मुंबई के बांद्रा में, बैंड स्टेंड पर, जहां एक छोर पर सलमान खान अपने फ्लैट में रहते हैं और दूसरे छोर पर शाहरुख खान बंगले मन्नत में, हो सकता है कि सड़क पर चलते वक्त आपसे पंकज कपूर टकरा जाएं. किसी कॉफी शॉप की तरफ जाते हुए या उससे बाहर आते हुए. अपने छोटे कद के साथ, हल्की सफेद दाढ़ी और जेब में चश्मा लटकाए हुए, चैक की ढीली-ढाली हाफ-शर्ट के नीचे दो चुन्नट वाली पैंट पहने हुए, और चमड़े वाली सैंडल में आराम से चलते हुए. जिस्म से किसी महंगे परफ्यूम की खुशबू बिखेरे बिना, ठीक मध्यमवर्गीय पिताओं की तरह साधारण वेश में.

और हो सकता है नहीं, पक्का होगा कि आप उन्हें पहली-दूसरी नजर में पहचान नहीं पाएंगे. जैसे सड़क पर खड़े तीन पीढ़ियों से जुड़े दर्जनों लोग उस वक्त नहीं पहचान रहे होंगे. उनके मन में भी - आपकी ही तरह - शाहरुख या सलमान के दर्शन करने की कामना होगी. पंकज कपूर को सामने देखकर भी वे एक महान अभिनेता के ‘दर्शन’ करने से चूक जाएंगे.

सादगी कई बार आपको दुनिया की नजरों में अदृश्य बना देती है. 65 वर्षीय पंकज कपूर से बेहतर शायद ही इसका कोई उदाहरण हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में मिलेगा. नसीर के अभिनय बराबर जिनके अभिनय की कदकाठी है, और नवाज जैसों के जो बाप हैं, उन पंकज कपूर को हमारे मुल्क के सर्वश्रेष्ठ अभिनेताओं में शामिल होने के बावजूद पूजा नहीं जाता. कई बार पूछा भी नहीं जाता और जहां नसीर और नवाज का अभिनय हर बार सेलिब्रेट किया जाता है, उनके दीवानों की फौज उनके सम्मान में कसीदे पढ़ती है, वहीं पंकज कपूर को लेकर किसी भी तरह का यूफोरिया जन्म नहीं लेता.

उनके अभिनय की तारीफ में पढ़े गए कसीदे जल्द ही मिट जाते हैं और फिर कोई ‘मकबूल’ या ‘धर्म’ या ‘द ब्लू अम्ब्रैला’ आती है, जो दर्शकों को बच्चन, नसीर, खान त्रयी, इरफान व नवाज से आगे की लीग का काम दिखाती है. ‘अद्भुत’ शब्द भी बौरा जाता है, कि ये कौन आदमी है जिसके नाम के आगे वैसे तो मुझे लोग सालों तक लगाते नहीं हैं, और जब कभी-कभार लगाते हैं, तो मैं लगते-लगते थक जाता हूं.

पंकज कपूर ने अपनी अभिनय यात्रा की शुरुआत 19 साल की उम्र में की थी. एनएसडी में दाखिला लेकर. पिताजी ने कहा कि अगर तुम्हें अभिनय में दिलचस्पी है तो उसकी पढ़ाई करके तैयार होकर मैदान में कूदो. पंकज कपूर ने दो फॉर्म भरे. पुणे जाकर एफटीआईआई के इंटरव्यू में पास हुए. लेकिन स्क्रीन टेस्ट में चेहरा न पसंद आने की वजह से रिजेक्ट कर दिए गए. दिल्ली ने उन्हें अभिनय के दिल में जगह दी और अगले तीन साल पंकज कपूर ने इब्राहिम अल्काजी जैसे अभिनय के सुप्रसिद्ध गुरुओं से एनएसडी में दीक्षा ली. 1976 में कोर्स खत्म कर चार-पांच साल वहीं रेप्रेटरी में अभिनय करने की नौकरी की और फिर जिस तरह उस समय के कई उभरते एक्टरों को रिचर्ड एटनबरो की ‘गांधी’ (1982) में काम मिला था, गांधी जी के दूसरे सेक्रेटरी प्यारेलाल की भूमिका के लिए पंकज कपूर का चयन हुआ. मगर उन्हें शोहरत इस फिल्म के हिंदी में डब हुए संस्करण में गांधी जी की आवाज बनकर मिली. हिंदुस्तानियों के लिए बेन किंग्सले गांधी बने, और पंकज कपूर गांधी जी की आवाज.

‘गांधी’ के बाद श्याम बेनेगल की ‘आरोहण’ (1983) में उन्होंने पहली बार वजनदार सह-कलाकार की भूमिका अभिनीत की. उसी साल रिलीज हुई कल्ट क्लासिक ‘जाने भी दो यारो’ में खल पात्र तरनेजा को अमर किया और ‘मंडी’, ‘खंडहर’, ‘मोहन जोशी हाजिर हो’ जैसी पैरेलल सिनेमा की फिल्मों में छोटी-छोटी भूमिकाएं निभाईं. केंद्रीय भूमिकाएं अभी भी उनके हिस्से में नहीं आईं थीं और कमर्शियल सिनेमा के पास भी उनके लिए हीरो के दोस्त से लेकर हीरोइन के बड़े भाई जैसी ही स्टीरियोटाइप्ड भूमिकाएं थीं. जिन्हें वे करने के लिए बिलकुल तैयार नहीं थे.

इसी दौरान, टेलीविजन एक नए माध्यम के रूप में उभर रहा था. उसके लिए पंकज को ‘करमचंद’ (1985) नामक टीवी सीरियल ऑफर हुआ जिसे करने से उन्होंने साफ इंकार कर दिया. क्योंकि वे सिर्फ फिल्में करना चाहते थे. लेकिन कमर्शियल फिल्मों में उनके हिसाब का काम कम था और आर्ट हाउस की फिल्में कर मुंबई जैसे शहर में पेट और किराया भरना मुमकिन नहीं हो पा रहा था. कुछ वक्त बाद मजबूरीवश पंकज कपूर ने हाथ में गाजर लेकर करमचंद बनना स्वीकारा और 39 एपीसोड्स वाला यह जासूसी धारावाहिक उनके करियर में पहला मील का पत्थर साबित हुआ.

जिस किरदार को पहले आलोक नाथ निभाने वाले थे, उस जासूस करमचंद को पंकज कपूर ने इतने नायाब तरीके से निभाया कि उनकी अभिनय प्रतिभा से पहली बार पूरा देश वाकिफ हुआ. पहली ही बार उन्हें फिल्मों में भी दमदार भूमिकाएं मिलना शुरू हुईं और 1986 में ‘एक रुका हुआ फैसला’ में बार-बार जीभ बाहर निकालने वाले प्रौढ़ जज की भूमिका में 32 वर्षीय पंकज कपूर ने सबसे ज्यादा ध्यान खींचा. कुछ साल बाद आमिर खान की दूसरी फिल्म ‘राख’ (1989) के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सह कलाकार का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला और फिल्मों में काम करना शुरू करने के आठ साल बाद, 1990 में, अपने करियर की पहली बेमिसाल केंद्रीय भूमिका मिली. ‘एक डॉक्टर की मौत’ न सिर्फ एक श्रेष्ठ फिल्म थी - जिसे तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले - बल्कि एक वैज्ञानिक की हताशा और पागलपन को जिस अंदाज में पंकज कपूर ने अभिनीत किया था, उसे आज भी देखने पर दांतों तले उंगलियों का दबना तय होता है.

इस फिल्म के बाद लेकिन, दोबारा पंकज कपूर को टेलीविजन का रुख करना पड़ा. हिंदी फिल्में एक बार फिर उनकी प्रतिभा से इंसाफ करने वाले किरदार उन्हें नहीं दे पाईं और टीवी ने ‘नीम का पेड़’ (1991) नामक धारावाहिक में उन्हें बुधई राम का रोल देकर अमर कर दिया. ‘रुई का बोझ’ (1997) जैसी फिल्मों को छोड़ दें, तो इसे हिंदी सिनेमा का दुर्भाग्य कहा जाएगा कि जिस वक्त टेलीविजन उन्हें ‘फटीचर’, ‘जबान संभाल कर’ और ‘ऑफिस-ऑफिस’ जैसे धारावाहिकों में अविस्मरणीय भूमिकाएं दे रहा था, हमारी फिल्मों के पास उनके लिए समय नहीं था.

लेकिन हमेशा से अपने काम को लेकर बेहद चूजी रहने वाले पंकज कपूर ने फिल्मों के सामने आत्मसमर्पण कभी नहीं किया - जैसे नसीर और ओम पुरी ने किया और कई फिजूल की बकवास फिल्मों में नौटंकी करना स्वीकारा. पंकज कपूर की फिल्मोग्राफी इसकी गवाह है - 35 साल के अपने करियर में पंकज कपूर ने बतौर अभिनेता 45 से ज्यादा फिल्में नहीं की हैं और 10 के करीब धारावाहिक के अलावा खुद को कहीं खर्च नहीं किया. इतना चुन-चुनकर काम किया है, कि कोई जौहरी भी हीरे और मोती चुनना पंकज कपूर से सीख सकता है.

पंकज कपूर अपने साक्षात्कारों में कहते भी हैं – जो वे बहुत कम देते हैं – कि उनकी ख्वाहिश बस इतनी है कि वे अलग-अलग किरदार पोट्रे करें, पंकज कपूर न पोट्रे करें, और लोग उनके उस काम को तवज्जो दें, न कि उन्हें. कितनी अच्छी लगती हैं ये बातें, उस स्थायी दौर में जब हमारी जिंदगी पटी पड़ी हुई है उन अभिनेताओं से जो इस मशहूर उक्ति के आसपास की सोच रखकर सुपरस्टार बन चुके हैं –‘लोग कहते हैं कि मेरी फिल्मों में कैरेक्टर नजर नहीं आते, शाहरुख ही नजर आता है. अरे भाई, शाहरुख खान की फिल्मों में शाहरुख खान ही तो नजर आएगा, कोई और थोड़े ही न आएगा.’

टेलीविजन के सुनहरे दौर के अंत की शुरुआत भी पंकज कपूर की आंखों के सामने हुई. सास-बहू के सहारे एक मीडियम अच्छे कंटेंट से बेसहारा हो गया और पंकज कपूर ने 21वीं सदी में आकर टीवी के लिए काम करना काफी हद तक बंद कर दिया. सन् 2000 के दो साल इधर और दो साल उधर उन्हें न अच्छी फिल्में मिलीं और न ही ‘ऑफिस-ऑफिस’ के अलावा टेलीविजन पर बेहतर कोई रोल. मगर, अकाल के इस दौर में – जब उन्हें ‘मैं प्रेम की दीवानी हूं’ जैसी फिल्मों में भी काम करना पड़ा – उनके जीवन में विशाल भारद्वाज आए. जिस तरह गुलजार की सिनेमाई अभिव्यक्ति को विशाल ने नया जीवन देकर दोबारा गुलजार बनाया था, पंकज कपूर को भी ‘अब्बाजी’ नामक पंख देकर उन्होंने ही हिंदी सिनेमा के इतिहास में अमर कर दिया.

‘मकबूल’ के बाद धीरे-धीरे दुनिया कुबूल करने लगी कि अगर किसी भी अभिनेता को ‘किरदार’ बनना सीखना हो तो पंकज कपूर ही उसकी श्रेष्ठ पाठशाला हैं. अभिनय की बेस्ट मास्टर क्लास. 2003 में आई ‘मकबूल’ के किरदार अब्बाजी के लिए पंकज कपूर ने न सिर्फ अपनी आवाज को बदला, उसको नयी पिच और घरघराहट दी, बल्कि बढ़े हुए पेट के साथ अलग तरह से चलने का जो तरीका ‘नार्कोस’ नामक अंग्रेजी टीवी सीरीज में पाब्लो एस्कोबार ने 2015 में मशहूर किया था, उसे हमारे पंकज कपूर साहब वजन बढ़ाकर 2003 में ही कमाल तरीके से साध चुके थे!

वे अपने जिस्म को लेकर भी कभी मुश्किल महसूस नहीं करते. जब-जब किरदार कहता है, शर्ट उतार देते हैं! ‘मकबूल’ में मटके से पेट वाला उनका व तब्बू का बेडरूम सीन कौन भूल सकता है भला. ‘धर्म’ में सिर्फ धोती और जनेऊ के सहारे पूरी फिल्म में प्रचंड अभिनय करना भुलाए नहीं भूलता. ‘फाइंडिंग फैनी’ में पेंटर डॉन पैद्रो बनकर लस्टी आदमी की उनकी भूमिका भी कोई नहीं भूलना चाहेगा.

और फिर ‘मटरू की बिजली का मंडोला’ (2013) के उस रोल को भूलना तो एक भारी भूल होगी जिसमें हास्य और विनाश को साथ साधता उनका किरदार जब चाहे रोएं खड़े कर देता था. पूंजीवाद की डरावनी असलियत को बेमिसाल अंदाज में ‘जब भी मैं इन बदसूरत खेतों की बदमस्त फसलों को झूमते हुए देखता हूं, तो मेरा सपना मेरी पलकें नोंचने लगता है’ नामक लंबे मोनोलॉग से बयां करता है, और आप सोचते हैं, आदमी एक, अवतार कैसे इतने अनेक!

2008 में आई ‘हल्ला बोल’ में पंकज कपूर ने सफदर हाशमी से प्रभावित पात्र किया. बिलकुल फिल्मी, जो किसी सुपरहीरो की तरह दर्जनों को पीट सकता था और गोलियां कितनी भी बरसा लो, एक भी उसे छू नहीं सकती थीं. लेकिन बॉलीवुड के प्रिय ओवर द टॉप एक्शन हीरो भी वे इस कन्विक्शन के साथ बने कि लगा था जैसे एंग्री ओल्ड मैन के किरदारों को सिर्फ ऐसे ही निभाना चाहिए. भारी आवाज में ‘ओए’ बोलने से लेकर हाथ आगे बढ़ाकर साइड में हो जाने का इशारा करने तक, हल्ला बोल के वे ही मुख्य हीरो थे. अजय देवगन तो, उनके साथ वाले पहले ही सीन में निस्तेज हो गए थे.

‘मकबूल’ और ‘मटरू…’ के अलावा पंकज कपूर ने विशाल भारद्वाज के साथ जो तीसरी फिल्म की, वह भी उनके सर्वश्रेष्ठ अभिनय की बानगी है. ‘द ब्लू अम्ब्रैला’ (2005) एक छोटी बच्ची और छतरी से उसके प्यार की प्यारी सी कहानी थी, लेकिन उसे आलातरीन पंकज कपूर के अभिनय ने बनाया था. शायद ही बच्चों पर बनी दूसरी किसी फिल्म में खलनायक की भूमिका ने पहले सिहरन पैदा की होगी और फिर आपको उस पर बेहद दया आई होगी. इसलिए नहीं कि उसके पास चाकू-तलवार होंगे और वो अंत में पिटता होगा. इसलिए कि बच्ची को जिस छतरी से प्यार है, उसी छतरी को हासिल करने के लिए खलनायक खुद कितना बेचैन है, कितना व्यथित है, इसको पंकज कपूर ने अपनी आवाज और हाव-भाव को एक बार फिर पूरी तरह बदलकर रोंगटे खड़े कर देने वाले अविस्मरणीय अंदाज में अभिनीत किया था. हम भूल गए हैं, लेकिन ये मकबूल और धर्म के स्तर का अभिनव अभिनय था.

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पंकज कपूर ने कभी अपने संघर्षों को सेलिब्रेट नहीं किया. साक्षात्कारों में पूछने पर उत्साहित होकर कभी अपनी कहानी नहीं सुनाई, और सुनाने से पहले हमेशा ये कहा कि ये कोई नया दास्तान-ए-संघर्ष नहीं है, फिल्म इंडस्ट्री में अनेकों कलाकारों के साथ ऐसा हुआ है. उन्होंने आज तक अपनी आत्मकथा नहीं लिखी, जो अगर लिखी जाए तो नसीरुद्दीन शाह की आत्मकथा के स्तर की ज्ञानवर्धक और आलातरीन होगी. सिनेमा पर लिखी ढेरों किताबों में उन पर विस्तार से लिखा कोई अध्याय भी नहीं मिलता, और आज के दौर में जब ई-कॉमर्स वेबसाइटों पर अभिनेताओं से जुड़ी तमाम किस्म की किताबें आसानी से नजर आती हैं, पंकज कपूर पर एक किताब नहीं मिलती.

क्योंकि, पंकज कपूर ने कभी अपने अभिनय के आसपास बाजार खड़ा नहीं किया. ऐसे एक्टर की जिंदगी को जी कर दिखाया है जिसे ‘सादा जीवन उच्च अभिनय’ वाले अनोखे फलसफे से परिभाषित किया जा सकता है. क्या उनके जैसा कोई और ग्रेट एक्टर आपको हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में नजर आता है?

‘ना!’ के सामूहिक जवाब की अनुगूंज सुनाई दे रही है.