लोकतंत्र के लिहाज़ से 1989 बेहद अहम साल था. ‘वॉरसॉ संधि’ (अमेरिका और उसके मित्र देशों के बीच नाटो संधि के जवाब में समाजवादी देशों की सामरिक संधि) से बंधे हुए देशों पर मास्को की पकड़ पहली बार इसी साल ढीली हुई थी. इसके बाद सोवियत रूस का विघटन हुआ और शीत युद्ध में अमेरिका की जीत हुई. जर्मनी को बीच में से चीर कर रखने देने वाली दीवार पर पहली बार इसी साल प्रहार हुआ था. इसके बाद पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी का एकीकरण हुआ. दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद वाली सरकार ने पहली बार 1989 में ही राजनैतिक बंदियों की रिहाई शुरू की थी जो एक साल बाद महान गांधीवादी नेल्सन मंडेला की रिहाई पर जाकर ख़त्म हुई.

अगर इन सारे मामलों पर नज़र डालें तो हम पाते हैं कि दुनिया भर में जनतंत्र मज़बूत होकर उभर रहा था. लोगों की आवाज़ बुलंद हो रही थी. प्रेस की आजादी और मुखर हो रही थी और नतीजतन सरकारें जनता के प्रति जवाबदेह हो रही थीं. पर चीन में इसी साल कुछ ऐसा घटित हुआ जिसने आने वाले कई सालों के लिए चीनी समाज का हुलिया बदल कर रख दिया और प्रजातंत्र की उम्मीद ख़त्म करके रख दी.

हुआ यह था कि चार जून, 1989 को चीनी सेना अपने ही लोगों के ख़िलाफ़ सडकों पर उतार दी गयी थी जिसने बीजिंग के तियानानमेन चौक पर सरेआम खून-ख़राबा कर दिया था. ये लोग राजनैतिक और आर्थिक सुधारों की मांग कर रहे थे. सभ्य समाज में ऐसा कम ही होता है कि देश की सेना अपने ही लोगों का क़त्लेआम कर दे. यह एक छात्र आंदोलन था जो बढ़ते-बढते जन आंदोलन बना और फिर जनतंत्र की प्राप्ति के लिए संघर्ष में तब्दील हो गया. इसकी परिणिति तियानानमेन चौक पर बहे उन सैकड़ों लोगों के खून से हुई जो उस वक़्त वहां जमा थे.

कारण

इसके पीछे चीन के राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक हालात थे और कुछ हद तक अमेरिका भी. जो हाल हिंदुस्तान की पंचवर्षीय योजनाओं का हुआ था कमोबेश वही या उससे बदतर हाल चीन के पंचवर्षीय कार्यक्रमों का हुआ था. सरकार की हर व्यापारिक और सामाजिक प्रतिष्ठान पर पकड़ थी. चीन की साम्यवादी सरकार के मुखिया माओत्से तुंग ने ‘सांस्कृतिक क्रांति’ की शुरुआत कर दी थी जिसके तहत देश में से ‘जनतांत्रिक’ विचारधारा के लोगों को अलग-थलग करके उन्हें निशाना बनाया जा रहा था. उन्होंने बचे-खुचे व्यापारिक माहौल को ख़त्म कर करके समाज पर तमाम बंदिशे लगा दी थीं. जिस तरह आजकल हमारे देश में ‘बजरंग दल’, ‘गोरक्षा दल’, ‘करनी सेना’, जैसे संगठन संस्कृति के स्वयंभू रक्षक बन गए हैं, कुछ वैसा ही काम वहां माओ द्वारा गठित ‘लाल गार्ड’ कर रहा था जिसका मकसद ‘लाल सलाम’ फैलाना था. माओत्से तुंग ने युवाओं को इस क्रांति में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने को प्रेरित किया.

इस सबका नतीजा यह हुआ कि देश तो पूरा ‘लाल’ हो गया पर अर्थव्यवस्था बेहाल हो गयी. पूरे चीन में ग़रीबी और अवसाद का माहौल फैल गया. माओ के बाद 1978 में सत्ता संभालने वाले देंग शियाओ पिंग ने अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए कम्युनिस्ट विचारधारा में से आर्थिक सुधारों की पतली गली निकाल ली. उनके सुधार कार्यक्रमों की वजह से चीन की अर्थव्यवस्था ने रफ़्तार पकड़ ली और समाज में आर्थिक संपन्नता आने लगी.

लेकिन जैसा कि हर प्रगतिशील समाज में होता आया है कि संपन्नता के साथ-साथ भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद भी बढ़ जाता है. खुली अर्थव्यस्था के साथ मुद्रास्फीति, गला काट प्रतिस्पर्धा में नौकरियों पर संकट, संसाधनों पर एकाधिकार जैसी समस्याएं जन्म ले लेती हैं. चीन में भी यही सब हुआ. साथ ही प्रेस और अभिव्यक्ति की पाबंदी ने समाज में एक अजीब सी घुटन पैदा कर दी.

घुटन का यह दबाव 1986-87 में एक छात्र आंदोलन के रूप में फूट पड़ा. यह आंदोलन भौतिकशास्त्री और यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नॉलॉजी के वाइस प्रेसीडेंट फ़ांग लिजी के जनतंत्रसमर्थक विचारों से प्रेरित था. दुनिया देख चुके इस वैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता ने अपने छात्रों को पश्चिम के खुलेपन से रूबरू करवाया. इसका परिणाम यह हुआ कि प्रतिबंधित समाज ने इस खुलेपन की अवधारणा को छात्रों की अगुवाई में अपने यहां लाने के प्रयास शुरू कर दिए.

अमूमन छात्रों में ‘समाजवाद’ और ‘साम्यवाद’ की अवधारणा प्रबल होती है. जो छात्र पहले ‘लाल सलाम’ चिल्ला रहे थे वे अब ‘प्रजातंत्र’ की बात करने लगे थे. प्रदर्शनों में प्रजातंत्र, तेज़ आर्थिक सुधार और न्यायप्रिय सरकार की मांग उठने लगी. चीनी सरकार के खुली अर्थव्यवस्था के आवरण के नीचे साम्यवाद का खौफ़नाक चेहरा ढका हुआ था जो इन प्रदर्शनों से डरने लगा था. 1989 के आते-आते असंतोष तेज़ी से फैलने लगा और अप्रैल और मई तक इसकी तपिश काफी बढ़ गई.

सरकार के सब्र का बांध टूटा

देंग शियाओ पिंग ने इस सबके के लिए कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव हू याओबेंग को ज़िम्मेदार माना और उन्हें हटा दिया. उनके हटने और फिर अचानक हुई मौत ने देश में माहौल गरमा दिया. छात्र खुलकर सरकार के विरोध में आ गए. हालात काबू से बाहर होते देख सरकार ने चीन में मार्शल लॉ लागू कर दिया और बड़े स्तर पर छात्र नेताओं और उनके रहनुमाओं की धरपकड़ चालू हो गई. इससे माहौल और बिगड़ गया.

मई, 1989 में ही सोवियत रूस की समाजवादी सरकार के मुखिया मिखाइल गोर्बाचेव चीन की यात्रा पर गए. गोर्बाचेव रूस में ‘ग्लासनोस्त’ और ‘पेरिस्त्रोइका’ नामक सुधार कार्यक्रम लागू कर रहे थे. ये भी समाज को आजादी देने और अर्थव्यवस्था में गति लाने से संबधित थे. इस दौरान बीजिंग के मुख्य चौक तियानानमेन पर छात्रों की घेराबंदी की ख़बर और उससे जुड़े आंदोलन ने दुनिया चीन की किरकिरी कर दी. तत्कालीन चीनी सरकार के मुखिया ली पींग इससे खासे नाराज़ हो गए. पहली जून को ली पींग ने पोलित ब्यूरो की मीटिंग में यह बात उछाल दी कि तियानानमेन चौक पर छात्र आंदोलन को अमेरिकी संस्था जासूसी संस्था सीआईए भड़का रही है. उनका कहना था कि अगर इस आंदोलन को कुचला नहीं गया तो चीन में साम्यवाद को ख़तरा हो सकता है. पोलित ब्यूरो को यह नागवार था.

चीन में होने वाले इस हादसे का अंदेशा मीडिया को हो गया था. इसका खुलासा उस वक़्त चीन में मौजूद बीबीसी संवाददाता के अपने लंदन दफ्तर को भेजे तार से भी होता है. इसमें लिखा था कि तियानानमेन के हालात पर देंग शियाओ पिंग ने चीनी मामलों के जानकार अमेरिकी प्रोफेसर स्टुआर्ट स्च्रम से कहा है कि 200 लोगों के ‘बलिदान’ से चीन में आने वाले कई सालों लिए स्थायित्व आ जाएगा जिससे आर्थिक सुधार कार्यक्रम को अमल में लाने के लिए काफी समय मिल जायेगा. तार में यह भी लिखा था कि अमेरिका को यकीन हो गया है कि चीनी सरकार ने कड़ी कार्यवाही का मन बना लिया है और सेना को हर स्थिति से निपटने का आदेश दे दिया गया है.

चार जून, 1989 को शाम के वक़्त तियानानमेन चौक पर हज़ारों छात्र और लोग शांतिपूर्वक आंदोलन कर रहे थे. तभी उन्होंने देखा कि सड़क पर फौजी टैंक और सैनिक धड़धड़ाते हुए चले आ रहे हैं. रात घिरने तक आंदोलनकारी घेर लिए गए थे. 10 बजे के आसपास सैनिकों ने गोलियां बरसना शुरू कर दिया. चीनी हतप्रभ रह गए थे. उन्हें कतई यकीन नहीं था कि सरकार सेना को अपने मुल्क के लोगों को मारने का हुक्म सुना देगी. एक अनुमान के हिसाब से इस गोलीबारी में 800-1000 लोग मारे गए.

चीनी राजनीति के जानकार एंड्रू जे नैथन के मुताबिक़ तियानानमेन चौक की घटना ने चीन में साम्यवाद को और मज़बूत कर दिया. नैथन के मुताबिक़ कम्युनिस्ट पार्टी ने इससे सीख लेते हुए अपनी पुलिस व्यवस्था में काफी बदलाव किए. आज इंटरनेट के प्रभाव से बचने के लिए वहां ‘इंटरनेट पुलिस’ भी है. इस हत्याकांड के बाद चीन के बाकी दुनिया से संबध काफी हद तक बिगड़ गए. कई देशों ने उस पर राजनैतिक और आर्थिक प्रतिबंध थोप दिए. लेकिन चीन के बड़े बाज़ार और तेज़ आर्थिक प्रगति ने बाद में सारे समीकरण बदलकर रख दिए. इस दमन चक्र के बाद भी चीन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेज़ी से उभरा और आज वह एक वैश्विक ताकत है.