धर्मेन्द्र राजमंगल सत्याग्रह के नियमित पाठक हैं और उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में रहते हैं.


यह बात तब की है, जब मैं कोई दस-बारह साल का था. हमारे गांव में विरजपाल नाम का एक आदमी रहता था. वह कुछ ऊंचा सुनता था. इस बात का फायदा उठाकर लोग उससे मजाक किया करते थे. उसके साथ उसकी पत्नी सुंदरी भी रहती थी. सुंदरी गांव वालों के बीच हमेशा चर्चा में रहती थी. अपने नाम से अलग, दिखने में वह गांव की बाकी औरतों जैसी ही थी, यानी सामान्य रंग-रूप, दुबला-पतला शरीर और छोटा कद.

सुंदरी की कुछ हरकतों की वजह से लोग उसको सनकी समझा करते थे. अगर उसे कोई जरा सा भी चिढ़ा दे तो वह गालियां देने लगती थी और इस तरह गांव वालों के लिए मनोरंजन का जरिया बन जाती थी. वहीं अगर कोई उसके घर जाए तो जो भी उसके हाथ में हो, फेंक कर मार देती थी. इस वजह से लोग जबर्दस्ती उसके घर के सामने खड़े होकर भी उसे परेशान करते थे. जैसा कि मैंने बताया यह सब उनके लिए मनोरंजन था लेकिन कभी जब सुंदरी की फेंकी हुई कोई चीज उन्हें लग जाती तो वे विरजपाल से शिकायत करने में देर न लगाते. इसके बाद विरजपाल सुंदरी को बहुत मारता और वह गालियां देती हुई देर तक रोती रहती. ऐसी घटनाएं तो पूरे गांव के लिए तमाशा बन जाती थीं.

इसके अलावा भी सुंदरी का एक रूप था जिससे मैं वाकिफ था. दरअसल उसकी कोई संतान नहीं थी. विरजपाल जब मजदूरी करने दिनभर के लिए बाहर चला जाता तो सुंदरी को भी अपने घर में कोई काम नहीं रहता और समय काटने वह हमारे घर आ जाया करती थी. वो मां के साथ घंटों बैठती, उनके सिर में तेल डालती और उनके साथ चावल की बिनाई भी करवा लेती थी. इस दौरान मुझे उसकी बातों में कुछ भी असामान्य न लगता, यहां तक कि कई बातें समझदारी भरी ही लगतीं. और सच बात तो यह है कि उससे प्यार से पेश आने पर वह बहुत हंसी-खुशी के साथ जवाब देती थी. मैं उसे चाची कहकर बुलाता था.

एक दिन की बात है. मैं घर के दरवाजे पर बैठा था. मेरे साथ चार-पांच लड़के और थे. तभी सुंदरी ने मुझे बुलाया. उसे मुझसे कोई दिक्कत नहीं थी. न मैंने उसे कभी चिढ़ाया था और न उसने मुझे कभी कुछ फेंककर मारा. हालांकि उस दिन सुंदरी के घर पहुंचकर मैं थोड़ा डर गया जब उसने मुझे बताया कि उसके कमरे में भूत है. उसका एक कमरे वाला घर कुछ यूं बना था कि दिन में भी वहां अधेरा रहता था. लेकिन सुंदरी ने मुझे भरोसा करके बुला लिया था और साथ में मेरे कुछ दोस्त भी थे तो हौसला कायम था. आखिरकार मैंने टॉर्च ली और डरते-डरते उसके कमरे में घुसा, और पाया कि वहां डराने लायक तो कोई चीज मौजूद नहीं थी.

लेकिन कुछ ही देर बाद सुंदरी कहने लगी कि घर के चूल्हे में बनी चिमनी में भूत है. अचानक मुझे गांव वालों की बात सही लगने लगी कि वो सनकी या पागल है. इसी वक्त मुझे भी शरारत सूझी और मैंने उससे कहा कि अगर वो चूल्हा तोड़ दे तो भूत अपने आप भाग जाएगा. सुंदरी ने ऐसा ही किया और मैं अपने दोस्तों के साथ उछल-कूदकर उससे चूल्हा तुड़वाता रहा.

इसके बाद हम सारे बच्चे अपने-अपने घर आ गए. रात के समय जब विरजपाल मजदूरी से लौटा तो उसने देखा कि घर में खाना नहीं बना है और चूल्हा-चिमनी भी टूटे पड़े हैं. उसका माथा ठनक गया क्योंकि उसने दो दिन की दिहाड़ी छोड़कर चूल्हा-चिमनी बनाया था. विरजपाल ने सुंदरी को बुलाकर पूछा, ‘यह सब किसने किया?’ सुंदरी अपने ही अंदाज़ में बोली, ‘मैंने तोड़ा. इसमें भूत था तो तोड़ दिया.’ इतना सुनते ही विरजपाल ने आपा खो दिया और सुंदरी को बुरी तरह पीटने लगा. मार खा रही सुंदरी बेतरह चीख रही थी. इस शोरगुल में सारा गांव जाग चुका था, हम बच्चे भी. उस दिन ऐसा लगा कि गांव वाले इस घटना को मनोरंजन की तरह नहीं देख रहे हैं. ऐसा लग रहा था जैसे विरजपाल सुंदरी की जान लेकर ही छोड़ेगा. आखिरकार गांव की महिलाएं आगे आईं और उन्होंने सुंदरी को बचाया.

इस घटना को लेकर फिर अगले दिन पंचायत बैठी. पंच-सरपंच ने विरजपाल को बुरी तरह डांटा. मुखिया ने सख्त लहजे में उससे कहा, ‘अगर तुम सुंदरी को ठीक से नहीं रख सकते तो उसे उसके घर छोड़ आओ... आखिर हर दूसरे दिन उसे कब तक पीटते रहोगे?’ विरजपाल ने पंचायत की बात मान ली और वह सुंदरी को वापस उसके गांव भेजने के लिए तैयार हो गया.

दरअसल सुंदरी बिहार के किसी गांव की थी. उसी समय मुझे पता चला कि उसके मां-बाप बहुत गरीब थे. घर में खाने को भी नहीं था तो लड़की की शादी कैसे करते? इसलिए विरजपाल से कुछ पैसे लेकर उन्होंने उसे अपनी बेटी सौंप दी थी. यानी सुंदरी बेची-खरीदी गई थी. गांव वालों के मुताबिक उस समय सुंदरी की उम्र काफी कम थी. उनका यह भी कहना था कि बचपन में ही मां-बाप के बिछोह और तिस पर विरजपाल की रोज-रोज की मार से उसका मानसिक संतुलन थोड़ा गड़बड़ा गया था.

खैर, विरजपाल दूसरे दिन उसे बिहार पहुंचाने चल दिया. उस दिन न तो गांव का कोई आदमी उसे चिढ़ा रहा था, न सुंदरी गालियां दे रही थी. वह भी खुशी-खुशी सब औरतों के पैर छूती हुई चल दी. गांव में ज्यादातर लोग उसके जाने से दुखी थे. सबसे बुरी हालत मेरी थी. मैं पछतावे से सिर धुन रहा था. सोच रहा था कि न मैं उसका चूल्हा तुड़वाता और न वह गांव से जाती. उस समय मैंने खुद को यह कहकर बहला लिया कि जब मैं बड़ा हो जाउंगा तो सुंदरी के गांव जाऊंगा, उससे मिलूंगा. वह मुझसे मिलकर बहुत खुश होगी. लेकिन बाद में समझ आया कि ऐसा हो पाना नामुमकिन है.

कभी-कभी यह सोचकर डर भी लगता है कि अगर कहीं वह दोबारा बेच दी गई होगी तो? जाने क्या हुआ होगा उसका. उस घटना के बाद कई बार मुझे लगा कि मजाक की कीमत कभी-कभी जिंदगीभर का पछतावा भी हो सकती है.

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