उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इन दिनों थोड़े परेशान हैं. उनकी सरकार को बने दो महीने होने वाले हैं लेकिन उन्हें अभी तक प्रदेश की सबसे बड़ी समस्या को सुलझाने में सफलता नहीं मिली है. अपनी सरकार के दो महीने होने के मौके पर योगी ने दिल्ली के कुछ बड़े पत्रकारों को लखनऊ बुलाने का फैसला किया था. वे इन्हें इंटरव्यू देने वाले थे. लेकिन फिलहाल पत्रकारों को लखनऊ न आने के लिए कह दिया गया है. इस बदले मिज़ाज की वजह है उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ दिनों में बदले हालात.

योगी आदित्यनाथ सरकार को पहले महीने मीडिया से खूब पब्लिसिटी मिली. लेकिन अब स्थिति तेजी से बदल रही है. इसकी सबसे बड़ी वजह है उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था. सुनी-सुनाई है कि योगी ने इंटरव्यू देने से फिलहाल इंकार इसलिए किया क्योंकि वे जानते हैं अब पत्रकारों के पास उनसे पूछने को ढेरों सवाल हो गए हैं. योगी सरकार के दो महीने के अंदर ही सहारनपुर में तीन बार दंगे जैसे हालात बने और हर बार इल्जाम भाजपा के नेताओं पर ही लगा. सहारनपुर को संभालने के लिए आदित्यनाथ ने पुलिस अफसर का तबादला नोएडा कर दिया, सहारनपुर के सांसद को लखनऊ बुलाकर समझाया. लेकिन नए पुलिस कप्तान का स्वागत भी आगजनी और पत्थरबाजी से हुआ. पहली बार दो समुदायों के बीच भिड़ंत हुई थी, उसके बाद दो जातियों के बीच टकराव हुआ.

सिर्फ सहारनपुर जिला ही ऐसा नहीं है जिसने योगी आदित्यनाथ की परेशानी बढ़ा रखी है. गोरखपुर उनका अपना जिला है. वहां भाजपा के विधायक नई आईपीएस अफसर को धमकाते दिखे और आईपीएस ने भी विधायक साहब की पोल मीडिया में खोल दी. अलीगढ़ में भैंस काटने को लेकर तनाव हो गया. जैसे ही एक घर में भैंस कटने की खबर फैली लोगों ने कानून हाथ में ले लिया. पुलिस के सामने भैंस काटने वालों की जमकर पिटाई हुई फिर उन्हें पुलिस ने हिरासत में भी ले लिया. लेकिन बात यहीं तक नहीं रुकी. इसके बाद भाजपा के स्थानीय नेताओं के दवाब में उन्हें थाने से निकालकर फिर पीटा गया.

संभल में भी हिंदू-मुसलमानों के बीच झगड़े की खबर ने लखनऊ में नेताओं और अफसरों की नींद उड़ा दी. एक लव स्टोरी ने यहां लव जेहाद का रूप ले लिया. एक शादीशुदा हिंदू महिला के मुस्लिम लड़के के साथ चले जाने की खबर फैली तो अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के घर जला दिये गये. यहां भी पुलिस सिर्फ देखती ही रही. जिन लोगों पर मुकदमा दर्ज हुआ है उसमें से कुछ भाजपा के समर्थक ही बताए जाते हैं. अब संभल के इस इलाके में मुसलमान घर छोड़ रहे हैं और पुलिस उन्हें गांव में रहने के लिए ही मना रही है.

लखनऊ में पुलिस मुख्यालय में खबर गर्म है कि मुख्यमंत्री किसी को भी ना बख्शने के आदेश दे रहे हैं, लेकिन सिर्फ कहने से कुछ हो नहीं रहा. योगी आदित्यनाथ भाजपा की प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक में भी अपने कार्यकर्ताओं को समझा चुके हैं कि वे कानून अपने हाथ में ना लें. लेकिन ऐसा ज़मीन पर नहीं हो रहा है. सुनी सुनाई है कि शुरू में योगी आदित्यनाथ अफसरों के ज्यादा तबादले के पक्ष में नहीं थे. लेकिन अब वे वही फॉर्मूला अपना रहे हैं जो ज्यादातर राजनेता वारदात होने के बाद अपनाने के लिए जाने जाते हैं. योगी सरकार ने 13 मई को 39 आईपीएस अफसरों का तबादला कर दिया और 17 मई तो 67 अफसरों का.

उत्तर प्रदेश में जितने जिले संवेदनशील माने जाते हैं वहां अब आईजी नहीं एडीजी खुद निगरानी करेंगे. लखनऊ, बरेली, आगरा, मेरठ और वाराणसी जिले में अब एडीजी रैंक के अफसर को जिम्मेदारी दी गई है. लेकिन जानकारों का मानना है कि योगी आदित्यनाथ को सबसे पहले कुछ ऐसे उदाहरण पेश करने होंगे जिससे अफसरों और उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं को सचमुच में यह लगे कि वे अब कानून हाथ में लेने वाले किसी भी व्यक्ति को नहीं छोड़ने वाले हैं.

अखिलेश अपनी सरकार में ऐसा पांच साल नहीं कर पाए, इसलिए वे आज विपक्ष में बैठे हैं. योगी आदित्यनाथ के पास पांच साल का नहीं अगले लोकसभा चुनाव से पहले सिर्फ दो साल का समय है. अगर उन्होंने कुछ ऐसा किया जो मायावती, मुलायम और अखिलेश के वक्त नहीं हुआ तब ही वे इंटरव्यू देने के लिए फिर से पत्रकारों को बुला सकते हैं. नहीं तो पहले के उदाहरण हमारे सामने हैं ही.