मार्च में आए विधानसभा चुनाव के नतीजों से कई नेताओं के सितारे बुलंदी पर पहुंच गए तो कइयों का भविष्य कुछ साल के लिए ही सही, गर्त में चला गया. नेताओं के अलावा एक और शख्स पर इन नतीजों के असर को लेकर चर्चा होती रही है. यह शख्स भले ही नेता न हो लेकिन राजनीति से उसका करीब का नाता है. नेताओं का चुनावी प्रबंधन संभालते-संभालते यह शख्स सेलिब्रिटी का रुतबा हासिल कर चुका है. बात प्रशांत किशोर की हो रही है जिन्होंने पहले 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भाजपा को शानदार ​जीत दिलाई और फिर 2015 के बिहार विधानसभा चुनावों में भाजपा विरोधी महागठबंधन के नेता नीतीश कुमार को जबरदस्त जीत दिलाकर अपना लोहा मनवा लिया. लेकिन हाल के विधानसभा चुनाव नतीजों के लिहाज से इनके लिए अच्छे साबित नहीं हुए. ऐसे में प्रशांत किशोर के करियर पर इसके असर को लेकर खूब अटकलें लगाई जा रही हैं.

बिहार की कामयाबी के बाद प्रशांत किशोर के बारे में कहा गया था कि उन्होंने दो धुर विरोधियों नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के साथ काम किया और दोनों को कामयाबी दिला दी. ऐसी पहचान के साथ प्रशांत किशोर जब कांग्रेस से जुड़े तो कइयों को बड़ी हैरानी हुई. पंजाब में कांग्रेस से उनका जुड़ना तो लोगों को समझ में आ गया. वहां कैप्टन अमरिंदर सिंह की अगुवाई वाली कांग्रेस को पहले से ही सत्ता का दावेदार माना जा रहा था. लेकिन उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का हाल बड़ा बुरा था. ऐसे में यहां भी कांग्रेस के साथ प्रशांत किशोर का जुड़ना लोगों के लिए पहेली-सा बन गया.

कोई भी रणनीतिकार किसी को शून्य से शिखर तक नहीं पहुंचा सकता. अगर नेतृत्व करने वाला उस पर भरोसा करे तो वह रणनीतिकार चुनाव अभियान में संभावित गलतियों को दूर कर अभियान को प्रभावी बना सकता है  

कइयों ने इन चुनावों के पहले ही कह दिया था कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस कुछ खास नहीं कर पाएगी. उन्होंने कहा कि यहां कांग्रेस के खेवनहार बनकर प्रशांत ने अपनी साख दांव पर लगा दी. कुछ लोग तो राज्य में कांग्रेस के बुरे प्रदर्शन का अंदाजा लगाकर प्रशांत के चुनावी रणनीतिकार के करियर को ही खत्म बताने लगे. नतीजे उम्मीद के अनुरूप ही आए. पंजाब में जहां कांग्रेस की सरकार बन गई, वहीं उत्तर प्रदेश में कांग्रेस चौथे नंबर पर रही.

तो क्या अब प्रशांत किशोर का करियर बतौर चुनावी रणनीतिकार ढलान पर पहुंच गया है? इस सवाल का जवाब सबसे पहले हालिया विधानसभा चुनावों के नतीजों के जरिए समझने की कोशिश करते हैं. यह बात सही है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस नाकामयाब रही. इस नाते कहा जा सकता है कि प्रशांत किशोर यहां नाकाम रहे. लेकिन पंजाब में तो कांग्रेस की सरकार बन ही गई. अगर उत्तर प्रदेश के बुरे नतीजों को प्रशांत किशोर की नाकामयाबी माना जा रहा है तो पंजाब के नतीजों को उनकी कामयाबी के रूप में देखना चाहिए.

ऐसे में अब प्रशांत किशोर की आगे की राह क्या होगी? उनके साथ लंबे समय तक काम कर चुके और अब भाजपा के लिए काम करने वाले एक सज्जन बताते हैं, ‘प्रशांत हार मानने वाले व्यक्ति नहीं हैं. कोई भी रणनीतिकार किसी को शून्य से शिखर तक नहीं पहुंचा सकता. अगर नेतृत्व करने वाला उस पर भरोसा करे तो वह रणनीतिकार चुनाव अभियान में संभावित गलतियों को दूर कर अभियान को प्रभावी बना सकता है. लेकिन महत्वपूर्ण बात यही है कि नेतृत्व का उस शख्स पर कितना भरोसा है और उसे अपने काम में कितनी छूट मिली.’

वे आगे कहते हैं, ‘मीडिया चाहे जो भी कहे लेकिन चुनावी रणनीतिकार और राजनीतिक प्रबंधक प्रशांत किशोर को उत्तर प्रदेश की हार का जिम्मेदार नहीं मानेंगे.’ इसकी वजह बताते हुए वे कहते हैं, ‘सबसे बड़ी वजह यही है कि प्रशांत किशोर को काम करने की जितनी छूट नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार ने दी, उतनी उन्हें न तो उत्तर प्रदेश में और न ही पंजाब में कांग्रेस ने दी.’ वे आगे कहते हैं, ‘उनकी सेवा लेने वालों के कम होने की संभावना मुझे नहीं लगती. हां इतना जरूर है कि भाजपा और उसके सहयोगियों में से कोई उनके पास नहीं जाएगा. पर इसकी वजह राजनीतिक है न कि प्रशांत किशोर.’

जिस तरह समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के साथ आने की खबरें पिछले कुछ दिनों से चल रही हैं, उनके आधार पर मैं कह सकता हूं कि उत्तर प्रदेश में प्रशांत की भूमिका अब शुरू होने वाली है

तो अब प्रशांत किशोर को अगली जिम्मेदारी कहां और किससे मिलने की उम्मीद है? इस पर ये सज्जन कहते हैं, ‘उत्तर प्रदेश में जिस तरह समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के साथ आने की खबरें पिछले कुछ दिनों से चल रही हैं, उनके आधार पर मैं कह सकता हूं कि उत्तर प्रदेश में प्रशांत की भूमिका अब शुरू होने वाली है. उनके पास बिहार में एक असंभव सरीखा गठबंधन तैयार कराने और उसे विजयी बनाने का अनुभव है. इस नाते सपा और बसपा के नेता उन पर भरोसा कर सकते हैं. लेकिन वे ऐसा करेंगे यह मैं पक्के तौर पर नहीं कह सकता!’

दरअसल बिहार ही वह पूंजी है जो प्रशांत किशोर को आगे भी प्रासंगिक बनाए रखेगी. आने वाले दिनों में भाजपा के खिलाफ जिस तरह का विपक्षी मोर्चा बनाने की कोशिशें इन दिनों हो रही है, उसमें कई ऐसे दल शामिल हैं जो एक-दूसरे को फूटी आंख भी नहीं सुहाते. ऐसे दलों को एक साथ लाना और साथ रखना बहुत बड़ी चुनौती है. चाहे वह उत्तर प्रदेश की सपा और बसपा हो या पश्चिम बंगाल के वाम दल और तृणमूल कांग्रेस. कुछ ऐसा ही हाल तमिलनाडु में डीएमके और एआईएडीएमके का है. ऐसे में यदि विपक्ष इन सभी दलों का महागठबंधन बनाने की दिशा में आगे बढ़ा तो प्रशांत किशोर की भूमिका काफी अहम साबित हो सकती है.

बिहार की सत्ताधारी पार्टी जनता दल यूनाइटेड के एक नेता कहते हैं, ‘बिहार में जदयू और राजद का समन्वय बहुत अच्छे से इसलिए भी बन पाया कि किसी गलतफहमी की स्थिति में एक गैर-राजनीतिक व्यक्ति दोनों पक्षों से बात कर रहा था. बिहार का यह अनुभव रहा कि ऐसे निष्पक्ष व्यक्ति के जरिए किसी गठबंधन की गलतफहमियां दूर करना आसान होता है.’ वे आगे कहते हैं कि ऐसे लोग किसी भी पक्ष के अहंकार का प्रतिनिधित्व नहीं करते बल्कि उनका अंतिम लक्ष्य गठबंधन की जीत होता है.

प्रशांत किशोर के भविष्य के लिए एक अच्छी बात यह भी है कि विपक्ष को एकजुट करने की मुहिम की एक प्रमुख धुरी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी हैं. प्रशांत पर नीतीश का भरोसा अभी भी बना हुआ है. ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर यदि कोई महागठबंधन बना तो बहुत संभव है कि नीतीश कुमार इसमें प्रशांत किशोर की ही सेवाएं लें. इससे महागठबंधन को जो लाभ होगा सो होगा ही, नीतीश को भी यह फायदा रहेगा कि उनका एक विश्वस्त इस विपक्षी महागठबंधन का पूरा चुनावी प्रबंधन संभाल रहा होगा. कुल मिलाकर ऐसी संभावनाएं प्रबल हैं कि आने वाले दिनों में भी प्रशांत किशोर चुनावी प्रबंधन करते हुए दिखें.