बॉम्बे में सज्जाद ज़हीर का सीकरी भवन उस रोज़ खचाखच भरा हुआ था. शाम के चार बज रहे थे, मेहदी और मुंशी (कैफी साहब के दोस्त) भेंडी बाज़ार से एक काजी पकड़ लाए. मेहमानों के नाम पर ‘प्रोग्रेसिव राइटर्स’ की पूरी की पूरी जमात - कृशन चंदर, जोश मलीहाबादी, मज़ाज, महेंद्रनाथ, पतरस बुखारी, साहिर, सरदार ज़ाफरी, इस्मत चुगतई और ऐसे ही कितने और लोग वहां मौजूद थे! उस दिन कैफ़ी और शौक़त निकाह करने जा रहे थे.

रस्म के मुताबिक़ क़ाज़ी ने जब कैफ़ी का मज़हब पूछा तो सब सन्नाटे में आ गए! कैफ़ी साहब शिया थे और शौक़त आपा सुन्नी. अब इस बात पर दो क़ाज़ी होने चाहिए थे. तभी सज्जाद बोले, ‘मज़हब हनाफ़ी है’. ‘हनाफ़ी’ सुन्नी ही होते हैं. यह झूठ इसलिए बोला गया था कि तब एक और क़ाज़ी लाने के लिए 100 रुपये कहां से आते!

बहुत अजब आदमी थे, कैफी साहब! जो कहना, साफ़-साफ़ कहना. न डरना, न झुकना. कम्युनिस्ट होना तो खून में नहीं था पर जाने कैसे इतने पक्के कॉमरेड बने रहे. ख़ुद के बारे में कहने से गुरेज़ करने वाले कैफ़ी आज़मी की जब उनके चाहने वालों ने हुज्जत की, तब ‘मैं और मेरी शायरी’ में उन्होंने अपना अफ़साना बयां किया. इसमें वे एक जगह लिखते हैं, ‘जब मेरे बड़े भाई जन्मे तो वालिद, सैय्यद फ़तेह हुसैन रिज़वी ने अम्मी से कहा कि हिंदुस्तान में ज़मींदारी का कोई भविष्य नहीं है. इसलिए लखनऊ जाकर नौकरी कर लेता हूं और जब सब ठीक-ठाक हो जाएगा तो बच्चों की तालीम के लिए तुम सबको बुला लूंगा...’

‘...पिताजी के इस निर्णय से घर में कोहराम मच गया कि सारे ज़मींदारों में अपनी नाक कटवा लेंगे. अब्बा ही घर में पढ़े लिखे थे. किसी की न सुनी और अवध की सुप्रसिद्ध एस्टेट बिलहरी में तहसीलदारी मिल गयी.’ कहां तो ज़मींदारी के ठाठ और कहां ये सरकारी नौकरी? कैफ़ी ने बचपन में रईसी भी देखी थी और साथ में गरीबी भी. अपने चारों तरफ दुखों की भीड़ ने उन्हें धीरे-धीरे ग़म-पसंद बना दिया.

सारे भाई-बहन अंग्रेजी स्कूल में पढ़े और कैफी मदरसे में

कैफी आजमी के वालिद अक्सर कहा करते थे कि जब वो मरेंगे तो कोई भी उनका फातिहा नहीं पढ़ेगा, चुनांचे उनका दाखिला एक मदरसे में करा दिया गया ताकि उन्हें दीनी इल्म मिल सके. इस पर अफ़सानानिगार आयशा सिद्दीकी ने अपने लेख में लिखा है- ‘कैफ़ी साहब को उनके बुज़ुर्ग ने एक दीनी शिक्षागृह में इसलिए दाख़िल किया था कि वे वहां फ़ातिहा पढना सीख जाएं. कैफ़ी साहब यहां से मज़हब पर फ़ातिहा पढ़कर निकल आए.’

ग्यारह की उमर में पहली ग़ज़ल लिखी, जिसे बेगम अख्तर ने अपनी आवाज़ दी

कैफ़ी अपने भाइयों और घर में बाकी के लोगों से मुत्तासिर होकर शेर कहने लग गए. कुछ एक मुशायरों में भी शिरकत कर ली. जब यह बात घर पर मालूम हुई तो भाइयों को यकीन न हुआ. लिहाज़ा, उनका टेस्ट लिया गया. उन्हें ‘इतना हंसों की आंखों से आंसू निकल पड़े’ मिसरे पर ग़ज़ल कहने का फ़रमान सुनाया गया. उन्होंने तपाक से पढ़ दिया :

इतना तो जिंदगी में किसी की खलल पड़े,

हंसने से हो सुकूं, ना रोने से कल पड़े,

जिस तरह से हंस रहा हूं मैं, पी पी के अश्केगम,

यूं दूसरा हंसे तो, कलेजा निकल पड़े,

अब बाकी तो ऊपर दिए उन्वान से आप समझ ही गए हैं कि इसे आवाज़ देकर किसने दुनिया में मशहूर कर दिया था. यहीं आप पूरी गजल भी सुन सकते हैं.

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कैफ़ी का अदबी सफ़र

मशहूर शायर शीन काफ निज़ाम ने कैफ़ी पर कहा है- ‘गौर से देखें तो कैफ़ी, मैक्सिम गोर्की (रूस के महान समाजवादी लेखक और ‘मां’ उपन्यास के रचयिता) के ही रास्ते पर चलते दिखाई देते हैं. गोर्की ने बहुत कम उम्र से ही सरमायेदारों व ज़मींदारों के आतंक को खुद महसूस किया था और दुखों को झेला. इसी कशमकश में वह एक ऐसे इंकलाबी दौर की तरफ बढ़ता गया, जिसमें इंसान ग़ुलामी व शोषण से मुक्ति पा सके. बस इतना ही फ़र्क हैं गोर्की और कैफ़ी में. गोर्की के इतर कैफ़ी जिस माहौल से आते हैं, वह उन्हीं सरमायेदारों की दुनिया है जिनके अत्याचारों से गोर्की का ताउम्र सामना होता रहा. यहां विद्रोह कैफ़ी की मजबूरी नहीं है. वह तो इरादतन अपने आसपास के लोगों की तकलीफ़ों को अपने दर्द में शामिल कर लेते हैं और उन्हीं की लड़ाई लड़ते-लड़ते उनका हिस्सा बन जाते हैं.’

कैफ़ी के मिज़ाज में रूमानियत थी. लेकिन वो होशमंद रूमानियत थी जो दुनिया में पसरे हुए ग़मों को देखकर मुंह नहीं फेर लेती. फैज़ अहमद फैज़ की तरह ही समाज की इस पीव को बाहर निकालने का काम उन्होंने अपनी शायरी के ज़रिए किया है -

ये सेहत बक्श तड़का, ये सहर की जलवा-सामानी (चमक)
उफ़ुक (क्षितिज) सारा बना जाता है दामने चमन जैसे
छलकती रौशनी तारीकियों (अंधेरे)पर छाई जाती है
उड़ाये नाज़ियात की लाश पे कोई कफ़न जैसे
उबलती सुर्ख़ियों की ज़द पे हैं हलके सिहायी के
पड़ी हो आग में बिखरी ग़ुलामी की रसन जैसे

कई बार लगता है कि अगर आपको इंसान के दिल की तहें और गिरहें खोलनी हैं तो आप एक बार कैफ़ी को पढ़ लीजिये चाबी मिल जाएगी. वो फ़लसफ़ा मिल जाएगा जो उन मज़लूमों और गरीबों की ज़िन्दगी को समझा दे. ‘आवारा सिज़्दे’, ‘दूसरा वनवास’, ‘आखिरे शब’, ‘सरमाया’, ‘कैफ़ियात’, या ‘नए गुलिस्तां’ , उनके सारे ही काम इस बात की गवाही देते हैं.

फिल्मों के लिए लिखा तो दिल-सोज़ी से लिखा. ‘या दिल की सुनो दुनिया वालो...’ या फिर ‘वक़्त ने किया क्या हंसीं सितम, तुम रहे न तुम, हम रहे न हम’ जाने ऐसे कितनी ही गीतों में वो अपनी चेतना और समाज के संघर्ष को मिलाकर रख देते हैं.

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कुछ यादगार अनसुने क़िस्से

जयपुर के विनोद भारद्वाज वरिष्ठ पत्रकार और बड़े ही कमाल के चित्रकार भी हैं. वे पिछले कई सालों से कैफ़ी साहब की शायरी और ज़िन्दगी पर शोध कर रहे हैं. ये दो किस्से उनके हवाले से ही हैं.

पहला क़िस्सा :

एक रोज़ किसी शादी की महफ़िल में शरीक होने के लिए कैफ़ी साहब ने बढ़िया चमचमाते हुए नए जूते पहने. सारे कॉमरेड राइटर्स पूछ-पूछकर हैरान हो गए कि आख़िर जो इंसान हर मौकों पर सादा-पसंद रहता है, आज नए जूते कहां से ले आया. कई बार पूछने पर उन्होंने बताया, ‘जो जूते मैंने पहन रखे हैं दरअसल ये उस कारखाने के जूते हैं जहां पर इन्हें हाथ से बनाया जाता है. ये वहां काम करने वाले मोचियों का तोहफा है! वे मुझे अपना साथी समझते हैं.’

दूसरा किस्सा :

कैफ़ी को अंग्रेजी नहीं आती थी और न ही शौक़त बढ़िया अंग्रेजी बोलती थीं. शबाना (कैफी साहब की बेटी और मशहूर अदाकारा शबाना आजमी) को अंग्रेजी स्कूल में दाख़िला दिलाने के लिए उन्होंने किसी और को मां-बाप बनाकर भेज दिया. एक बार स्कूल में शबाना की टीचर ने कैफ़ी की अखबार में छपी फोटो क्लास के बच्चों को दिखाई तो शबाना के मुंह से फूट पड़ा, ‘मेरे अब्बा हैं ये’. क्लास टीचर हैरान थीं और जब वाक़या खुला तो सबके सामने उस दौर के एक महान रचनाकार की एक अजब हरकत भी सामने आ गई.