‘वो हमारी बेटी के साथ न जाने कैसा सलूक कर रही होगी? तुम्हें जरूरत ही क्या थी उन दोनों को कमरे में अकेले छोड़ने की? मुझे इस औरत का तौर-तरीका पसंद नहीं है. मैं इसे जल्द ही निकाल दूंगा’. जवाब मिला, ‘निकाल दोगे! मैं तुम्हारी स्थिति समझ सकती हूं. लेकिन तुम भी समझने की कोशिश करो. मैं तो मां होकर भी दिल पर पत्थर रखे हुए हूं. तुम्हें पता है न, हमारे पास यह आख़िरी रास्ता है. अगर यह भी चली गयी तो हमारी बेटी हमेशा के लिए खामोश अंधेरे में खोकर रह जाएगी.’

माथे पर सलवटें लिए आर्थर हेनरी केलर और उनकी पत्नी केट एडम्स केलर के लिए एक-एक पल भारी हुआ जा रहा था. जिस औरत का जिक्र वे कर रहे थे, वे थीं मूकबधिर बच्चों की शिक्षिका एनी सुलिवान और उनके साथ कमरे में बंद थी केलर दंपत्ति की तकरीबन सात साल की बेटी हेलन एडम्स केलर, जिन्हें आप और हम हेलन केलर के नाम से जानते हैं.

27 जून, 1880 को अमेरिका के अलाबामा प्रांत में जन्मी हेलन हमेशा से ऐसी नहीं थीं. 19 महीने की आयु में उन्हें गंभीर बुखार ने अपनी चपेट में ले लिया. डॉक्टरों ने कह दिया था कि इस बच्ची का बचना अब मुश्किल है. हालांकि उनकी यह आशंका गलत साबित हुई और हेलन बच गईं, लेकिन इस बीमारी के चलते उनकी देखने-सुनने की शक्ति हमेशा के लिए जाती रही.

जब हेलन केलर अपनी बहन को मारने ही वाली थीं

बचपन में ही हेलन अपनी कुछ बातों को इशारों से समझाने लगी थीं. जैसे मना करने के लिए गर्दन दाएं-बाएं हिलाना, हां कहने के लिए गर्दन ऊपर-नीचे करना. किसी के साथ बाहर जाने के लिए उसके कपड़े पकड़ना और जो पसंद न हो उससे दूर रहने के लिए उसे धक्का देना. इसके अलावा वे पेड़ों, वस्तुओं और इंसानों को उनकी महक से पहचानने लगी थीं. जब उन्हें ब्रेड खानी होती तो वे अपनी हाथों से कुछ काटने का इशारा करतीं और जब आइसक्रीम खानी होती तो ठिठुरने का.

लेकिन धीरे-धीरे उन्हें समझ आने लगा कि बाकी लोग उनकी तरह नहीं हैं. वे अपनी बात कहने के लिए दूसरे तरीकों का इस्तेमाल करते हैं. हेलन सभी के मुंह पर हाथ रखकर होठों की आकृति और आवाज के साथ पैदा हुए स्पंदनों को महसूस कर खुद भी अपने होंठ उसी तरह हिलाने की कोशिश करतीं, लेकिन कुछ बोल नहीं पाती थीं.

इस तरह बार-बार बोलने के प्रयास में असफल होने और दूसरों से अलग होने की भावना के कारण हेलन धीरे-धीरे चिड़चिड़ी और जिद्दी होती जा रही थीं. लिहाजा वे छोटी-छोटी बातों पर घर के सामान को तोड़तीं, अपनी नर्स के साथ मारपीट करतीं. अपनी आत्मकथा ‘द स्टोरी ऑफ माई लाइफ’ में हेलन लिखती हैं, ‘मेरे पास एक गुड़िया हुआ करती थी- नैन्सी... मेरी सारी नाराज़गी और खीज बेचारी नैन्सी पर उतरती. फिर भी मुझे नैन्सी सबसे प्यारी थी. मैं नैन्सी को एक छोटे से पालने में सुलाया करती थी. एक दिन मुझे पता चला कि मेरी छोटी बहन उस पालने में सो रही थी. आपे से बाहर होकर मैंने वो पालना पलट दिया. लेकिन वहां अचानक पहुंची मेरी मां ने छोटी बच्ची को संभाल लिया था. यदि वे न होती तो शायद मैं अपनी बहन को मार चुकी होती.’

हेलन के जीवन में एनी सुलिवान का किसी फ़रिश्ते की तरह आना

हेलन पांच साल की हो चुकी थीं और अब तक उनके रिश्तेदारों ने इस बात की उम्मीद पूरी तरह छोड़ दी थी कि वे कभी लिख-पढ़ या बोल पाएंगी. लेकिन उनकी मां केट हार मानने के लिए तैयार नहीं थीं. 1886 में उन्होंने लौरा ब्रिजमैन नाम की एक लड़की के बारे में पढ़ा जो हेलन की तरह देखने और सुनने में असमर्थ होने के बावजूद पढ़-लिख पाई थी.

हेलन के माता-पिता ने जब इस बारे में ज्यादा जानकारी जुटाई तो लोगों ने उन्हें वाशिंगटन में रहने वाले महान वैज्ञानिक एलेक्जैंडर ग्राहम बेल के पास जाने का सुझाव दिया. ग्राहम बेल ने ही केलर दंपत्ति को बॉटसन शहर के एक स्कूल के बारे में बताया, जहां इस तरह के बच्चों को पढ़ाया जाता था. जब हेलन के माता-पिता वहां पहुंचे तो उस स्कूल के डायरेक्टर ने हेलन के लिए एक प्रशिक्षक उपलब्ध करवाने का वादा किया. कुछ महीनों बाद एनी सुलिवान हेलन की प्रशिक्षिका बन उनके घर पहुंचीं. इस बारे में हेलन लिखती हैं, ‘वह मेरी जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण दिन था जब मेरी शिक्षिका एनी मैंसफील्ड सुलिवान मेरे पास आयी थीं.’

एनी ने वहां पहुंचते ही अपना काम शुरू कर दिया. वे हेलन को उनके कमरे में लेकर गयीं और उन्हें एक गुड़िया दी. एनी ने हेलन के हाथ पर सांकेतिक भाषा से गुड़िया (डॉ-ल) के अक्षरों को बनाया. हालांकि हेलन उनका मतलब नहीं समझी थीं, फिर भी उन्होंने वे संकेत याद कर लिए. उसके बाद एनी उन्हें कमरे में मौजूद दूसरी चीजों के नाम बताने लगीं जैसे पिन, टेबल, कपड़े आदि. हेलन इस नए अभ्यास से जल्दी ही तंग आ गयीं और उन्होंने फुर्ती से एनी को कमरे में बंदकर चाबी को छिपा दिया. एनी इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी जबकि हेलन इससे पहले कई बार अपनी मां के साथ भी यह कर चुकी थीं. जब घंटो की मशक्कत के बाद भी कमरे की चाबी नहीं मिली तो हेलन के पिता ने कमरे के खिड़की पर सीढ़ी लगाकर एनी को बड़ी मुश्किल से वहां से निकाला.

एनी समझ गयी थीं कि हेलन इतनी जल्दी काबू में आने वाली बच्ची नहीं है. लिहाजा उन्होंने केलर दंपत्ति से हेलन के साथ कुछ सप्ताह अकेले रहने की इजाजत मांगी. जो उन्हें बड़ी मुश्किल से मिली. लेकिन हेलन को सिखाने के लिए इतनाभर काफी नहीं था. वे शब्दों के संकेतों को याद तो करने लगी थीं लेकिन अभी भी इनका मतलब नहीं समझ पा रही थीं.

एनी एक दिन हेलन को म-ग (जग) और वॉ-ट-र (पानी) के संकेत सिखा रही थीं. लेकिन हेलन बार-बार दोनों के बीच भ्रमित हो रही थीं, यह खीज उनके भीतर ऐसी बढ़ी कि उन्होंने अपनी गुड़िया और कमरे का दूसरा सामान तोड़ दिया. हेलेन के व्यवहार से नाराज एनी उन्हें कमरे से बाहर ले आयीं और एक हैडपंप से पानी निकाल कर उनके हाथ पर डाल दिया और वॉ-ट-र का संकेत बनाया. यही वो क्षण था जब हेलन समझ गयीं कि वे सारे संकेत जो एनी उनके हाथ पर बनाती थीं, वे असल में अलग-अलग चीजों के नाम थे.

नन्हीं हेलन और एनी
नन्हीं हेलन और एनी

उस पल को याद कर हेलन लिखती हैं, ‘मैं भाषा के रहस्य को समझ गयी थी. पानी का मतलब एक ऐसी अद्भुत चीज थी जो ठंडी थी और मेरे हाथों पर बह रही थी. इस एक शब्द ने मानो मेरी आत्मा को जगा दिया, मुझे रोशनी और उम्मीद के साथ तमाम खुशियां इसी पल में मिल गयी थीं. मेरी आंखों में आंसू थे.’ इसके बाद एनी ने हेलन को वे तमाम शब्द सिखाए जो आमजीवन के लिए जरूरी थे. जानकार कहते हैं कि वह एनी ही थीं जिनकी सतत लगन और मेहनत ने हेलन को पूरी दुनिया के सामने एक नज़ीर बनाकर पेश किया. हेलन से मिलने के बाद एनी दोस्त और प्रशिक्षक बनकर ताउम्र (तकरीबन 49 वर्ष) उनके साथ रहीं.

हेलन की पहली कहानी जिसके लिए उन पर चोरी का इल्जाम लगा

11 साल की होते-होते हेलन बोलना और पढ़ना सीख चुकी थीं. लेकिन अब किताबों से उन्हें ऊब होने लगी. वे कुछ और करना चाहती थीं. एक दिन एनी से कुछ कहानियां सुनते-सुनते उनके खुद के दिमाग में एक कहानी कौंधी. इसे हेलन ने ‘द फ्रॉस्ट किंग’ नाम से लिखा (ब्रेल लिपि में) भी. हेलन खुद नहीं जानती थीं कि यह कहानी उनके ज़ेहन में आयी कैसे! जब उन्होंने इसे एनी के साथ अपने माता-पिता को सुनाया तो सभी दंग रह गए.

हेलन को लगा कि यह कहानी स्कूल डायरेक्टर को भी भेजनी चाहिए. लिहाजा उन्होंने खुद पोस्ट ऑफिस जाकर इसकी एक नकल उन्हें भेज दी. इन लम्हों को याद कर हेलन लिखती हैं, ‘यह मेरे लिए हवा में उड़ने जैसा एहसास था.’ नन्हीं हेलन की इस कहानी से डायरेक्टर इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी संस्था की रिपोर्ट में इसका प्रकाशन करवा दिया.

लेकिन फिर पता चला कि हेलन की कहानी की भाषा और विषय मार्गरेट नाम की एक लेखिका द्वारा लिखी किताब की दो कहानियों से बेहद मिलती-जुलती थी. यह कॉपीराइट कानून उल्लंघन का मामला था. जब हेलन को इसका मतलब समझ आया तो इस बात से उन्हें भारी दुख हुआ. इस घटना के बाद वे खुद को एक बार फिर उसी अंधेरे में महसूस करने लगीं जहां पांच साल पहले थीं. हेलन को लगने लगा कि उनके सभी अपनों ने यह न बताकर उनके साथ धोखा किया था कि यह कहानी पहले भी छप चुकी है.

लेकिन इस बात से सिर्फ हेलन ही दुखी नहीं थी एनी और स्कूल डायरेक्टर भी उतने ही परेशान थे. डायरेक्टर को लग रहा था कि एक अपाहिज लड़की पर तरस खाकर उन्होंने गलती कर दी. इस मामले को लेकर एक जांच बिठाई गयी. इस पूरी प्रक्रिया का जिक्र हेलन ने अपनी आत्मकथा में किया है. वे लिखती हैं, ‘इस दौरान एनी को मुझसे दूर कर दिया गया और मुझसे इस बारे में कई सवाल पूछे गए कि मैंने वह कहानी पहले कहां पढ़ी थी? लेकिन मुझे ऐसा कुछ भी याद नहीं था.’ इस घटना से हेलन इतनी आहत हुईं कि वे खुद को खत्म कर लेना चाहती थीं.

एनी भी यह सोच-सोचकर हैरान थीं कि उनके सिवाय हेलन को कोई और पढ़ा नहीं सकता था और वे भी इस किताब के बारे में कुछ नहीं जानती थीं. फिर एनी ने ग्राहम बेल के साथ मिलकर इस बारे में पता करने की कोशिश की. तब पता चला कि करीब एक साल पहले एनी हेलन को लेकर अपनी किसी दोस्त के घर गई थीं. जिन्होंने हेलन का मन बहलाने के लिए कुछ कहानियां सुनाईं, जिनमें शायद वह कहानी भी थी. समय के साथ हेलन इस बात को पूरी तरह भूल गयीं. और जब बाद में उनके दिमाग में यह ख्याल आया उन्होंने इसे लिख दिया.

जब जांच कमेटी को यह बात पता चली तो उन्होंने इसे मानवीय भूल मानते हुए हेलन को निर्दोष घोषित किया. लेकिन इसके बाद वर्षों तक हेलन कुछ भी लिखने से पहले डरती रहीं कि कहीं ये विचार किसी और के तो नहीं हैं. हालांकि एनी के बहुत कहने पर उन्होंने 1903 में अपनी आत्मकथा लिखी. जिसके बाद उनका आत्मविश्वास फिर से जागा क्योंकि यह निश्चित तौर पर उनकी अपनी कहानी थी, किसी और के विचार नहीं. पूरी जिंदगी में हेलन ने 12 किताबों के अलावा कई आलेख लिखे जो दुनियाभर में काफी सराहे गए.

हेलन की सामाजिक कार्यों में काफी दिलचस्पी थी

कॉलेज के बाद 1913 में हेलन का चयन बतौर प्राध्यापिका हो चुका था लेकिन वे इतने से खुश नहीं थीं. वे दुनियाभर के उन तमाम लोगों के लिए कुछ करना चाहती थीं जो आंखों से देख पाने में असमर्थ थे. 1915 में हेलन ने अपने साथियों के साथ मिलकर ‘हेलन केलर अंतरराष्ट्रीय संगठन’ की स्थापना की, जो दृष्टि, स्वास्थ्य एवं पोषण से संबंधित अनुसंधानों को समर्पित था. इसके बाद हेलन ने 1924 में दृष्टिहीनों के हितों के लिए बनी संस्था ‘अमेरिकन फाउंडेशन फॉर द ब्लाइंड्स’ के लिए काम करना शुरू किया. इसके अलावा वे और भी कई संस्थाओं से जुड़ी जो दृष्टिहीनों के कल्याण के लिए काम करती थीं. इसके लिए हेलन ने दुनियाभर में दौरे किए. इस दौरान वे तकरीबन 35 देशों में गईं.

समय के साथ हेलन न सिर्फ सामाजिक बल्कि तत्कालीन राजनैतिक मुद्दों पर भी अपनी पकड़ बनाने लगी थीं. उनका मानना था कि राजनीति सबसे अहम रास्ता है जिसके जरिए जरूरतमंदों की मदद की जा सकती थी. यही कारण था कि कॉलेज पूरा होते-होते हेलन समाजवादी विचारधारा वाली एक पार्टी की सदस्य बन गईं.

इस दौर में महिलाओं के मताधिकार, श्रम अधिकार, समाजवाद का समर्थन और कट्टरवादी शक्तियों की मुखालफ़त जैसे प्रमुख मुद्दों पर मुखर होकर हेलन अपनी बात रखने लगीं. उन्हें बच्चों के स्वास्थ्य और परवरिश की भी बहुत फिक्र थी और वे इसमें औरतों को सबसे अहम किरदार मानती थीं. हेलन कहती थीं, ‘हर बच्चे का अधिकार है- अच्छी परवरिश, अच्छा पोषण और अच्छी शिक्षा. और सिर्फ औरतों को मिलने वाली आजादी ही इस अधिकार को सुनिश्चित कर सकती है.’

बच्चों और औरतों के अलावा उन्हें मज़दूरों के हितों की भी चिंता थी. 1909 से लेकर 1921 तक हेलन ने समाजवाद और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को लेकर कई लेख लिखे जिन्हें बाद में ‘आउट ऑफ द डार्क’ नाम से प्रकाशित किया गया. लेकिन उनके इस कदम पर अमेरिका के कई पूंजीवाद समर्थकों को घोर आपत्ति हुई और शारीरिक कमजोरियों को लेकर हेलन को पहली बार सार्वजनिक तौर पर घेरा गया. एक अखबार ने तो उनके बारे में यह तक लिख दिया था कि हेलन ने अपनी शारीरिक सीमाओं पर ध्यान न देते हुए इस तरह के आंदोलनों में कूदकर गलती की है.

हेलन इन टिप्पणियों से आहत जरूर हुईं लेकिन उन्होंने अपना काम नहीं छोड़ा. वे अक्सर कहा करती थीं, ‘आंखें होते हुए भी न देख पाना दृष्टिहीन होने से कहीं ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण है.’ हेलन ने दोनों विश्वयुद्धों में अमेरिका की भागीदारी का प्रबल विरोध किया. और 1943 में दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान अस्पतालों में भर्ती अपाहिज हुए सैनिकों और लोगों की मदद करने पहुंच गईं. इसे देखते हुए 1948 में उन्हें अमेरिका की तरफ से पहला सद्भावना दूत बनाकर जापान भेजा गया. यह यात्रा बेहद सफल रही. जापान में करीब 20 लाख लोग उनका स्वागत करने पहुंचे. समस्त मानव समुदाय के लिए हेलन के उत्कृष्ट योगदानों को ध्यान में रखते हुए 14 सितंबर 1964 को अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन बी जॉनसन ने उन्हें मैडल ऑफ फ्रीडम से नवाज़ा था जो अमेरिका के सर्वोच्च सम्मानों में से एक है.

विश्वयुद्ध में शामिल रहे एक सैनिक का हालचाल पूछतीं हेलन केलर
विश्वयुद्ध में शामिल रहे एक सैनिक का हालचाल पूछतीं हेलन केलर

हेलन सिर्फ अपाहिज लोगों के लिए प्रेरणा नहीं थीं. उस दौर के तमाम दिग्गज भी उनसे प्रभावित थे. इनमें प्रख्यात अमेरिकी राजनीतिज्ञ एलेनर रूजवेल्ट, अभिनेता विल रोजर, महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंसटीन, अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी, व्यवसायी एंड्रयू कार्नेगी, महान कलाकार चार्ली चैपलिन, व्यवसायी हेनरी फोर्ड जैसे नाम शामिल थे. भारत की बात की जाए तो रबीन्द्रनाथ टैगोर और देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी हेलन के मुरीद थे.

एक जून 1968 को हेलन ने इस दुनिया से विदा ली थी. इस बीच उन्होंने ऐसा जीवन जिया जो लोगों के लिए उस दौर में भी प्रेरणादायक था और शायद आने वाली हर पीढ़ी के लिए रहेगा.