जितनी यह बात सही है कि जंग विचारों, शक्तियों, संसाधनों और हथियारों के टकराव की कहानी होती है, उतनी ही यह बात भी सही है कि अंततः जीत किसी एक मुल्क के प्रधान की होती है. इसी तर्ज पर कहा और माना जा सकता है कि जंग जनरलों के अहम, दिमागी मज़बूती और एक दूसरे को छलकर जीतने की आत्मिक ख़ुशी की कहानी भी होती है. यहां राजा या प्रजा सिर्फ जंग के परिणाम को जीते हैं, वहीं एक जनरल सिर्फ़ जंग को जीता है.

दूसरे विश्वयुद्ध में छह जून, 1944 की तारीख जनरलों के बीच उस जंग की दास्तान है जिसने इस युद्ध का रुख मित्र देशों (अमेरिका और इंग्लैंड के सहयोगी देश, या अलाइड ताक़तें) की जीत की और कर दिया था.

पहले विश्वयुद्ध के चार मुख्य कारण थे. सामरिक गुटबाज़ी, उपनिवेशवाद, हथियारों की दौड़ और राष्ट्रवाद. आने वाले सालों में राष्ट्रवाद ने नस्लवाद का रूप ले लिया और साम्यवाद को मिटाने की चाह को इसमें जोड़ दिया गया. इस बीच दो नए उपनाम और उभर कर आए - फासीवाद और नाज़ीवाद. इन्हीं के चलते बाद में यूरोप के मुल्क एक बार फिर आपस में भिड़ गए और इस भिड़ंत को हम दूसरा विश्वयुद्ध कहते हैं.

नवम्बर, 1943 में हिटलर ने अपने जनरलों को एक गोपनीय दस्तावेज सौंपा - ‘डायरेक्टिव 51.’ इसमें अलाइड ताक़तों की फौजों के फ्रांस पर आक्रमण को ध्वस्त करने की रणनीति थी. इतिहासकार रॉबर्ट ग्रीन, अपनी क़िताब ‘युद्ध की तैंतीस रणनीतियां’ में लिखते हैं कि हिटलर युद्ध के निर्णय अपने पूर्वानुमान पर लेता था और अक्सर सही भी होता था. कई बार अलाइड सेना ने हिटलर को धोखे में रखने की कोशिश की, पर हर बार वो उनसे पार पा लेता. इस बार भी उसे यही यकीन था कि उसने दुश्मन के प्लान को समझ लिया है और उनका अगला बड़ा और निर्णायक हमला फ्रांस के तट ‘पा डी काले’ पर ही होगा क्यूंकि यहां से इंग्लैंड की दूरी सबसे कम है.

‘डायरेक्टिव 51’ में हिटलर ने अपने कमांडरों को आगाह किया कि वे अलाइड ताक़तों के इस प्लान को समझें. अब तक हिटलर यूरोप के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर चुका था. इसकी सुरक्षा के लिए उसने फ्रांस से नार्वे तक तटीय इलाके में दीवार और किले के साथ एक सुरक्षा व्यवस्था बनाई थी. इसे अटलांटिक दीवार के नाम से जाना जाता था. इनके बूते वह लंबे अरसे से अलाइड ताकतों को हमला करने से रोकता आ रहा था.

जर्मन जनरल रोम्मेल ‘अटलांटिक दीवार’ की तस्दीक करते हुए

हिटलर को जब इस ताजा हमले की योजना का पता चला तो उसने कार्ल वोन रुन्स्देट और एर्विन रोम्मेल जैसे काबिल जनरलों को फ्रांस के तट पर तैनात कर दिया. रोम्मेल ने पूरे इलाके में टैंकरोधी माइंस बिछाकर कर उसे अभेद्य बना दिया था. उन दोनों ने रणनीति के तहत हिटलर से और फौज फ्रांस भेजने की अपील की. हिटलर इन दिनों अपने ही अफ़सरों से आशंकित रहता था क्यूंकि कई बार उस पर जानलेवा हमले हुए थे, इन्हें वो यकीन से तो नहीं पर अंदाज़े से अपने ही अफ़सरों की चाल समझता था. अब वो खुद पर ही सबसे ज़्यादा भरोसा करता और अकेले ही निर्णय लेता. चूंकि हिटलर के पास यह जानकारी भी थी कि अलाइड ताक़तें बाल्कन प्रदेशों पर हमला कर सकती हैं जो उसके लिए काफी महत्वपूर्ण थे, लिहाज़ा उसने रोम्मेल और वोन रुन्स्देट की मांग ठुकरा दी.

जैसे-जैसे हिटलर ख़ुफ़िया जानकारी समझ पा रहा था, अपने दिमाग में फ्रांस की लड़ाई का ख़ाका बना रहा था. इसके मुताबिक ‘पा डी काले’ यकीनन जंग का मैदान बनने वाला था क्यूंकि उसे इंग्लैंड के दक्षिणी तट, जो ‘पा डी काले’ से बिलकुल नज़दीक था, पर अमेरिका की एक महत्वपूर्ण सैन्य टुकड़ी मौजूद होने की जानकारी दी गई थी. इसके कमांडर थे - महान जनरल जॉर्ज पैटन. पैटन पहले विश्वयुद्ध में काफी नाम कमा चुके थे. हिटलर को अगर किसी से खौफ़ था तो वो पैटन थे. उसे पैटन द्वारा तैनात टैंक डिवीज़न की तसवीरें भी दिखाई गईं. अब अगर ऐसा सेनापति किसी मोर्चे पर है तो यह समझना कि जंग कहां होने वाली है, कोई बड़ी बात नहीं थी.

अब हमले का दिन और समय मालूम करना बाकी था. हिटलर के पास जासूसों की दो अलग-अलग रिपोर्ट थीं. पहली के मुताबिक अलाइड ताक़तें पांच से सात जून के बीच नॉर्मेंडी तट पर हमला बोलने जा रही थीं और दूसरी के मुताबिक जर्मन जासूसों ने कुछ दिन पहले इंग्लैंड के जनरल सर बर्नार्ड मोंतोगोमेरी को जिब्राल्टर में और फिर अल्जिएर्स में देखा था. ये दोनों ही जगह अफ्रीका से सम्बंधित हैं. इतना बड़ा सेनापति अगर युद्ध के मैदान से इतना दूर है तो इसका यह निष्कर्ष निकाला गया कि जंग या तो जून के आख़िरी हफ़्ते या जुलाई के पहले हफ़्ते में होगी. पहली ख़बर को ‘डबल क्रॉस’ मानकर ठुकरा दिया गया.

पांच जून 1944 की रात हिटलर को अचानक ख्याल आया कि कहीं फ्रांस का नॉर्मेंडी तट तो जंग का मैदान नहीं बनने जा रहा है? आख़िरकार यह निर्णायक जंग होने वाली थी. वह सोच ही रहा था कि तभी उसके पास मौसम की जानकारी आई कि इंग्लिश चैनल में उस शाम को तूफ़ान आने की प्रबल संभावना है. नॉर्मेंडी तट इंग्लिश चैनल के नज़दीक ही था. तो इसका मतलब साफ़ था कि लड़ाई ‘पा डी काले’ में ही होनी है.

अब हिटलर ने पूरा प्लान समझ लिया था. जगह ‘पा डी काले’, और समय जून का आख़िरी या जुलाई का पहला हफ्ता. वह पूरी तरह तैयार था क्योंकि कार्ल वोन रुन्स्देट और रोम्मेल वहीं तैनात थे. कहते हैं, ‘जंग सिर्फ पच्चीस वर्ग इंच के मैदान में लड़ी जाती है.’ यह वो मैदान है जिसे इंसानी दिमाग कहा जाता है. हिटलर को यकीन हो गया था कि उसने जंग जीत ली है. वह खुद को इस पच्चीस वर्ग इंच के मैदान में विजेता की तरह देख रहा था. इस सुकून के साथ उसने नींद की गोलियां खाईं और सो गया!

अगली सुबह, यानी छह जून, 1944 को जब हिटलर उठा तो उसके पैरों तले से ज़मीन खिसक गयी! उसे बताया गया कि भयंकर तूफ़ान के बीच अलाइड ताक़तों ने नॉर्मेंडी तट पर हमला बोल दिया है. दिन होते-होते पूरी ख़बर आ चुकी थी कि नॉर्मेंडी से कुछ दूर, दक्षिण-पूर्व फ्रांस के चेरबोर्ग में अलाइड ताक़तों ने हमला बोला है. यह निर्णायक समय था. कार्ल वोन रुन्स्देट और रोम्मेल ने हिटलर को सन्देश भेजकर सेना को नॉर्मेंडी भेजने की इजाज़त मांगी. उन्हें यकीन था कि वो अब भी जंग जीत सकते हैं.

पूरे दिन हिटलर कोई निर्णय नहीं ले पाया. आख़िरकार जब वो सेना को नॉर्मेंडी भेजने का फैसला लेने ही वाला था, तब उसे खबर मिली कि जॉर्ज पैटन के सैनिकों ने हलचल बढ़ा दी है और वे कभी भी हमला कर सकते हैं. उसने फिर जंग में तैनात अपने सेनापतियों की बात नहीं मानी! उफ़!, क्या मुश्किल थी उसकी! वो जो ज़िदगीभर दुश्मनों की चालों को पहले ही भांप लेता था, वो जो किसी और के ज्ञान के बजाए अपने पूर्वानुमान को तरजीह देता था, वो जिसके पास रोम्मेल और वोन रुन्स्देट जैसे काबिल जनरल थे, वो आदमी जंग में सिर्फ़ ‘ढोल’ पीटने वाले जॉर्ज पैटन से हार गया था! पैटन ने सिर्फ जंग का नाटक किया था. जिस टैंक डिवीज़न की तस्वीरें हिटलर को दिखाई गई थीं वे सब नकली टैंक (नीचे तस्वीर) थे! हिटलर अलाइड ताक़तों की चालों को समझ ही नहीं पाया.

अलाइड ताक़तों ने पहले नॉर्मेंडी पर फ़तह पाई और फिर फ्रांस पर. यहीं से हिटलर का पतन शुरू हो गया था. इसलिए छह जून, 1944 को दुनिया डी-डे के रूप में मानती है. फौज में इसका मतलब है ‘वो दिन’ जब हमला होता है!