26 मई को नरेंद्र मोदी सरकार ने तीन साल पूरे कर लिए. उम्मीदों-अपेक्षाओं के भारी बोझ को लेकर केंद्र में करीब तीन दशक बाद पूर्ण बहुमत से इस सरकार ने सत्ता संभाली थी. सो, ऐसे में हर बीतते साल के साथ इसके कामकाज़ी प्रदर्शन का आकलन लाज़िमी है. जानने की कोशिश करते हैं कि तीन प्रमुख मोर्चों पर सरकार का प्रदर्शन कैसा रहा है.
1. सरकार से 61 फीसदी लोग अगर संतुष्ट हैं तो असंतुष्टों की ज़मात भी बढ़ी है
पिछले दिनों एक चर्चित पत्रिका में छपे सर्वे के मुताबिक केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के काम से देश की 61 फीसदी आबादी संतुष्ट है. ऐसे में सरकार खुश हो सकती है क्योंकि जब देश में महज़ 30-40 फीसदी वोटों से ही किसी पार्टी को सरकार बनाने लायक बहुमत मिल जाता हो, तो इस नतीज़े के हिसाब से मोदी सरकार आज की स्थिति में खुद को दूसरे कार्यकाल का दावेदार मान ही सकती है.
लेकिन इसी सर्वे में दर्ज़ कुछ और जानकारियां सरकार की पेशानी पर बल डालने की क्षमता भी रखती हैं. जैसे इसमें यह भी बताया गया है कि सरकार के काम को अपेक्षा से बेहतर मानने वाले लोग इस साल एक फीसदी कम हो गए हैं. इसी तरह यह सोचने वाले लोग दो फीसदी कम हो गए हैं कि सरकार उनकी उम्मीद के हिसाब से ही काम कर रही है और उसके काम को अपेक्षा से कमतर मानने वाले ‘असंतुष्ट लोग’ तीन फीसदी बढ़ गए हैं.
2. अर्थव्यवस्था के आंकड़ों में कुछ उम्मीद, कुछ निराशा
अर्थव्यवस्था के लिहाज से मोटे तौर पर सरकार के लिए खुश होने के पर्याप्त कारण हो सकते हैं. जैसे- पहला तो यही कि साल 2013-14 में भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 6.9 फीसदी के करीब था. जबकि पिछले तीन साल से यह सात फीसदी के आसपास बना हुआ है. द इकनॉमिक टाइम्स ने भी पिछले दिनों एक सर्वे कराया था. इसमें बताया गया कि शेयर बाज़ार भी मोदी सरकार के काम से खुश है. बाज़ार में सक्रिय करीब 40 बड़े भागीदारों से बात की गई. सबने सरकार को 10 में अौसतन 7.5 नंबर दिए. एक दूसरे चर्चित कारोबारी अखबार बिज़नेस स्टैंडर्ड के अध्ययन का लब्बोलुआब भी यही था कि ज़्यादातर कंपनियों के सीईओ यानी मुख्य कार्यकारी अधिकारी आर्थिक सुधारों पर सरकार की गति से संतुष्ट हैं.
लेकिन अर्थव्यवस्था की तरक्की का एक संकेत रोजगार सृजन से भी मिलता है. इस मामले में देखा जाए तो बीते तीन साल के दौरान जितने रोज़गार मिले उससे ज़्यादा बेरोजगारों की फौज़ खड़ी हो रही है मोदी सरकार ने रोज़गार के बड़े-बड़े दावों के साथ देश की सत्ता संभाली थी. लेकिन जैसा कि द इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट बताती है, अक्टूबर- 2016 तक सरकार 15.1 लाख नए रोज़गार ही उपलब्ध करा सकी है. और यह आंकड़ा ख़ुद केंद्रीय श्रम मंत्रालय के रोज़गार सर्वेक्षणों और पीएमईजीपी (प्रधानमंत्री राेज़गार सृजन कार्यक्रम) में उपलब्ध तथ्यों से निकलकर सामने आया है. इसके ठीक उलट इन्हीं सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि जब 2014 में मोदी सरकार ने केंद्र की सत्ता संभाली थी तो बेरोज़गारी की दर (2013-14 में) 4.9 फीसद थी. लेकिन 2015-16 में यह पांच फीसदी हो गई. यूं तो यह बढ़त पिछले साल के मुक़ाबले आधा फीसद की ही है, लेकिन जब यह पता चलता है कि पांच फीसदी का यह आंकड़ा बीते पांच साल में सामने आया सबसे बड़ा आंकडा है तो इसकी गंभीरता का अंदाज़ा हो जाता है.
महिलाओं के हाथ मज़बूत करने की बात हर तरफ होती है. लेकिन उनके बेरोज़गार होने की दर भी बढ़ी है. वह भी पूरे एक फीसदी तक. साल 2013 में जहां आठ फीसदी महिलाएं बेरोज़गार हुआ करती थीं. वहीं अब यह तादाद नौ फीसदी हो चुकी है. यानी उनके हाथ मज़बूत नहीं हो रहे हैं, बल्कि अब भी वे आर्थिक रूप से आश्रित ही हैं.
3. महिला सुरक्षा और सामाजिक समरसता
किसी सरकार के प्रदर्शन की एक अहम कसौटी अपराध नियंत्रण और सामाजिक समरसता भी होती है. आंकड़े बताते हैं कि बीते तीन साल के दौरान देश में महिलाओं के ख़िलाफ अपराधों में कोई ख़ास कमी नहीं आई है. पिछले साल सितंबर के महीने में एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो) ने कुछ आंकड़े ज़ारी किए थे. इनके मुताबिक 2015 में पूरे देश में बलात्कार के 34,651 मामले दर्ज़ किए गए. इन हादसों की पीड़िताएं छह साल से कम उम्र की भी थीं और 60 साल से ऊपर की भी. 95.5 फीसदी मामलों में आरोपित परिचित ही थे.
इसी तरह बीती फरवरी में सरकार ने संसद में दिए एक लिख़ित उत्तर में ख़ुद माना कि उत्तर प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में सांप्रदायिक हिंसा बढ़ी है. दलित-आदिवासियों के ख़िलाफ भी अपराधों की संख्या में इज़ाफा हुआ है, ऐसा एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं.
आंकड़े और भी तमाम हैं, जिनको कसौटी मानते हुए अगर आकलन करें, तो यही कहा जा सकता है कि मोदी सरकार से असंतुष्ट होने वालों की तादाद अगर बढ़ रही है तो उसके कारण भी दिखते हैं.
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