निर्देशक : साकेत चौधरी

लेखक : जीनत लखानी, साकेत चौधरी, अमितोष नागपाल

कलाकार : इरफान खान, सबा कमर, दीपक डोबरियाल, तिलोत्तमा शोम, अमृता सिंह

रेटिंग : 3/5

‘हिंदी मीडियम’ में कई खामियां हैं. मेलोड्रामा की मार कहीं-कहीं ज्यादा है. स्टीरियोटाइप किरदारों और क्लीशों का सतत आना-जाना है. फिल्ममेकिंग की शैली उस पुराने जमाने की है जिसमें कट टू कट सीन आगे-पीछे लगाकर साधारण तरीके से कहानी को कहा जाता है. कई जरूरी सवालों का समाधान अति के सरलीकरण की भेंट चढ़ता है. एडिटिंग में दिखाया गया आलस्य फिल्म को लंबा बनाता है और फिल्म इंटरवल से पहले वाले हिस्से में कई बार देखने वालों के कंधों पर अपनी बोरियत का बोझ भी डालती है. साथ ही, कई दृश्य जो लिखते वक्त अच्छे लगते होंगे, निर्देशकीय कौशल की कमतरी की वजह से भोंथरे होकर फिल्म में बेअसर हो जाते हैं.

लेकिन कहानी की सच्चाई इन खामियों पर भारी पड़ती है. आपको आखिरी ऐसी कौन-सी फिल्म याद है जिसने शिक्षा का अधिकार अधिनियम के आसपास कथा बुनने की कोशिश की थी और अपने विषय को गरीबों की नजर से नहीं, अमीर नायक-नायिका की नजर से देखने की हिम्मत दिखाई थी? और ऐसा करते समय जिसने सामाजिक सच्चाइयों को उसी तरह उधेड़ा था जैसे कोई गंभीर विचारोत्तेजक सोशल ड्रामा फिल्म उधेड़ती है?

‘हिंदी मीडियम’, कॉमेडी की राह पकड़कर - और राजकुमार हिरानी के सिनेमा से गुण लेकर - हंसाने के अलावा आंखों को भी नम करती है. यह फिल्म समाज की ऊंच-नीच, अंग्रेजी के प्रति समाज की आसक्ति, दो भाषाओं के बीच की खाई और स्कूलों के बोझ तले दब रहे बच्चों व अभिभावकों को साथ लेकर एक ऐसा सोशल सटायर रचती है जो मनोरंजन करने के साथ-साथ एक पुरानी कहावत को नए तरीके से कहने का भी मौका देती है - ‘देखन में पिक्चर लगे, घाव करे गंभीर!’

‘हिंदी मीडियम’ की कहानी एक रईस पति-पत्नी द्वारा अपनी बित्ते भर की बेटी को शहर के सबसे अच्छे प्राइवेट इंग्लिश मीडियम स्कूल में दाखिला दिलवाने के लिए किये जाने वाले जोड़-तोड़ की कहानी है. अगर आप दिल्ली की गहमागहमी से वाकिफ हैं और अपने आसपास उन अभिभावकों को पीड़ित होते हुए देख चुके हैं जिनके बच्चे स्कूल के बंधन में बंधने की उम्र के हो चुके हैं, तो इस फिल्म से तुरंत जुड़ाव महसूस करेंगे. अमेरिका में होता होगा कि नए आईफोन के लॉन्च पर दुकानों के बाहर सुबह तीन बजे से लंबी-लंबी लाइनें लग जाती हैं, दिल्ली जैसे शहरों में तो ये कतारें नर्सरी के एडमीशन का फॉर्म लेने के लिए लगती हैं. बीएमडब्लू कार से चलने वाले इस फिल्म के हिंदी भाषी नायक-नायिका इन लाइनों में लगने और नकली ‘एलीट’ बनने के साथ-साथ आम इंसानों वाले सारे जतन करने के बाद थक-हारकर गरीब बन जाते हैं. क्योंकि प्राइवेट स्कूलों में गरीब बच्चों के लिए जो 25 फीसदी सीटें आरक्षित होती हैं, उनमें से एक पर इनकी नजर होती है.

कहानी जब अपने इस हिस्से पर आती है, तभी ‘हिंदी मीडियम’ एक अच्छी फिल्म बनती है. इससे पहले, यानी इंटरवल से पहले, पटकथा पात्रों को स्थापित करती है, हमें यह बताती है कि नायिका सबा कमर बचपन में हिंदी मीडियम में पढ़ने का गम आज तक सीने में छिपाए बैठी हैं और इसलिए अपनी बच्ची को अंग्रेजी की गोद में बैठाना चाहती हैं. इरफान उनकी वजह से कई जतन करते हैं और जितना वे करते हैं उसकी ज्यादातर झलकियां ट्रेलर में देख चुके होने की वजह से नएपन का रस कम मिलता है. कुछ बेहतरीन सीन जरूर इस दौरान आते हैं, जिसमें कभी इरफान आजकल टॉप टीआरपी पाने वाला सीरियल मनोयोग से देखते हैं तो कभी स्कूल में इंटरव्यू की तैयारी करते वक्त उम्दा तरीके से गलत इंग्लिश बोलते हैं!

उनके होने से ही फिल्म में मन रमा रहता है लेकिन इस हिस्से में नरेटिव स्वच्छंद तरीके से नहीं बहता और दृश्य आपस में जुड़े हुए कम मालूम होते हैं. भले ही पटकथा यहां भी दिलचस्प है, मगर छूटती ट्रेन से जैसे पीछे भागते मुसाफिर छूट जाते हैं, लगता है इस फिल्म से रोचकता छूटने वाली है.

तभी दो भरी हुई बाल्टियां उठाकर दीपक डोबरियाल एंट्री लेते हैं, और ‘हिंदी मीडियम’ इंटरवल के बाद उनकी और इरफान खान की जुगलबंदी से खिल उठती है. जो पटकथा में रोचक तरीके से लिखा गया होता है वह परदे पर सजीव व जीवंत हो जाता है और नायक-नायिका के अमीर से गरीब बनने वाले हिस्से में रोचकता, ट्रेन पकड़ लेती है. हो सकता है फिल्म का यह हिस्सा – जिसमें इरफान व सबा गरीबी से दो-चार होते हैं – कुछ दर्शकों को गरीबी का मखौल उड़ाना लगे. लेकिन अगर ऐसा हुआ तो इसका मतलब है कि आप फिल्मों में कॉमेडी के माध्यम से व्यंग्य करने वाली विधा को ठीक से समझे नहीं है. चाहे डेंगू से बचने के लिए मच्छर की आवाज निकालने वाला सीन हो या फिर ‘हम खानदानी गरीब हैं...तुमको सिखाएंगे कैसे गरीबों की तरह रहा जाता है’ वाला बेहतरीन सीक्वेंस, इस फिल्म में सामाजिक ऊंच-नीच पर कटाक्ष करतीं ऐसी कई बातें हैं जो अपनी मारकता से जेहन में घाव छोड़ जाती हैं.

पाकिस्तानी अभिनेत्री सबा कमर पाकिस्तानी धारावाहिकों में अभूतपूर्व काम कर चुकी हैं और गंभीर व उदास लड़कियों की तड़प को चेहरा देने वाले किरदारों में वे बला का खूबसूरत अभिनय करती रही हैं. शायद इसलिए हाइपर महिला किरदारों के लिए बने बॉलीवुड फिल्मों के खांचे में जब वे फिट होने की कोशिश करती हैं, तो उतनी पसंद नहीं आतीं. अंग्रेजी के लिए आसक्त रहने वाले किरदार को करते वक्त वे अभिनय खराब नहीं करतीं, स्तरीय ही करती हैं, लेकिन जो करतीं हैं उसे मुंबई की कई अदाकाराएं आसानी से कर सकती हैं. उन्हें बॉर्डर पार लाने की मेहनत करनी ही थी तो किसी ऐसे किरदार के लिए करनी थी, जिसे वे यादगार बनाकर वापस पाकिस्तान लौटतीं.

दीपक डोबरियाल का ‘हिंदी मीडियम’ में कम बड़ा रोल है. छोटा इसलिए नहीं कि वे अपने किसी रोल को छोटा रहने नहीं देते है. इरफान के गरीब पड़ोसी की भूमिका उनके सिवाय सिर्फ वे ही निभा सकते थे और जिन दृश्यों में इरफान खान टॉप फॉर्म में नजर आते हैं उनमें भी डोबरियाल उन्हें बराबरी की टक्कर देने वाला अभिनय करने का हुनर रखते हैं. चाहे इरफान को यह सिखाना हो कि भरी हुई बस में कैसे घुसना है या फिर इरफान के घर में घुसकर हास्य से लेकर बदले तक के भावों को आसानी से व्यक्त कर जाना, दीपक डोबरियाल ऐसे गजब कलाकार हैं, जिनकी कला को आदर न जाने क्यों कम मिलता है.

इरफान खान नए विषयों का अनादर कभी नहीं करते. वे नयी कहानियों के अभिनेता नहीं, देवता हैं. हीरोइज्म और सबसे लंबी भूमिकाओं के पीछे नहीं भागने वाले ऐसे स्थापित एक्टर, जो अनकन्वेंशनल कहानियों में अपने अभिनय से प्राण और फिल्म के प्रति यकीन फूंक देते हैं. ‘हिंदी मीडियम’ शुरुआती सीन से लेकर अंत तक उनकी पीठ पर बंधी रहती है और उन्हीं के सहारे तनी रहती है. पत्नी के लिए सबकुछ करने को तैयार मासूम बिजनेसमैन की भूमिका का निर्वाह वे ‘लाइफ इन अ मेट्रो’ में किए अभिनय वाले स्पेस में जाकर करते हैं और हास्य में डूबे संवादों को भावहीन चेहरे के साथ पुन: कमाल तरीके से अभिव्यक्त करते हैं.

सिनेमा की किताबें उठाकर देखिए, उनमें हर जगह मिलेगा कि थियेटर हो या फिल्म का सीन, दो लोग आपस में बात कर रहे हों तो सामने खड़े शख्स की आंखों में आंखें डालकर संवाद बोले जाने चाहिए. लेकिन इरफान खान उन अलहदा अभिनेताओं में से हैं, जो सामने वाले की तरफ कम देखते हैं और ज्यादातर वक्त किसी शून्य में टकटकी लगाकर संवाद बोलते हैं. फिर भी दर्शकों को खुशी अपरंपार मिलती है. और इसी तरह के दुर्लभ अंदाजे-बयां इरफान खान को निराला फनकार बनाते हैं. उन्हें सिनेमा की किताबों और पुराने तरीकों की जरूरत नहीं है, क्योंकि वे खुद अभिनय की नयी परिभाषा गढ़ने निकले हैं.

उनके लिए और नायाब विषय के लिए ‘हिंदी मीडियम’ देखिए. निराश नहीं होंगे.