निर्देशक : मोहित सूरी

लेखक : चेतन भगत (मूल कथा), तुषार हीरानंदानी (स्क्रीनप्ले), इशिता मोइत्रा उधवानी (संवाद)

कलाकार : अर्जुन कपूर, श्रद्धा कपूर, सीमा बिस्वास, विक्रांत मासे

रेटिंग : 2/5

आज दो फिल्में रिलीज हुई हैं – ‘हिंदी मीडियम’ और ‘हाफ गर्लफ्रेंड.’ यह संयोग ही है कि ‘हाफ गर्लफ्रेंड’ के नायक की सबसे बड़ी समस्या (और खूबी भी) उसका हिंदी मीडियम होना है. ‘हिंदी मीडियम’ अंग्रेजी न जानने वालों की समस्या को किस हद तक बता पाती है इसके लिए आप इसी कॉलम में छपी दूसरी समीक्षा पढ़ सकते हैं.

‘हाफ गर्लफ्रेंड’ साल 2014 में इसी शीर्षक से आई चेतन भगत की किताब पर आधारित है. मजेदार बात है कि यह किताब भी अंग्रेजी में लिखी गई थी लेकिन हिंदीभाषी पाठकों में भी खूब खरीदी और पढ़ी गई. चेतन भगत आसानी से समझ आने वाली अंग्रेजी में लिखते हैं. मध्य वर्ग और छोटे शहरों का एक बड़ा तबका अंग्रेजी पढ़ने की शुरुआत ही चेतन भगत की किताबों से करता है क्योंकि उन्हें भगत की भाषा आसानी से समझ आती है. यही वजह है कि सीमित कल्पना क्षमता और अपने दोहराव के बावजूद वे लोकप्रियता के मामले में कथित बुद्धिजीवी लेखकों से कहीं आगे हैं. चेतन भगत को पढ़ने के अपने फायदे-नुकसान हैं पर इसकी चर्चा किसी और मौके पर की जाएगी.

फिल्म की बात करें तो किताब की कहानी हू-ब-हू फिल्म में दोहराई गई है. बिहारी बालक माधव झा दिल्ली के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में पढ़ने आता है. यहां पर सांस लेने में भी अंग्रेजी की अनिवार्यता देख किसी भी कमजोर हिंदी भाषी की तरह वह हिम्मत छोड़ देता है और वापस गांव जाने की सोचता है. इस विचार पर अमल कर पाए इसके पहले ही वह कॉलेज की सबसे खूबसूरत और अमीर लड़की रिया सोमानी से टकरा जाता है. दोनों के बीच प्यार होता है और माधव को शहर में रुकने की वजह मिल जाती है. रिया इस प्यार से बचने की कोशिश करती है. इस कोशिश में कई बार नायक को छोड़कर जाती है. इसके बाद पूरी फिल्म में नायक माधव अपने से भागते प्यार के पीछे खुद भी भागता रहता है.

फिल्म एक तरफ एलीट कहे जाने वाले तबके का उधड़ा हुआ हिस्सा दिखाती है और दूसरी तरफ बिहार जैसे पिछड़े राज्य में जिंदगियां बनाने के लिए चल रही सुकून देने वाली कोशिशों को भी. खुद माधव झा भी प्यार से फुर्सत मिलते ही गांव में बच्चों की पढ़ाई का इंतजाम करने की कोशिश में लगा नजर आता है. चेतन भगत के उपन्यासों में अक्सर पिता का किरदार क्रूर होता है और घरेलू हिंसा करता दिखाई देता है. इस फिल्म में भी ऐसा है. नायक और उसके दोस्त भी पुरुषवादी मानसिकता से जकड़े हुए हैं. फिल्म यह सबकुछ ऊपर-ऊपर से दिखाकर आगे बढ़ जाती है. फिल्म में यह स्टीरियोटाइप भी है कि धनी लोग कभी सुखी नहीं होते.

प्रेम कहानी में रूमानियत बढ़ाने के चक्कर में कुछ जरूरी बातें छूट गई हैं तो कहीं पर कहानी में कुछ ऐसी बातें शामिल हो गई हैं जो तर्क की कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं. किताब लिखते हुए न चेतन भगत इतने सचेत थे और न ही फिल्म का स्क्रीनप्ले लिखने वाले तुषार हीरानंदानी ने लापरवाही में कोई कमी की है. कहानी के ज्यादातर पात्र और संवाद ऐसे हैं कि उनसे आप कनेक्ट नहीं हो पाते. जैसे नायक-नायिका बहुत से प्रेमियों की तरह इंडिया गेट पर मिलते हैं. वहां वे पार्क में बैठने के बजाय चुपके से उसके भीतर घुस कर ऊपर की मंजिल पर पहुंच जाते हैं. जबकि यह हकीकत दिल्ली घूम चुका हर व्यक्ति जानता है कि इंडिया गेट पर चौकस सुरक्षा होती है, वहां ऐसा कर पाना तकरीबन नामुमकिन है. एक बार तो शायद दर्शक हजम भी कर लेते, लेकिन बार-बार ऐसा दिखाना बेतुकी कल्पना लगती है.

प्यार में पड़े हीरो-हीरोइन भी हमेशा की तरह एक-दूसरे से एकदम उलट हैं. फिल्म उनके जरिए हिंदुस्तान के सामाजिक ताने-बाने के दो सिरों को मजेदार (कुछेक जगह) लेकिन वास्तविक तरीके से दिखाती है. माधव झा किसी खत्म हो चुके राजवंश का राजकुमार है और जब भी वो अपने गांव की गलियों से गुजरता है, लोग हाथ जोड़कर सिर झुकाकर नमस्कार करते नजर आते हैं. वहीं दिल्ली की हाई-फाई बाला रिया सोमानी के गुजरने पर आस-पास के लोग आंख और मुंह फाड़कर देखते नजर आते हैं. ये दृश्य कोई संदेश नहीं देते बस इस प्रेम कहानी में नामभर का वजन बढ़ा देते हैं.

भाषा की समस्या से जूझता नायक सालों अंग्रेजी कॉलेज में पढ़ने के बाद भी इतनी अंग्रेजी नहीं सीख पाता कि एकाध वाक्य सही से बोल सके. पूरी फिल्म के दौरान हेल्पिंग वर्ब्स माधव की जरा भी हेल्प करती नजर नहीं आतीं. अगर मजाक करने की थोड़ी छूट मिले तो हम कहेंगे कि ऐसे भोंदू आशिक को हाफ क्या छटांक भर गर्लफ्रेंड भी नहीं मिलनी चाहिए. खैर, स्क्रीन पर जो भी चल रहा होता हैं उसे देखकर आपको लगता है कि ऐसा हो रहा है क्योंकि बॉलीवुड फिल्म में ऐसा ही होना चाहिए. आखिर में ट्रेलर देखकर लगाया गया आपका वह अंदाजा सही साबित होता है कि कई फिल्मों से किताब बनी और किताब पर फिल्म बन गई है.

माधव झा की भूमिका में अर्जुन कपूर नाकाबिले बर्दाश्त हैं. यह शायद अब तक का उनका सबसे बुरा काम है. फिल्म में न तो वे देखने लायक हैं, न ही सुनने लायक. उनकी आलोचना करते हुए हमारा लहजा इतना कड़वा न हो पाता अगर वो स्क्रीन पर जरा भी आकर्षक नजर आते. बढ़ा हुआ वजन, उन्हें स्क्रीन पर जरूरत से ज्यादा चौड़ा दिखाता है. इस फिल्म को देखने के बाद उनकी फीमेल फैन फॉलोइंग में गिरावट आन तय लग रहा है. श्रद्धा कपूर फिल्म में अपर क्लास कन्या कम गर्ल नेक्स्ट डोर ज्यादा लगती हैं. वे इस फिल्म में भी वही सब करती हैं जो ‘एक विलेन’, ‘आशिकी’ या ‘बागी’ में करती दिखीं थीं. यानी कि हॉफ गर्लफ्रेंड होने का बेजान अभिनय करती हैं. उन्हें अब अभिनय के नाम पर रोने-मुस्कुराने से आगे बढ़ना चाहिए.

फिल्म में अच्छा और स्वाभाविक अभिनय सीमा बिस्वास और विक्रांत मासे ने किया है. विक्रांत मासे ने बालिका वधू, कुबूल है, धरम-वीर जैसे कई मशहूर टीवी सीरियलों में काम किया है. इसके अलावा वे ‘लुटेरा’ और ‘दिल धड़कने दो’ जैसी फिल्मों में भी चरित्र भूमिकाओं में नजर आ चुके हैं. उनकी स्क्रीन प्रजेंस अच्छी है और बिहारी लहजा भी उन्होंने नायक से कहीं बेहतर पकड़ा है.

मोहित सूरी पिछले चार सालों से लगातार प्रेम कहानियां बना रहे हैं. आशिकी -2, एक विलेन, हमारी अधूरी कहानी के बाद हाफ गर्लफ्रेंड उनकी चौथी प्रेम कहानी है. अब तक उनकी बनाई फिल्मों में से आधी हिट हुई हैं और आधी फ्लॉप. हाफ गर्लफ्रेंड के साथ भी आधे-आधे चांस हैं. यह फिल्म कुछ हद तक मनोरंजन तो करती है पर लॉजिक लगाते ही बचकानी लगने लगती है. सिनेमा हॉल से निकलते हुए एहसास होता है कि मसाला ठूंसकर भरा गया था पर ठुस्स हो गया है. कहा जा सकता है इस फिल्म में ज्यादातर चीजें आधी-आधी हैं - जैसे कहानी और अभिनय बुरा है लेकिन उसका ट्रीटमेंट और संगीत अच्छा है.

अगर आप लंबे समय से चेतन भगत की यह किताब पढ़ने की सोच रहे हों तो उससे अच्छा है फिल्म ही देख आइए, वक्त बचेगा.