सहयोगी वेबसाइट स्क्रोल डॉट इन की इस संवाददाता ने आगे जाने की कोशिश की तो आईसीटीएस के जवान ने रोक लिया. उनका कहना था, ‘पहले फील्ड मार्शल से इजाज़त लीजिए.’ जब उनसे पूछा गया कि वे कहां मिलेंगे तो जवाब मिला, ‘वो, सबसे आगे.’ चूंकि मोसुल के पश्चिम में जाने पर पूरी तरह पाबंदी लगी हुई है, इसलिए वहां के बारे में कोई भी जानकारी मिलने का इकलौता जरिया सिर्फ वे लोग हैं, जो वहां से बच निकले हैं.

हवाई हमलों में मोसुल के पुल और फ्लाईओवर बुरी तरह नष्ट हो चुके हैं. फोटो क्रेडिट :सुप्रिया शर्मा
हवाई हमलों में मोसुल के पुल और फ्लाईओवर बुरी तरह नष्ट हो चुके हैं. फोटो क्रेडिट :सुप्रिया शर्मा

अल-जदीदा इलाके में रहने वाले लोगों के मुताबिक 14 मार्च को हुआ हवाई हमला तो ऐसे ही कई और हमलों में से एक था. मोहम्मद अब्दुल्ला हुसैन बताते हैं, ‘बाजार में अचार वाली दुकान की अगली गली में जितने भी मकान थे, सब के सब ऐसे ही एक हमले में ध्वस्त हो गए. वहां रहने वाले सभी लोग मारे गए. यह अप्रैल के आखिरी हफ्ते की बात है. मरने वाले कितने हैं, इसकी गिनती करना तो मुमकिन नहीं, अलबत्ता इधर-उधर पड़े शवों की गंध जरूर आप हर तरफ महसूस कर सकते हैं.’ इतना कहते-कहते वे पश्चिमी मोसुल की तरफ जाने वाले ट्रक पर कूदकर चढ़ जाते हैं. हुसैन जैसे लोगों ने जब से सुना है कि लावारिस से पड़े उनके मकानों को लूटा जा रहा है तो वे वापस जाने के लिए बेचैन हो गए हैं. बावजूद इसके कि उस इलाके में अब भी लड़ाई छिड़ी हुई है.

अप्रैल के आखिरी हफ्ते में सेना ने अल-तानेक इलाके को अपने कब्जे में ले लिया था. इस इलाके में रहने वाले लोग मोसुल के हालात की तुलना सीरिया के कोबेन शहर से करते हैं. वहां 2015 में छिड़ी जंग के दौरान चार महीने के भीतर ही 3,200 इमारतें जमींदोज हो गई थीं. इब्राहिम अल-नुआमी बताते हैं, ‘अल-तानेक का 90 फीसदी हिस्सा बर्बाद हो चुका है. यहां तक कि सड़कें भी हवाई हमलों की मार से अछूती नहीं रही हैं. उनमें बड़े-गहरे गड्‌ढे हो गए हैं.’ इब्राहिम के भाई के परिवार के सात में छह सदस्य इन हमलों में मारे जा चुके हैं. एक बच्ची की तरफ इशारा करते हुए वे कहते हैं, ‘सिर्फ यह बच गई है.’

पश्चिमी मोसुल के बाहरी इलाके की एक सुरक्षा चौकी. लोग सेना के ट्रक पर चढ़ने के लिए इसी तरह संघर्ष करते नजर आते हैं. ताकि अपने घर लौट सकें. फोटो क्रेडिट : सुप्रिया शर्मा
पश्चिमी मोसुल के बाहरी इलाके की एक सुरक्षा चौकी. लोग सेना के ट्रक पर चढ़ने के लिए इसी तरह संघर्ष करते नजर आते हैं. ताकि अपने घर लौट सकें. फोटो क्रेडिट : सुप्रिया शर्मा

अल-तानेक की ही फिदा सरदाना को उनके पति ने बताया है कि हवाई हमले में उनकी गली के दो मकान ध्वस्त हो गए. इन मकानों में रहने वाले 11 लोगों की मौत हो गई. वे बताती हैं, ‘सब कुछ खत्म हो गया. अबू शयाब और अबू रयान के घरों में अब कुछ नहीं बचा.’ संयुक्त राष्ट्र के ह्यूमन सेटलमेंट प्रोग्राम का अनुमान है कि माेसुल के करीब 1,140 मकान अब तक हुए हमलों में नष्ट हो चुके हैं. मोसुल के पूर्वी इलाके के मुकाबले पश्चिम में ढाई गुना ज्यादा तबाही हुई है. अल-जदीदा में ही एक तिहाई मकान ढह गए. पड़ोस में रहने वाले एक शख्स नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं, ‘वायु सेना को अलग तरह के हथियार इस्तेमाल करने चाहिए. सिर्फ एक-दो आईएस आतंकियों को खत्म करने के लिए वे 30-40 नागरिकों को क्यों मार रहे हैं. पूरी संपत्ति क्यों तबाह कर रहे हैं.’ नुआमी तो इन हमलों को जानबूझकर की गई कार्रवाई बताते हैं. उनके मुताबिक, ‘आईएस तो कमजोर पड़ चुका है.’

लड़ाई में दो-तरफा हमले झेलते हुए इस मकान की हालत कुछ यूं जर्जर हो गई है.
लड़ाई में दो-तरफा हमले झेलते हुए इस मकान की हालत कुछ यूं जर्जर हो गई है.

सरदाना के बच्चों के सामने भूखों मरने की नौबत आ गई थी, जिसके बाद उन्हें मार्च में रात के अंधेरे की आड़ में अपने इलाके से भागना पड़ा. हालांकि इसके बावजूद वे सेना की कार्रवाई का समर्थन करते हुए कहती हैं, ‘कोई और रास्ता ही नहीं था. आईएस के लड़ाके पीछे हटने को तैयार ही नहीं थे. वे लोगों को मार रहे थे. उन्हें पकड़ रहे थे. उन्हें फांसी पर चढ़ा रहे थे.’ नादिया यूनुस भी कुछ ऐसा ही सोचती हैं. बल्कि वे तो अपने भाई के परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंतित होते हुए सरकार से अपील करती हैं कि वह जल्द आगे बढ़े ताकि अल-फारुक़ इलाके में रहने वाले लोगों की जान बचाई जा सके.’