तीन जून 1947. इंग्लैंड की लेबर पार्टी सरकार ने हिंदुस्तान के भाग्य का फैसला आखिरकार ले ही लिया. पर्दे के पीछे की राजनीति, कांग्रेस-मुस्लिम लीग की खींचतान और दंगों की दहकती आग के बीच यह तय कर लिया गया कि इंग्लैंड की महारानी के सिर पर अब हिंदुस्तान का ताज नहीं रहेगा. यह भी कि धार्मिक बहुलता के आधार पर दो मुल्क बना दिए जायेंगे- हिंदुस्तान और पाकिस्तान. यह भी तय हुआ कि उन्हें ब्रिटिश राष्ट्रमंडल से अलग होने या शामिल रहने का फैसला करने का अधिकार मिलेगा. इतिहास में यह योजना थर्ड जून प्लान के नाम से दर्ज है. इसे माउंटबेटन प्लान भी कहा जाता है क्योंकि इसे तत्कालीन वायसराय माउंटबेटन ने बनाया था.

योजना पर ब्रिटिश सरकार की सहमति लेकर वाइसराय माउंटबेटन हिंदुस्तान लौट आए. इसके बाद एक सर्वदलीय मीटिंग बुलाई गयी जिसमें यह प्लान पेश किया गया. माउंटबेटन ने इस पर राज़ीनामे के लिए सभी पार्टियों के नेताओं को अगले दिन तक का समय दिया. कांग्रेस के नेता तो इस प्लान को लेकर लगभग राज़ी थे पर जिन्ना की मुस्लिम लीग को मनवाना टेढ़ी-खीर जान पड़ा. उन्होंने माउंटबेटन से कुछ और समय मांगा. लेकिन माउंटबेटन ने यह कहकर मना कर दिया कि ज़्यादा देरी या टालमटोल पाकिस्तान के ख्व़ाब को चकनाचूर कर देगी.

वाइसराय जानते थे कि भले ही गांधी की आवाज़ कांग्रेस पार्टी के नक्कारखाने में तूती जैसी हो गयी हो, फिर भी वे ऐसे शख्स हैं जो कुछ भी अप्रत्याशित कर सकता है. जिन्ना खामोश रह गए थे. अगले दिन जब सभी नेता दोबारा वाइसराय हाउस में इकट्ठा हुए तो सभी ने एक सुर में इस प्लान पर अपनी रजामंदी की मोहर लगा दी.

अलेक्स वों तुन्ज्लेमन अपनी क़िताब ‘इंडियन समर’ में लिखती हैं, ‘जैसे ही वाइसराय ने नेताओं की आंखों में प्लान को लेकर रजामंदी देखी तो वे नाटकीय अंदाज़ में खड़े हुए. उन्होंने टेबल पर हाथ मारते हुए कहा कि 15 अगस्त 1947 को सत्ता का हस्तांतरण कर दिया जाएगा. लोग अवाक रह गए थे क्योंकि ब्रिटेन की सरकार ने जून 1948 तक भारत से पूरी तरह निकलने का प्लान बनाया था.’

तो आखिर क्या वजह थी कि माउंटबेटन हिंदुस्तान से इतनी जल्दी सब कुछ समेटना चाहते थे?

अप्रत्याशित ख़ून-ख़राबा और दंगों का डर

माउंटबेटन की जीवनीकार फ़िलिप ज़ीगलर लिखते हैं, ‘बंटवारे के प्लान की मंज़ूरी के साथ तय हो गया था कि सांप्रदायिक आग भड़केगी. प्लान लागू करने में देरी करने से नुकसान ही बढ़ेगा. आज पंजाब में समस्या है. यह कल हैदराबाद और बंगाल में भी हो सकती है, या उन जगहों पर जहां हिंदू और मुसलमान साथ रह रहे हैं. इन दंगों की वजह से मरने वालों की संख्या दो लाख से भी ज़्यादा हो सकती है- शायद बीस लाख या फिर, दो करोड़.’ इसलिए माउंटबेटन जल्द से जल्द हिंदुस्तान छोड़ना चाहते थे.

वहीँ ब्रिटिश इतिहासकार और पत्रकार एंड्रू रॉबर्ट्स ने ‘माउंटबेटन और एड्रेनैलिन के ख़तरे’ नामक शीर्षक वाले एक लेख में लिखा है, ‘माउंटबेटन कमज़ोर शासक थे. जब भी कोई कठोर निर्णय या कदम लेने का अवसर होता तो वे ढुलमुल रवैया अपना लेते. वे चाहते तो एयरफोर्स की मदद से पंजाब में हिंसा पर काबू पा लेते. पर उन्होंने ऐसा नहीं किया और इसलिए नाकाम रहे.’ ज़ीगलर की सोच के उलट रॉबर्ट्स का मानना है कि माउंटबेटन के हिंदुस्तान से जल्दी जाने के निर्णय की वजह से इंसानी जान-माल का नुकसान ज़्यादा ही हुआ न कि कम.

क्या माउंटबेटन ने यह निर्णय अपनी शादी को बचाने के लिए लिया था?

ब्रिटिश इतिहासकार एलेक्स फॉन तुन्सेलमन का मानना है कि माउंटबेटन की पत्नी एडविना हिंदुस्तान आना ही नहीं चाहती थीं. वे लिखती हैं, ‘शुरुआत में एडविना और डिक्की (माउंटबेटन) के रिश्ते ठीक-ठाक थे. उस दौर के फोटोग्राफों में वो दोनों खुश नज़र आते. पर कुछ ही समय के बाद ये रिश्ता झंझावातों में घिर गया था. एडविना डिक्की से अलगाव चाहती थीं. ज़ाहिर है इसका असर माउंटबेटन के कामकाज पर भी पड़ रहा था.’

चर्चित लेखिका जेनेट मोर्गन की एडविना माउंटबेटन पर लिखी क़िताब ‘लाइफ ऑफ़ हर ओन’ काफी मशहूर रही है. इस किताब की मानें तो एडविना ने डिक्की से कहा था कि उन्हें अगर यह रिश्ता बचाना है तो हिंदुस्तान से जल्द से जल्द इंग्लैंड वापस चलना होगा. 24 अगस्त, 1947 को एडविना ने ब्रिटिश सरकार को एक रिपोर्ट पेश की थी जिसमें उन्होंने क़ुबूल किया था कि इतनी जल्दी हुए घटनाक्रम में कहीं न कहीं उनका एक ज़िद्दी पत्नी होना भी ज़िम्मेदार था.

वाइसराय माउंटबेटन भंवर जाल में फंस गए थे. इधर उन्हें जून 1948 तक सत्ता का हस्तांतरण करना था और एडविना उनसे जल्द से जल्द ब्रिटेन लौटने की ज़िद कर रही थीं. कसौटी पर रिश्ता था. तो क्या माउंटबेटन डिक्की से हार गए थे?

हिंदुस्तान के हालात और अंग्रेजों की सुरक्षा का डर

1947 के दौरान हिंदुस्तान में उस वक़्त तकरीबन 12 हज़ार अंग्रेज़ अफसर और सैनिक थे. फ़रवरी 1946 में रॉयल नेवी ने विद्रोह कर दिया था जिसकी धमक इंग्लैंड तक सुनाई दी थी. सरकार ने विद्रोह को दबा तो लिया गया था पर उसके ख़िलाफ़ असंतोष जारी था.

उधर, पंजाब में भी हालात कुछ ठीक नहीं थे. गवर्नर सर एवन जेन्किन्स ने वाइसराय को ख़त लिखकर हिंदुस्तान जल्द न छोड़ने की अपील की थी. उन्होंने लिखा था कि मुस्लिम समुदाय पूरा पंजाबी सूबा पाकिस्तान में चाहता है और उधर हिंदुओँ और सिखों को लाहौर चाहिए. जेन्किन्स ने एक और पत्र लिखकर कहा, ‘यह जानकर कि आजादी बंटवारा साथ ला रही है, पंजाब में खुशी कम और गुस्सा ज़्यादा है.’

मशहूर इतिहासकार रामचंद्र गुहा अपनी क़िताब ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में एक अंग्रेज़ अफसर के 1946 में लिखे पत्र का हवाला देते हैं. इसका मज़मून था कि हिंदुओं और मुसलमानों के कौमी दंगों की वजह से पूरा देश अंग्रेज़ हुक्मरानों और सैनिकों के ख़िलाफ़ हो जाएगा. इन हालात में अब अंग्रेजों की सुरक्षा भी एक बड़ा मुद्दा बन गयी थी. बंगाल के गवर्नर ने आदेश दिया था कि दंगे भड़कने की सूरत में सेना की प्राथमिकता होगी कि बंगाल में बिखरे हुए अंग्रेजों को एक जगह इकट्ठा करके उन्हें सुरक्षा दी जाए.

हो सकता है जगह-जगह से मिली रिपोर्टों के आधार पर माउंटबेटन को भी अंग्रेजों की सुरक्षा का ख्याल सता रहा हो. 1857 के गदर में अंग्रेजों के क़त्लेआम की रिपोर्ट तो उन्होंने यकीनन पढ़ी ही होगी. हो सकता है इसलिए हालात बद से बदतर होने से पहले वे अंग्रेजों को हिंदुस्तान से बाहर निकाल देना चाहते हों. यह बात याद रखनी चाहिए कि माउंटबेटन ख़ुद एक सैनिक अफसर थे. कोई भी सैन्य अफ़सर अपनी सेना का नुकसान बर्दाश्त नहीं कर सकता.

माउंटबेटन ने सीरिल रेडक्लिफ को विभाजन की रेखा खींचने का ज़िम्मा दिया था. जिसे उन्होंने नौ अगस्त को तैयार कर लिया. वाइसराय ने इस बंटवारे की जानकारी 15 अगस्त 1947 के दो दिन बाद सार्वजनिक की थी. उनका मानना था कि यह बात अगर आजादी के पहले बताई गई तो इसकी वजह से पैदा होने वाले माहौल से निपटने की ज़िम्मेदारी भी अंग्रेजों की होगी. वे इससे बचना चाहते थे.

खैर, अब यह सिर्फ दिमागी कसरत है कि अगर अंग्रेज़ एक साल और रुक जाते तो हालात क्या होते? कितना नुकसान होता? कितने लोग मरते? ग़ालिब का शेर है ‘न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ भी न होता तो ख़ुदा होता. डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता’

ब्रिटिश राज की मुहर लगते ही 18 जुलाई 1947 को ‘माउंटबेटन प्लान’ मंज़ूर हो गया था. कहा जाता है कि सीरिल रेडक्लिफ ने वे सारे दस्तावेज़ जला दिए थे जिनके आधार पर उन्होंने इस मुल्क में सरहद बनाई थी. एक अनुमान के हिसाब से विभाजन में कोई 20 लाख लोग मारे गए थे. किसी ने व्यंग्य के तौर पर कहा है, ‘अंग्रेज़‘ ईमानदारी’ के लिए जाने जाते रहे हैं. यह इस बात से भी साबित होता है कि उन्होंने हिंदुस्तान को उसी हाल में छोड़ा था जैसा वह उनके कब्ज़ा करने के वक़्त था.’