दिल्ली के मशहूर आईटीओ से दिल्ली गेट की ओर बढ़ते हुए यकायक सड़क के दोनों तरफ़ रोशनी की झालरों से रात का अंधेरा झिलमिलाता दिखाई दिया और मेरे और पूर्वा के मुंह से निकला - ‘अरे आज तो शबे बारात है.’ वैसे, सुबह के अख़बार में लेफ़्टिनेंट गवर्नर साहब की ओर से जारी इश्तहार से मालूम हो गया था कि आनेवाली रात शबे बारात है. लेकिन वह चेतावनी अधिक थी, यह कि हर साल इस मौक़े पर मनचले नौजवान ख़तरनाक तरीक़े से रात भर मोटरसाइकिलें दौड़ाते हैं जिस वजह से दुर्घटनाएं होती हैं, ऐसा वे न करें. मुसलमान समाज के बुज़ुर्गों से भी यह उम्मीद जताई गई थी कि वे अपने नौजवानों पर क़ाबू रखें.

इस विज्ञापन के अलावा चूंकि अख़बार में शबे बारात के बारे में और कुछ न था, तो मैं सोचने लगा कि इसके पाठकों को यह मुसलमान त्यौहार सिर्फ़ अपराध और दुर्घटना से जुड़ा हुआ ही याद रह जाएगा. मुझे इसका अनुमान है कि बिहार और उत्तर प्रदेश के हिंदी अख़बारों में शायद इस त्यौहार के विषय में कुछ बताया हो, लेकिन आम तौर पर व्यापक हिंदू समाज में इसे लेकर अनभिज्ञता ही है.

मुझ जैसे पुराने तरीक़े से बड़े हुए लोगों के लिए शबे बारात की याद रोशनी और हलवे से जुड़ी हुई है. आतिशबाजी और तरह-तरह की रोशनी! उसके साथ अलग अलग क़िस्म का हलवा. पूर्वा ने कहा कि जब उन्होंने मेरी छात्रा रिजवाना से हलवे का ज़िक्र किया तो उसने सिर्फ़ सूज़ी का हलवा अपने घर बनने की बात कही. सुनकर निराशा हुई पूर्वा ने दिल्ली की ओर के मुसलमानों की इस किफ़ायतशारी पर झल्लाहट दिखाई.

हमें तो बर्फ़ी की अलग-अलग शक्लों में तराशे हुए हलवे के टुकड़े याद हैं. लेकिन सूजी के हलवे को उनमें हम सबसे निचली पायदान पर ही रखते थे. बेसन, चने, दाल, अंडे के हलवे का हमें इंतज़ार रहता था. हरे चने का हलवा भी बनता था. सिवान से निकल कर पटना आने के बाद शबे बारात को वसी साहब के घर जाना ही था जहां मेहर आंटी के हाथ का हलवा खाने के बाद भी बेशर्मों की तरह हिस्सा लाना न भूलते थे. और मिठाइयां भी तकल्लुफ के लिए रखी जाती थीं लेकिन ज़र्दा और हलवा छोड़कर दुकानों से लाई गई मिठाई को कौन नज़र उठाकर देखता?

हिस्सा क़ुरबानी के बाद बक़रीद में भी अपनों के यहां भेजा जाता है. भारतवर्ष में अब यह अपनी जान को दांव पर लगाकर ही किया जा सकता है. दो साल से बक़रीद की छुट्टी से लौटने वालों के साथ कोई हिस्सा नहीं रहता. हलवे पर अभी गाज नहीं गिरी है, सो उसकी उम्मीद की जा सकती है.

बचपन में इसे लेकर ज़रूर हैरत थी कि इस रात लोग क़ब्रिस्तान क्यों जाते हैं. बाद में मालूम हुआ कि यह दरअसल अपने गुज़र गए पुरखों के लिए ही मनाया जाने वाला पर्व है. चांद के मुताबिक़ चलने वाले कैलेंडर के आठवें महीने - जिसे शाबान कहा जाता है - के पंद्रहवें रोज़ की पिछली रात को शबे बारात कहते हैं. लेकिन यह नाम भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और ईरान में ही प्रचलित है. अरब दुनिया इसे लायलतुन निस्फ़े बिन शाबान या लायलतुल बाराह के तौर पर जानती है. यह हिसाब-किताब की, मोक्ष की, क्षमा मांगने की रात है.

रात भर अल्लाह की, जिसे खुदा कहकर पुकारने का रिवाज़ अभी भी है, इबादत की जाती है. माना जाता है कि सूरज ढलने की वेला में अल्लाह सबसे नजदीक के आसमान पर उतरते हैं और ऐलान करते हैं – ‘क्या यहाँ कोई माफ़ी मांगने वाला नहीं जिसे मैं माफ कर सकूं? कोई ज़ख़्मी या दुखी नहीं जिसे मैं राहत दे सकूं?’ यह ऐलान वह फज्र (सुबह) तक करता रहता है.

शबे बारात एक साथ अपने पूर्वजों की याद का, आगे की ज़िंदगी के लिए मन्नत मांगने का पर्व है. इसमें रतजगा होना ही है. लेकिन इस रात की रोशनी क्या सिर्फ मुसलमानों के दिलों को शाद (प्रसन्न) करती है? क्या गैर मुस्लिम इस खुशी और उम्मीद में शिरकत नहीं कर सकते?

शबे बारात के मौके पर मुझे सिवान के शेख मोहल्ला, हाशिम साहब, फैज साहब जिन्हें अक्ल आने तक मैं फैच चाचा कहता था, और फिर अच्छे मियां, फारूक की याद आनी ही है. पटना की मेहर आंटी की भी.

शबे बारात हिंदुस्तानी त्यौहार है. यहां इसका नाम अरब मुल्कों से अलग है, यह कहकर यह तर्क नहीं दे रहा कि हमें इसमें शिरकत करनी चाहिए. यह जितना भारतीय है, उसके साथ और उससे ज़्यादा मुसलमानों का है, इससे इनकार करना बेईमानी है. इसकी मुसलमानीयत को कम करना गलत होगा.

शबे बारात के बारे में न जानने से हमारी भारतीयता में कुछ कमी आती है या नहीं, यह सवाल ज़रूर पूछा जाना चाहिए. एक औसत मुसलमान या ईसाई या सिख जितना हिंदू त्यौहारों के बारे जानता है, क्या एक औसत हिंदू उनके त्योहारों के बारे में भी लगभग उतना ही जानता है? या जानने की ज़रूरत महसूस भी करता है? भारत के एक बड़े हिस्से की - जिसमें मुसलमान, ईसाई, आदिवासी, पारसी, सिख हैं - संस्कृति से उसका परिचय कितना क्षीण है.

एक वक्त था कि हिंदी के लेखक-कवि मुहम्मद साहब को, हजरत अली को अपने चरित्र बना कर रचना लिख सकते थे. आज यह मुश्किल है. होली हो या दीवाली, कृष्ण जन्माष्टमी हो या रामनवमी, फेसबुक पर नजीर या इकबाल की ऐसे मौकों के लिए मौजू रचनाओं की बहार रहती है लेकिन क्या शबे बारात या ईद अथवा मुहर्रम जैसे अवसरों के लिए हिंदू लेखकों से ऐसी अपेक्षा की जा सकती है?

अक्सर हिंदू अपने सारे धार्मिक अवसरों को सांस्कृतिक कहकर उन्हें सारे भारतीयों को स्वीकार करने को कहते हैं लेकिन अन्य को सिर्फ धार्मिक मानकर खुद को उनसे अलग कर लेते हैं. कुछ साल हुए, मेरे घर आई मेरी मुसलमान मित्र सेहबा ने मेरे घर गणेश की प्रतिमा देखकर कहा कि तुम्हारे धार्मिक प्रतीक सारे सांस्कृतिक हैं लेकिन हमारे पास तो सिर्फ धर्म है जिसे तुम संस्कृति मानोगे नहीं.

शबे बारात की रौशन रात फिर यह बात कौंध गई.