पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम और उनके बेटे कार्ति चिदंबरम की मुश्किलें लगातार बढ़ती दिख रही हैं. खबर है कि सीबीआई और ईडी के बाद अब केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) उनके खिलाफ जांच नए सिरे से आगे बढ़ा सकता है. बताया जा रहा है कि इस संबंध में सीबीडीटी के अध्यक्ष सुशील चंद्रा ने प्रधानमंत्री कार्यालय के साथ एक बैठक भी की है.

पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम से जुड़े हालिया विवाद को समझने की शुरुआत उस एफआईआर से करते हैं जो उनके बेटे के खिलाफ सीबीआई ने बीते सोमवार दर्ज की है. सीबीआई अधिकारियों का कहना है कि ये एफआईआर तीन महीनों की प्रारंभिक जांच के बाद दर्ज की गई है. इसकी शुरुआत तब हुई थी शीना बोरा हत्याकांड की जांच के दौरान सीबीआई को इंद्राणी मुख़र्जी के घर से कुछ दस्तावेज मिले थे. इन दस्तावेजों में पी चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम के साथ हुए लेन-देन का जिक्र था.

एफआईआर के अनुसार इंद्राणी मुख़र्जी और पीटर मुख़र्जी - जो फिलहाल अपनी बेटी की हत्या के आरोप में जेल में हैं - ने साल 2006 में ‘आईएनएक्स मीडिया प्राइवेट लिमिटेड’ नाम से एक कंपनी रजिस्टर करवाई थी. मार्च 2007 में आईएनएक्स मीडिया ने विदेशी निवेश लेने और उस निवेश का 26 प्रतिशत ‘आईएनएक्स न्यूज़ प्राइवेट लिमिटेड’ को आवंटित करने के लिए ‘विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड’ (एफआईपीबी) में आवेदन किया. बोर्ड ने आईएनएक्स मीडिया को कुल 4.62 करोड़ के विदेशी निवेश लेने की अनुमति दे दी लेकिन 26 प्रतिशत के डाउनस्ट्रीम निवेश के लिए अलग से आवेदन करने को कहा.

आईएनएक्स मीडिया ने बोर्ड की इन दोनों ही शर्तों का उल्लंघन किया. कंपनी को सिर्फ 4.62 करोड़ रूपये का निवेश लेने की ही अनुमति थी जबकि उसने कुल 305 करोड़ रूपये का विदेशी निवेश ले लिया. साथ ही कंपनी ने 26 प्रतिशत का डाउनस्ट्रीम निवेश भी बिना अलग से कोई आवेदन किये पूरा कर लिया. इसके बाद जब आयकर विभाग ने इस गड़बड़ी के लिए एफआईपीबी से पूछताछ की तो बोर्ड ने आईएनएक्स मीडिया को नोटिस जारी कर उनसे जवाब तलब किया.

एफआईआर के अनुसार जब बोर्ड ने मुख़र्जी दंपत्ति को आईएनएक्स मीडिया द्वारा की गई गड़बड़ियों के लिए नोटिस भेजे, तब वे मदद के लिए कार्ति चिदंबरम के पास पहुंचे. सीबीआई का आरोप है कि कार्ति चिदंबरम ने अपने पिता पी चिदंबरम के जरिये, जो उस वक्त केंद्रीय वित्त मंत्री थे, आईएनएक्स मीडिया को इस परेशानी से निकालने में मदद की. उन्होंने आईएनएक्स मीडिया को दोबारा आवेदन करने की सलाह दी और उन्हीं के प्रभाव के चलते वित्त मंत्रालय ने आईएनएक्स मीडिया पर कार्रवाई करने के बजाय उसके आवेदन को स्वीकार कर लिया. एफआईआर में ये भी आरोप हैं आईएनएक्स मीडिया ने इस मुसीबत से निकालने के लिए कार्ति चिदंबरम को करीब साढ़े तीन करोड़ का भुगतान उनकी अलग-अलग कंपनियों के जरिये किया.

इन तमाम बातों के आधार पर यदि मान भी लिया जाए कि कार्ति चिदंबरम ने अपने पिता के वित्त मंत्री होने का फायदा उठाते हुए आईएनएक्स मीडिया को फायदा पहुंचाया, तो भी सीबीआई के लिए कोर्ट में यह साबित करना बेहद मुश्किल है. इसका पहला कारण तो एफआईआर देखकर ही समझा जा सकता है. इस एफआईआर में पीटर मुख़र्जी, इंद्राणी मुख़र्जी और कार्ति चिदंबरम को तो आरोपित बनाया गया है लेकिन पी चिदंबरम को नहीं. जबकि देखा जाए तो मुख्य आरोप उन्हीं पर है कि उन्होंने अपने बेटे के कहने पर एक मंत्री के तौर पर अपने पद का दुरूपयोग किया.

दूसरा, इस एफआईआर में एफआईपीबी के अधिकारियों को भी नामजद नहीं किया गया है. सिर्फ वित्त मंत्रालय के ‘अज्ञात अधिकारियों’ को ही इसमें आरोपति बनाया गया है. एफआईपीबी एक ऐसा बोर्ड होता जिसमें अलग-अलग मंत्रालयों के सचिव स्तर के कुल पांच अधिकारी होते हैं. इस बोर्ड के किसी भी फैसले को सभी का सामूहिक फैसला माना जाता है. ऐसे में सीबीआई ने क्यों सिर्फ वित्त मंत्रालय के ही ‘अज्ञात अधिकारियों’ को आरोपित बनाया? जब यह आसानी से जाना जा सकता है आईएनएक्स मीडिया के आवेदन को स्वीकार करते हुए बोर्ड के सदस्य कौन लोग थे, तो उन्हें नामजद आरोपित बनाने के बजाय एफआईआर में ‘अज्ञात’ क्यों लिखा गया? ये तमाम सवाल अंततः आरोपितों को ही फायदा पहुंचाते दिख रहे हैं.

इसके अलावा सीबीआई के लिए यह स्थापित करना भी बेहद मुश्किल होगा कि आईएनएक्स मीडिया ने कार्ति चिदंबरम की कंपनी को जो भुगतान किया है, वह उसी गड़बड़झाले को सुधारने के लिए किया गया है जो कंपनी ने विदेशी निवेश लेने के लिए किये थे. क्योंकि यह स्थापित करने के लिए सीबीआई के पास आईएनएक्स मीडिया के उस रिकॉर्ड के अलावा कुछ नहीं है जिसमें कार्ति मुख़र्जी की कंपनी को हुए दस लाख रूपये के भुगतान का कारण ‘एफआईपीबी से संबंधित प्रबंधन शुल्क’ लिखा गया है. यह तथ्य क्राति चिदंबरम के खिलाफ शक तो पैदा करता है लेकिन अपने-आप में इतना मजबूत सबूत नहीं है कि इसके आधार पर उन्हें दोषी माना जा सके.

चूंकि एफआईपीबी वित्त मंत्रालय के ही अधीन होता है इसलिए इसमें कोई संदेह नहीं कि कोई भी वित्त मंत्री इस बोर्ड के फैसलों को आसानी से प्रभावित कर सकता है. लेकिन कोर्ट में यह साबित करना बेहद मुश्किल है कि बोर्ड ने पी चिदंबरम के प्रभाव में आईएनएक्स मीडिया को फायदा पहुंचाया. क्योंकि कानूनन तो पी चिदंबरम ने बोर्ड की ही संस्तुति के बाद आईएनएक्स मीडिया के आवेदन पर हस्ताक्षर किये थे.

इन तमाम कारणों के चलते कहा जा सकता है कि सीबीआई अपने अधिकतर मामलों की ही तरह इस मामले में आरोपितों को दोषी साबित करने में नाकाम होती ही दिख रही है.