सत्याग्रह पर ही 29 मार्च को छपे लेख में हमने पढ़ा था कि वे कौन से हालात थे, किसकी लापरवाही थी या फिर वह किसकी कथित साजिश थी कि 34 बंगाल इन्फेंट्री के सिपाही मंगल पाण्डेय ने आक्रोशित होकर लेफ्टिनेंट बाउ पर गोली चला दी थी और बग़ावत का बिगुल फूंक दिया. हालांकि बाद में यह आग तो बुझ गई, पर चिंगारी अब भी सुलग रही थी. 1857 में आठ अप्रैल के दिन मंगल पाण्डेय को फांसी लग चुकी थी. इसने कुछ सिपाहियों के हौसले पस्त कर दिए थे, तो कुछ और भड़क गए थे. हालांकि हवाओं में यह इशारा तैरने लगा था कि जल्द ही कुछ बड़ा-भयंकर घटने वाला है. वह क्या और कैसा था, इसे इन तीन अलग-अलग लोगों के आंखों देखे वर्णन से समझा जा सकता है.

बंगाल आर्मी में तैनात मेजर जॉर्ज ब्रूस मालेसन की रिपोर्ट ‘बंगाल आर्मी का ग़दर’ के मुताबिक :

‘विभिन्न कमांडिंग ऑफिसर्स ने यह रिपोर्ट दी कि पूरी फौज विद्रोह का मानस बना चुकी है. लखनऊ, आगरा, अम्बाला, सियालकोट, बनारस हर तरफ़ हलचल थी. इसके बावजूद प्रशासनिक अधिकारियों ने बंगाल आर्मी की सबसे विश्वस्त, 84 यूनिट को रंगून के लिए रवाना कर दिया. सिविल अफसर यह बात मानने को राज़ी ही नहीं थे कि उनसे गलती हुई है. वे अब भी सारे घटनाक्रम की अनदेखी कर रहे थे और मंगल पांडे की इन्फेंट्री यूनिट को बर्खास्त नहीं किया गया था.

आग धीरे-धीरे बढ़ रही थी. तीन मई को एक चिट्ठी पकड़ी गयी जिसमें एक यूनिट के सैनिक नाफ़रमानी को हर यूनिट में फैलाने की बात कर रहे थे. उधर मेरठ कैंटोनमेंट में किसी ने अफवाह उड़ा दी कि फौजियों को दी जाने वाली रोटी के आटे में अंग्रेजों ने गाय की हड्डियां मिला दी हैं. हालात उस दिन के बाद तेजी से ख़राब होते चले गए जब तीन कैवेलरी (घुड़सवार) यूनिट के जवानों को नाफ़रमानी की सज़ा सुनाई गयी. बाक़ी के जवानों में आक्रोश भर गया और उन्होंने अंतिम फैसला कर लिया.

10 मई 1857, इतवार की शाम अंग्रेज़ अफसर चर्च जाने की तैयारी कर रहे थे. बैरकें खामोश थीं. कहीं कोई हलचल नहीं. तभी पांच बजे, प्लान के मुताबिक़, आग लगने पर बजने वाला हूटर चिल्ला उठा और शोर मचाते हुए सिपाही बाहर निकल आये. आग बुझाने के लिए नहीं, लगाने के लिए. बंगाल आर्मी ने विद्रोह कर दिया था!

यूनिट के जवान जेल की तरफ भागे और अपने कैदी साथियों को आज़ाद करा लिया. हर तरफ अफरा-तफरी मच गयी और इसी बीच बाग़ी सिपाहियों के सामने कर्नल फिनिस आ गया. उसे गोली मार दी गयी! सिपाही अब तक बेलगाम होकर कैंटोनमेंट में घूम-घूमकर अंग्रेज़ अफ़सरों के घरों की तलाशी लेने लग गए. बच्चा, बूढ़ा, जवान या औरत, जो भी अंग्रेज़ सामने आया उसे मार दिया गया. कुछ ही घंटों में मेरठ छावनी बागियों के कब्ज़े में थी.

दिन ढ़ल चुका था. योजना के मुताबिक़ बागियों ने दिल्ली का रुख कर लिया. उधर मेरठ में कुछ वफादार सिपाहियों ने दिल्ली की सुरक्षा में तैनात ब्रिगेडियर ग्रेव्स को खबरदार कर दिया था. मेरठ और दिल्ली के बीच का फासला कोई चालीस मील है. बीच में हिंडन नदी बहती है. ब्रिगेडियर ने नदी पर बने पुल को तोड़ने की रणनीति बनाई जिससे बढ़ते हुए बागियों को रोका जा सके. लेकिन मई के महीने में हिंडन में पानी कम ही होता है लिहाज़ा, बागियों को पुल के होने, न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता और फिर यदि दिल्ली में रहने वाले अंग्रेजों को भागना पड़ा तो पुल के न होने से मुश्किल हो सकती थी. इसलिए उसने अपनी रणनीति बदल दी.

अल सुबह, यानी 11 मई को बाग़ी सिपाही दिल्ली के कश्मीरी गेट के बाहर ब्रिगेडियर ग्रेव्स की सेना के सामने थे. ब्रिगेडियर की सेना के ज़्यादातर सैनिकों ने पाली बदल ली. बाकी बचे सैनिकों के साथ दिल्ली पर कब्ज़ा रखना उसके लिए मुश्किल हो गया. बाग़ी दिल्ली में दाख़िल हो गए. बहादुर शाह ज़फर की सुरक्षा में तैनात कप्तान डगलस और ईस्ट इंडिया कम्पनी के एजेंट साइमन फ्रेज़र को बेरहमी से मार दिया गया. किले के अंदर और आसपास अंग्रेज औरतों और बच्चों को भी नहीं बख्शा गया.

ब्रिगेडियर अब भी मोर्चे पर डटा हुआ था. उसकी आख़िरी कोशिश थी कि आयुध खाने को बचा लिया जाए. आयुध खाने की सुरक्षा में तैनात लेफ्टिनेंट विलेबी ने आत्मघाती प्लान बनाया. वह जाकर आयुध खाने में छिप गया. जब बड़ी तादाद में बाग़ी अंदर घुस आये तो उसने खुद को उड़ा दिया और साथ में दो हज़ार बाग़ी भी मारे गए! जब ब्रिगेडियर ग्रेव्स ने धमाके आवाज़ सुनी तो वो समझ गया कि अब दिल्ली हाथ से निकल गयी है. उसने बचे-खुचे अंग्रेज़ बच्चों और औरतों को दिल्ली से भगा दिया. बागियों ने बहादुर शाह ज़फर को हिंदुस्तान का बादशाह घोषित कर दिया और इसके साथ ही दिल्ली उनके कब्जे में थी!

ग़ालिब की नज़र से

रखियो, ग़ालिब, मुझे इस तल्ख़नवाई (कड़वेपन से) से मु’आफ,
आज कुछ दर्द मेरे दिल में सिवा होता है
शिकवे के नाम से, बेमेहर (बेवफा इंसान) ख़फ़ा होता है,
ये भी मत कह कि जो कहिये, तो गिला होता है’

उस दौरान गालिब दिल्ली में ही थे. ग़दर से पैदा हुए हालात पर उन्होंने अपनी किताब ‘दस्तंबू’ में कुछ यूं वर्णन किया है :

‘11 मई, 1857 का दिन था, यकायक दिल्ली में हर तरफ होने वाले धमाकों से घरों के दरो-दीवार हिल गए. मेरठ के नमकहराम सिपाही अंग्रेजों के खून से अपनी प्यास बुझाने दिल्ली आ पहुंचे थे. जिनके हाथों में दिल्ली की निगहबानी थी वो भी जाकर बागियों से मिल गये. बागियों ने पूरे शहर को रौंद डाला और उस समय तक अंग्रेज़ अफ़सरों का पीछा नहीं छोड़ा जब तक उन्हें क़त्ल न कर दिया. अंग्रेज़ बच्चे, जनानियां सब क़त्ल–औ-ग़ारत के शिकार हुए. लाल किले से बागियों ने अपने घोड़े बांध लिए और शाही महल को अपना ठिकाना बना लिया. तीन दिन हो गए हैं, न पानी है और न ही कुछ खाने को. डाक का काम भी ठप्प हो गया है. मैं न दोस्तों से मिल पा रहा हूं और ना ही अपनों का हाल मालूम हो रहा है.’

ग़ालिब जो बागियों को नमकहराम कहकर बुलाते हैं, उन्हीं के लिए आगे लिखते हैं, ‘ये हिम्मतवाले बाग़ी जहां से भी गुजरे उन्होंने अपने क़ैदी साथियों को आज़ाद करा लिया. इस समय दिल्ली के बाहर और भीतर कोई पांच हज़ार सैनिक जमे हुए हैं. गोरे अब भी हिम्मत जुटाए खड़े हैं. रात-दिन काला धुंआ शहर को लपेटकर रखता है. लुटेरे हर तरह से आज़ाद हैं. व्यापारियों ने टैक्स देना बंद कर दिया. बस्तियां वीरान हो चुकी हैं. बाग़ी सारा दिन सोना-चांदी लूटते हैं और शाम को महल के रेशमी बिस्तर पर नींद काटते हैं. शरीफ़ लोगों के घरों में मिट्टी का तेल भी नहीं है. हर तरफ अंधेरा है...’

विष्णुभट्ट गोडसे की नज़र से

मराठी इतिहासकार विष्णुभट्ट गोडसे (1827-1904) उन दिनों उत्तर भारत की यात्रा पर निकले थे और ग़दर की हलचल में फंस गए. ग़दर पर लिखी उनकी किताब ‘माझा प्रवास’ का अमृतलाल नागर द्वारा हिंदी रूपांतरण ‘आंखों देखा ग़दर’ के कुछ अंश :

‘...हम सतपुड़ा के जंगलों को पार करते हुए मऊ (मध्य प्रदेश) की छावनी पहुंचे. हम लोग थके हुए थे. स्नान-भोजन के हिसाब से हमने शहर के बाहर रुकना तय किया. पलटन के दो-चार सिपाही भी हमारे स्थान पर आ गए. मेल जोल करने पर मालूम हुआ कि वे सिपाही कोंकण के पास के ही थे. परदेस में अपने प्रान्त का मिल जाने से बड़ा चैन आया.

बातचीत में उन्होंने बताया कि आज से तीन दिन बाद बड़ी विपत्ति आने वाली है. राज्य में क्रांति होने वाली है. भयंकर लूट-पाट के अासार हैं और सलाह दी कि हम वापस चले जाएं. जब हमने पूछा तो सिपाहियों ने बताया कि अंग्रेज़ सरकार हमारा धर्म भ्रष्ट करने जा रही है. विलायत से आई कमानीदार बंदूकों के कारतूस के खोल को गाय और सूअर की चर्बी से बनाया गया है. उसे मुंह से खोलना पड़ता है... अंग्रेज़ हिंदुओं को ईसाई बनाना चाहते हैं आदि कारण बताए. मेरठ की छावनी से यह गुप्त सलाह पत्रों द्वारा जगह-जगह पहुंचा दी गयी है. आज से तीसरे दिन, यानी 10 मई को, ऐसी प्रलय आएगी कि हर तरफ हाहाकार मच जाएगा...’

यहां ध्यान देने वाली बात है कि जॉर्ज ब्रूस मालेसन ने भी चिट्ठियां पकड़े जाने का जिक्र किया है. चौंकाने वाली बात यह है कि मध्य प्रदेश समेत अन्य सुदूर इलाकों तक ग़दर होने की बात फ़ैल गई थी पर अंग्रेज़ बेखबर थे.

गोडसे की किताब के मुताबिक आगे का किस्सा कुछ यूं है : ‘10 मई की तारीख आ गयी. हम जल्द से जल्द मऊ से बाहर निकल जाना चाहते थे. सुबह के दस बजे थे कि यकायक तोप के धड़ाके की आवाज़ सुनाई दी. आगे जाने पर मालूम हुआ कि सारी छावनी को आग लगा दी गयी है. चारों तरफ लोग घबराए हुए यहां-वहां दौड़ रहे थे. हम लोगों को सिपाहियों ने घेर लिया था. डरते हुए हमने कहा कि हम लोग ब्राह्मण हैं और यज्ञ के सिलसिले में इंदौर जा रहे हैं. उन्होंने हमें अपने साथ ले लिया. रास्ते में जो भी मिला उसे या तो मार दिया गया या लूट लिया गया.

कुछ दिनों बाद जब हम ग्वालियर पहुंचे. वहां भी हर रोज ग़दर की ख़बरें मिलतीं. अलग-अलग लोगों के अलग-अलग भाव थे. कोई कीमती सामान छुपा रहा था तो कोई इस उम्मीद में था कि जब यहां ग़दर मचेगा तो लूट का माल हाथ आएगा. भादों के महीने में बाज़ार में मैंने तात्या टोपे को देखा. उसने वहां की सरकार को नुकसान न पंहुचाने के बदले गाड़ियां, घोड़े, ऊंट आदि मांगे. ग्वालियर सरकार ने उसकी बात मान ली. तात्या ने इसके बाद गुलसरई के राजा केशव राव को धमकाया और खर्चे के तीन लाख मांगे. राजा ने मना किया तो युद्ध छिड़ गया. तात्या से घबराकर राजा की सेना ने हथियार डाल दिए. तात्या ने ख़ज़ाना लूट लिया और राजा को पकड़कर कानपुर की ओर रवाना हो गया.

उधर नाना साहब ने कानपुर जीतकर असलाह-बारूद अपने कब्ज़े में ले लिया और शहर में अपने नाम की दुहाई फिरवा दी. बाज़ार फिर से खुल गए. कानपुर में एक रोज़ ये खबर उड़ी कि गंगा के रास्ते कुछ गोरे इलाहबाद भाग रहे थे और किले पर से तोप चला दी गयी, कुछ गोरे मारे गए. औरतों और बच्चो को बंदी बना लिया गया. एक गोरी औरत कुछ लोगों को अपनी ओर मिलाकर भागने का प्रयास कर रही थी कि पकड़ी गयी. नाना साहब के आदमियों ने सब औरतें और बच्चे मौत के घाट उतार दिए.

इस घटना को 15 दिन भी नहीं बीते कि अंग्रेज सेना ने कानपुर को चारों ओर से घेर लिया. लड़ाई शुरू गयी. अंग्रेज़ सिपाही अपने बच्चों और औरतों की मौत का बदला लेने के लिए पागलों की तरह लड़ रहे थे. कुल ग्यारह दिन लड़ाई चली. बागी हार गए थे. पेशवा अपना परिवार लेकर लखनऊ भाग गए. उधर कानपुर में ‘खल्क ख़ुदा का, मुल्क बादशाह का, अमन अंग्रेज़ सरकार का’ की डौंडी पिटवा दी गयी...’

चलते-चलते

जॉर्ज ब्रूस मालेसन अपनी रिपोर्ट में कहता है कि ब्राह्मणों ने साबित कर दिया है कि अगर उनके पास हथियार हों तो उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता, मुसलमान भी अपने मज़हब को तरजीह देता है, ये लोग ईसाइओं से नफरत करते हैं और हमेशा कोशिश करेंगे कि यूरोपवासियों को खत्म कर दिया जाए.

उधर जब अंग्रेजों ने दिल्ली दुबारा फ़तेह कर ली थी तब सारे हिंदू और मुसलमान शहर से बाहर निकाल दिए गए. कुछ समय बाद हिंदुओं को शहर आकर बसने की इजाजत दे दी गयी. अंग्रेज मुसलमानों को ग़दर के लिए ज़्यादा ज़िम्मेदार मानते थे इसलिए डेढ़ साल तक उन्हें दिल्ली में दुबारा बसने नहीं दिया गया.

30 मई, 1871 को लॉर्ड मेयो ने एक प्रश्न पूछकर हिंदुस्तान की तकदीर ही बदल दी, ‘क्या इस्लाम मुसलमान को रानी विक्टोरिया की खिलाफत के लिए उकसाता है?’ इसका जवाब ढूंढने के लिए विलियम विल्सन हंटर ने एक रिपोर्ट पेश की, ‘दि इंडियन मुसलमान’. इससे लॉर्ड मेयो को जवाब मिला कि नहीं, यह किसी को नहीं पता, पर यही रिपोर्ट आगे जाकर हिंदुस्तान के बंटवारे का सबसे बड़ा आधार बनी.