पश्चिम बंगाल में हुए नगर निकाय चुनाव के नतीजे तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के लिए बड़ी राहत लेकर आए हैं. अपने कई नेताओं के खिलाफ घोटाले के आरोपों से जूझ रहीं ममता बनर्जी के नेतृत्व में पार्टी ने सात में से चार नगर निकायों पर अपना परचम लहराया है. पार्टी के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि रही उत्तरी बंगाल स्थित मिरिक सीट पर मिली जीत. पिछले तीन दशक में यह पहली बार है कि इस सीट पर पहली बार किसी गैर पहाड़ी पार्टी ने जीत हासिल की है. मिरिक पर पहले गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) का कब्जा था.
इन चुनावों में भाजपा जीजेएम के साथ उतरी थी. पार्टी ने दक्षिण बंगाल के तीन शहरी निकायों पुजाली (दक्षिण 24 परगना), रायगंज (उत्तरी दिनाजपुर) और दोमकल (मुर्शिदाबाद) में कुल 70 उम्मीदवार उतारे. लेकिन उसकी झोली में सिर्फ तीन ही वार्ड आए. उसका सहयोगी जीजेएम दार्जिलिंग, कुर्सियांग और कलिम्पोंग में बहुमत हासिल करने में सफल रहा है. दक्षिण बंगाल की तीनों सीटों पर पहले वाम मोर्चे और कांग्रेस का प्रभुत्व रहा था लेकिन अब ये तृणमूल की हो गई हैं.
नतीजे भाजपा की बढ़ती पकड़ का भी संकेत
जानकार मानते हैं कि इस जीत के बावजूद तृणमूल कांग्रेस को चिंतित होना चाहिए. उनके मुताबिक साफ दिख रहा है कि सिर्फ तीन वार्डों में जीत के बावजूद भाजपा का प्रदर्शन तृणमूल कांग्रेस के लिए आगे चलकर परेशानी का सबब बन सकता है. वाम दलों और कांग्रेस के उलट भाजपा धीरे-धीरे पश्चिम बंगाल में अपनी पकड़ मजबूत करती जा रही है. राज्य की राजनीति पर नजर रखने वालों की मानें तो मतदाताओं ने भाजपा को एक विकल्प के रूप में देखना शुरू कर दिया है.
नगर निकाय चुनावों के नतीजे इस बात की पुष्टि करते हैं. इनमें भाजपा कुल 14 सीटों पर दूसरे पायदान पर रही. इसके अलावा 66 सीटों पर उसने 20 से 30 हजार, 16 पर 30 से 40 हजार और छह सीटों पर 40 से 50 हजार के बीच वोट हासिल किए. राज्य में भाजपा का उभार कांग्रेस और वामपंथी मोर्चे के पतन की एक बड़ी वजह साबित हो रहा है. नतीजे बताते हैं कि करीब 65 सीटें ऐसी रहीं जहां भाजपा को मिले वोट दोनों पार्टियों की हार की वजह बने.
यही वजह है कि कई खबरों के उलट कोलकाता स्थित वरिष्ठ पत्रकार पलाश विश्वास नगर निकाय चुनाव के नतीजों को भाजपा के लिए झटका मानने से इनकार करते हैं. वे कहते हैं, ‘इन नतीजों से पुष्टि होती है कि राज्य में भाजपा सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ मुख्य प्रतिद्वंदी के रूप में मुकाबले के लिए तैयार हो रही है.’ विश्वास आगे बताते हैं, ‘अगले साल होने वाले पंचायत चुनाव तृणमूल और भाजपा के बीच ही होंगे, यह तय है. इन चुनावों के नतीजों से ही 2019 के लोकसभा चुनाव के लिहाज से राज्य में राजनीति की दशा-दिशा तय होगी.’
उधर, वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर और वरिष्ठ स्तंभकार कृपाशंकर चौबे इन चुनाव नतीजों को ज्यादा अहम नहीं मानते. हालांकि वे यह जरूर मानते हैं कि ये नतीजे राज्य में भाजपा के उभार का संकेत देते हैं. ममता बनर्जी भी राज्य में भाजपा के फैलते दायरे से चिंतित दिख रही हैं. हाल ही में उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा कि अब उनका मुकाबला वाम मोर्चे से नहीं बल्कि भाजपा से है.
चुनौती
हालांकि, पश्चिम बंगाल में धीरे-धीरे मजबूत हो रही भाजपा के लिए तृणमूल के मुकाबले सबसे बड़ी कमजोरी सांगठनिक आधार और कैडर का न होना बताया जाता है. जानकारों के मुताबिक इस चुनौती को देखते हुए ही अमित शाह ने पार्टी कार्यकर्ताओं को बूथ स्तर पर ध्यान देने और घर-घर जाकर पार्टी का जमीनी आधार बढ़ाने के लिए कहा है. उन्होंने पार्टी को अगले साल होने वाले पंचायती चुनाव के लिए पूरी तैयारी करने का निर्देश भी दिया है. स्थानीय मीडिया के मुताबिक पार्टी ने राज्य में विस्तार के लिए बूथ स्तर पर करीब 1500 कार्यकर्ताओं की टीम बनाई है. हालांकि कृपाशंकर चौबे के मुताबिक पार्टी के लिए बड़ी चिंता यह भी है कि उसके पास राज्य में ममता बनर्जी के कद का कोई नेता नहीं है.
पश्चिम बंगाल भाजपा के लिए कई वजहों से भी अहम है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2019 के लिए पार्टी का ध्यान पूरे देश में ऐसी करबी 150 सीटों पर हैं जहां पार्टी का आधार कमजोर रहा है. पश्चिम बंगाल में लोकसभा की कुल 42 सीटें हैं और इस लिहाज से वह पार्टी के लिए एक महत्वपूर्ण राज्य हो जाता है. जानकारों के मुताबिक पार्टी चाहती है कि 2019 में अगर अपने परंपरागत गढ़ों में उसे कोई नुकसान हो तो उसकी भरपाई पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से हो जाए. इसके अलावा यह राज्य जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जन्मभूमि भी है जिसके चलते भाजपा के लिए यहां अपना झंडा फहराने का एक विशेष प्रतीकात्मक महत्व है. ये सभी बातें मिलकर भाजपा के लिए इस राज्य की अहमियत और बढ़ा देती हैं.
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