गुरुवार को नीदरलैंड स्थित इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (आईसीजे) ने कुलभूषण जाधव मामले में अपना फैसला सुना दिया और यह भारत के हक़ में आया. कोर्ट ने जाधव की फांसी की सजा पर फिलहाल रोक लगा दी. उसने पाकिस्तान सरकार से कहा कि जब तक वह इस मामले में अंतिम फैसला नहीं सुनाता तब तक जाधव की फांसी की सजा पर अमल नहीं होना चाहिए.

इस मामले की सुनवाई को देखने के बाद दुनिया भर के और खासकर पाकिस्तान के अधिकाँश जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान आईसीजे में पूरी तैयारी के साथ नहीं गया था जिस वजह से उसकी दलीलें भारत की दलीलों के सामने कमजोर पड़ गईं. भले ही अधिकांश लोगों का ऐसा मानना हो लेकिन, कानून के कुछ अन्य जानकार ऐसा नहीं मानते इनके मुताबिक पाकिस्तान आईसीजे में पूरी तैयारी के साथ ही गया था लेकिन, वहां भारत के एक अलग ही रुख के कारण उसकी यह तैयारी धरी की धरी रह गई.

दरअसल, आईसीजे में पाकिस्तान यह सोचकर गया था कि भारत वहां वही बातें कहेगा जो अब तक वह इस मामले में कहता आया है. वह यह मानकर चलता रहा कि भारत आईसीजे में कहेगा कि कुलभूषण जाधव खुफिया एजेंसी रॉ के लिए काम नहीं करते. वे 2002 में भारतीय नौसेना छोड़ चुके हैं और लंबे अरसे से ईरान में व्यवसाय कर रहे थे. जानकारों की मानें तो पाकिस्तान को लगा कि इसे साबित करने के लिए भारत इस्लामाबाद में ईरान के राजदूत मेहदी होनारदोस्त के उस बयान को आधार बना सकता है जिसमें उन्होंने जाधव को जासूस बताने वाले पाकिस्तान के दावों को पूरी तरह से मनगढ़ंत बताया था.

पाकिस्तान यह भी मान रहा था कि भारत बीते दिसंबर में नवाज शरीफ के विदेश मामलों के सलाहकार सरताज अजीज के पाक संसद में दिए उस बयान को मुख्य आधार बनाएगा जिसमें उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान के पास जाधव को सजा देने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं. अजीज का कहना था कि जाधव के बारे में एजेंसियों द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों में केवल उनके बयान ही हैं जिनसे किसी निर्णय पर नहीं पहुंचा जा सकता.

जानकारों की मानें तो पाकिस्तान को लगा कि भारतीय वकील अंतरराष्ट्रीय पंचाट में जाधव को एक आम भारतीय नागरिक और व्यवसाई साबित करके उसे छुडवाने की कोशिश करेंगे. लेकिन, अदालत में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. भारत का रुख पाकिस्तान की सोच से एकदम अलग निकला. भारत की ओर से दी गई दलीलों का मुख्य उद्देश्य जाधव को छुडवाना था ही नहीं.

जानकार कहते हैं कि भारत के वकीलों ने इस मामले पर काफी सूझबूझ से काम लिया. वे यह जान गए थे कि इतनी जल्दी वे ऐसे पुख्ता सबूत अदालत के सामने पेश नहीं कर पाएंगे जिनसे जाधव को छुडवाया जा सके. उनके पास पाकिस्तान द्वारा जाधव के दूसरे नाम के साथ दिखाए गए पासपोर्ट को गलत बताने के लिए भी फिलहाल कोई आधार नहीं था.

जानकारों की मानें तो भारतीय वकील अच्छे से जानते थे कि अगर वे केवल जाधव को छुडवाने का लक्ष्य रखेंगे तो औंधे मुंह गिरेंगे. इसीलिए उन्होंने केवल जाधव को पाकिस्तान में कानूनी मदद दिलवाने और उसकी फांसी पर फिलहाल के लिए रोक लगवाना ही अपना मकसद रखा. इन लोगों के मुताबिक इस सब के अलावा भारतीय वकील यह भी जानते थे कि इस मकसद में कामयाब होने पर ही वे आगे भी इस मामले में कुछ कर सकते हैं. क्योंकि, ऐसा होने पर वे कम से कम जाधव तक पहुंचने में तो कामयाब हो ही जाएंगे जिससे इस मामले की कुछ न कुछ सच्चाई पता लगेगी. जानकारों के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय पंचाट में इस मकसद के साथ पहुंचे भारतीय वकीलों का कामयाब होना काफी हद तक तय था क्योंकि इसके लिए उनके पास वियना संधि जैसे कई मजबूत आधार थे.

कानून के जानकारों की मानें तो भारत के इस अलग रुख ने पाकिस्तान को अपनी दलीलें रखने से पहले ही चित कर दिया था. वह जिन दलीलों के साथ कोर्ट पहुंचा था वे भले ही मजबूत थीं लेकिन, भारत के इस रुख का जवाब देने में सक्षम नहीं थीं. इस मामले को करीब से देखने वाले कुछ पत्रकार कहते हैं कि पाकिस्तान ने पंचाट में जो दलीलें रखीं उनसे यह साफ़ पता चलता है कि वे उसने भारत की दलीलें सुनने के बाद जल्दबाजी में तैयार की थीं.

लंदन में रह रहे पाकिस्तान के मशहूर वकील राशीद असलम भी एक समाचार पत्र से बातचीत में कहते हैं कि भारत ने जो कोर्ट में रुख अपनाया पाकिस्तान उसके लिए तैयार होकर नहीं गया था. इसीलिए वह वियना संधि के अनुच्छेद 5 ब को भी पुरजोर तरीके से नहीं उठा पाया, जिसमें साफ़ लिखा है कि यदि कोई विदेशी नागरिक देश की सीमा में पकड़ा जाता है तो मामला मानवाधिकार कानून के अधीन आएगा लेकिन, अगर वह नागरिक कोई जासूस है, तो पंचाट उस पर सुनवाई नहीं कर सकता.