बिहार फिर से खबरों में है. इंटरमीडिएट परीक्षाओं के परिणाम आए हैं. पैंसठ प्रतिशत छात्र फेल हो गए हैं. बिहार में विरोध प्रदर्शन शुरू हो रहे हैं. कॉपियों की दुबारा जांच कराने की मांग की जा रही है. जनसंचार माध्यमों के जरिए वैसे छात्रों की व्यथा और क्रोध का पता चल रहा है जिन्होंने आईआईटी जैसी कठिन प्रवेश परीक्षाओं में सफलता प्राप्त की है लेकिन बारहवीं की बोर्ड की परीक्षा में फेल हो गए हैं. इसे पर्याप्त माना जा रहा है यह कहने के लिए कि परीक्षा परिणामों में घपला ज़रूर है - जो आईआईटी की परीक्षा की बाधा दौड़ पार कर गए, बोर्ड के इम्तहान में फेल कैसे हो जाएंगे!

प्रतिक्रिया जाने-बूझे ढर्रे पर इसीलिए निराशाजनक है. इस खबर को इतनी प्रमुखता देने के पीछे सरकार चलाने वाले नेताओं को बिहार के खिलाफ साजिश नज़र आ रही है. वे खुद को बिहार का पर्यायवाची समझ बैठे हैं. यह आजमाया हुआ तरीका है - जैसे ही सरकार की आलोचना हो, उसे राज्य या देश की आलोचना में बदल दो और फिर आलोचकों को राज्य विरोधी या देशद्रोही घोषित दो. इसके बाद आलोचना पर बात करने की जगह आलोचकों पर बात होने लगती है और मसला पीछे छूट जाता है.

सरकार अपने पक्ष में और विपक्ष के नेता अपने तर्क को गहराई देने के लिए बार-बार नालंदा का नाम लेने लगते हैं. ‘विश्व के पहले विश्वविद्यालय नालंदा की भूमि पर यह कैसे हो सकता है’ जैसी निरर्थक और भावुकता भरी बहस होने लगती है. नालंदा, कितना ही श्रेष्ठ क्यों न रहा हो, आज की शिक्षा पर बात करने के लिए उपयुक्त रूपक कैसे हो सकता है! वह सार्वजनीन शिक्षा की संस्था न थी, इसलिए श्रेष्ठता के मानक के लिए बार-बार उसका नाम लेना कोई मदद नहीं करता.

एक अध्यापक मित्र ने मुझसे पूछा है कि स्थिति इतनी खराब कैसे हो सकती है? या, क्या कॉपियां कड़ाई से जांची गई थीं और अगर ऐसा दूसरे राज्यों में भी हो, तो वहां भी नतीजे इसी तरह के आएंगे? इस प्रश्न का उत्तर देना मुश्किल है. जब हम अध्यापकों पर भरोसा ही नहीं करते और उन्हें आदर्श उत्तर बनाकर पहले से दे देते हैं ताकि उनके पूर्वाग्रहों का दंड छात्र को न भोगना पड़े तो फिर कड़ाई या ढिलाई का सवाल ही ख़त्म हो जाता है.

इस बार बिहार में शायद हालात दूसरे थे. परीक्षा के बाद इंटरमीडिएट के अध्यापकों की हड़ताल शुरू हो गई थी और मूल्यांकन के लिए वे उपलब्ध न थे. खबर है कि सरकार ने बड़ी संख्या में प्राथमिक स्तर के अध्यापकों को कापियों की जांच के काम में लगाया था. इस तरह की खबर भी है कि हिंदी के शिक्षकों ने विज्ञान की कापियों की जांच की. सरकार का तर्क यह है कि उसने स्नातकोत्तर डिग्री वाले शिक्षकों को ही इस काम पर लगाया था. लेकिन सिर्फ डिग्री होना कोई योग्यता नहीं. अगर आप उस स्तर पर पढ़ा नहीं रहे तो मूल्यांकन के योग्य भी कोई नहीं!

जो हुआ है वह एक अपराध है और इसके लिए जिम्मेदारी तय करने की भी ज़रूरत है. वह पहले सरकार की है. अध्यापकों की हड़ताल को नज़रअंदाज करना अब बिहार में पुरानी बात हो गई है. लालू यादव ने यह तरीका निकाला था कि हड़तालियों को देखो ही नहीं और आधी समस्या ख़त्म! वे थक-हारकर काम पर लौट ही आएंगे! बाद की सरकार उससे दोगुने अहंकार के साथ पेश आई.

अध्यापकों के खिलाफ एक तरह का आक्रोश खुद सरकार ने समाज में पैदा किया है: यह सुविधाप्राप्त समुदाय है और काम नहीं करना चाहता; इसे ज़रूरत से ज़्यादा तनख्वाह मिलती है, आदि, आदि! ये शिकायतें अब इतनी पुरानी हो चुकी हैं कि विचार योग्य भी नहीं मानी जातीं कि अध्यापक से शिक्षण के साथ हर तरह का सरकारी काम भी लिया जाता है. वह धीरे-धीरे अध्यापक होने का बोध ही खो देता है. स्कूली शिक्षक खुद को शिक्षक से अधिक सरकारी कारकुन मानता है.

शिक्षकों की नियुक्ति बिहार सरकार ने बाकायदा गजट अधिसूचना के जरिए बंद कर दी जब उसने स्कूलों में सहायक शिक्षक का पद ही समाप्त कर दिया. यह सबसे पहले मध्य प्रदेश ने किया था. नीतीश कुमार और भारतीय जनता पार्टी की संयुक्त सरकार ने कामकाज संभालने के बाद पहला निर्णय यह लिया था कि नियमित शिक्षकों की जगह डेढ़ लाख ‘शिक्षा मित्रों’ की बहाली की जाए. हालांकि वह उन्हें शिक्षक ही कह रही थी. ये बहालियां प्राथमिक से माध्यमिक स्तर तक के स्कूलों के लिए की गई थीं.

मैंने जब इसके बारे में माध्यमिक शिक्षक संघ के नेता केदार बाबू से पूछा था कि बिहार की जनता और बच्चों के साथ इस धोखाधड़ी का वे विरोध क्यों नहीं कर रहे, तो उनका कहना था कि अगर अभी विरोध करेंगे तो जिन डेढ़ लाख घरों में चूल्हा जला है वे उन्हें मारने दौड़ेंगे! लेकिन यह एक बड़ा धोखा था और उस वक्त न तो मीडिया, न ही विपक्ष और न विद्वानों ने इसकी आलोचना की या इसे विचार के योग्य भी समझा. सुशासन के लिए तब की सरकार के लिए तालियां बजाने से अधिक काम मीडिया का न था. क्या वह मीडिया, जो सिर्फ और सिर्फ क्षण में जीता है, यह समझ पाएगा कि आज जिस दुर्घटना का दृश्य दिखलाई दे रहा है, उसके बीज कई साल पहले की सरकारी नीति में पड़ चुके थे!

सरकार ने नए स्कूल खोलने या शिक्षक की बहाली की जगह वित्त संपोषित स्कूलों को बढ़ावा देने की नीति अपनाई. उनसे कहा गया कि जिस स्कूल का नतीजा जितना अच्छा होगा, उसे उसी अनुपात में अनुदान मिलेगा. फिर क्या था! स्कूलों की दिलचस्पी शिक्षण से अधिक परीक्षा परिणाम सुधारने में हो गई. ‘सेंटर मैनेज’ करना स्कूली शिक्षा का एक पुराना, पहचाना हुआ पद है. क्लास मैनेज करने की जगह सेंटर मैनेज करने में ही सारी मेहनत और हिकमत का इस्तेमाल किया जाने लगा.

सरकारी इंटरमीडिएट स्कूलों या कॉलेजों में अध्यापकों की कमी मसला ही नहीं है. प्रयोगशाला नहीं, पुस्तकालय नहीं और तो और, आपको अक्सर छात्र भी नज़र न आएंगे. दाखिला भले ही उन्होंने ले लिया हो, वे परिसर में नहीं दीखते. और यह किस्सा स्नातक स्तर का भी है. इनमें से अधिकतर छात्र कोचिंग करने में व्यस्त होते हैं, अलग-अलग प्रकार की प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी उनका पूरा वक्त ले लेती है और इसी बीच वे बारहवीं का इम्तहान भी दे देते हैं!

कोचिंग को स्कूली शिक्षा पर तरजीह सरकारों ने देना शुरू किया और समाज ने भी उसे अधिक इज्जत बख्शी. सुशासन की सरकार के पहले दिनों में, जिसमें भागीदार आज का एक मात्र राष्ट्रवादी दल भी था, पटना की सडकों पर इस तरह के बैनर देखे गए कि पटना को कोटा बनाना है. जब राज्य की राजधानी अपनी शैक्षिक महत्त्वाकांक्षा यह रखे कि उसे कोटा का, जो कोचिंग के लिए बदनाम शहर है, पद प्राप्त करना है, फिर स्कूली शिक्षा की बात ही क्यों करें! उस वक्त भी न तो मीडिया और न विश्लेषकों ने खतरे की घंटी बजाई. जिन्होंने आलोचना की, उन्हें हारे हुए शिकायती कहकर बेइज्जत किया गया.

स्कूली शिक्षा के साथ इस दुर्घटना को सिर्फ बिहार तक सीमित रखकर समझना गलत होगा. आप दिल्ली के किसी भी स्कूल में जाएं, ग्यारहवीं कक्षा में छात्र प्राणी विज्ञान नहीं पढ़ता, मेडिकल सेक्शन में जाता है. जब स्कूल ने ही आत्मसमर्पण कर दिया, फिर आगे बात ही क्या करें! लेकिन आपने यह भी देखा होगा कि जिस स्कूल में पहली क्लास में दाखिला लेने के लिए एड़ी-चोटी एक कर दी जाती है, ग्यारहवीं में उसे छोड़कर ऐसे स्कूल की खोज की जाती है जहां हाजिरी की मजबूरी न हो!

मीडिया खुद से यह भी पूछे कि बिहार पर बात करते वक्त उसकी इतनी रुचि सिर्फ और सिर्फ ‘सुपर थर्टी’ में ही क्यों रहती है! और क्यों उसने ‘सुपर थर्टी’ से चौंधियाने की जगह कभी उसकी कायदे से पड़ताल नहीं की!

बिहार के शिक्षकों में कितने ऐसे होंगे जिन्होंने उन बीएड संस्थानों से डिग्री ली है, जिन्हें कॉलेज कहना ही उस शब्द का अपमान है. ये संस्थान हरियाणा, मध्य प्रदेश और दूसरे राज्यों में हैं, बिहार में नहीं. यह भी एक सवाल है कि क्यों दशकों से बिहार में शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान ठप्प कर दिए गए थे?

बेहतर हो कि बिहार की खबर से चौंकने और हैरान होने की जगह हम पीछे मुड़कर उन प्रक्रियाओं पर ध्यान दें जिनके बिना यह खबर बनने की नौबत न आती! यह शिक्षा मात्र के प्रति हमारे अपने नज़रिए का सवाल भी है.