मध्य प्रदेश के मुरैना से जब आप राजस्थान में प्रवेश करते हैं तो धौलपुर शहर से करीब पांच किलोमीटर पहले चंबल नदी पर एक पुल पड़ता है. पुल से नीचे की तरफ आपको धौलपुर राजघराने के शाही निशान लगे टेंट हाउस के साथ स्टीमर्स दिखाई देते हैं. ये खासतौर पर महल (अब होटल में बदल चुका है) में ठहरने वाले विदेशी पर्यटकों को चंबल नदी की सैर करवाने के काम में लाए जाते हैं. यह होटल धौलपुर राजघराने की बहू और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की संपत्ति का हिस्सा है.

यह जगह इसलिए भी खास है कि यहां राष्ट्रीय घड़ियाल अभयारण्य स्थित है. स्थानीय पत्रकार कहते हैं कि इस तरह किसी अभयारण्य में निजी स्टीमर को चलाना गैरकानूनी है, लेकिन जब मामला मुख्यमंत्री से जुड़ा हो तो... खैर, यह चर्चा कभी और. जब आप इन स्टीमर्स से थोड़ा और आगे देखते हैं तो वहां का नज़ारा आपको हैरत में डाल सकता है. तैरने वाले ट्यूब पर बैठे दर्जनभर युवक नदी में कुछ खंगालते नज़र आते हैं. युवकों की यह कवायद मौत के खेल सरीखी है, क्योंकि संरक्षित क्षेत्र होने के कारण घड़ियालों के साथ कई बड़े मगरमच्छ भी यहां विचरण करते हैं.

तो फिर क्या वजह है कि ये लोग जान पर खतरा होने के बावजूद यहां मौजूद हैं? दरअसल देश की दूसरी नदियों की तरह यहां भी रिवाज है कि जब कोई पुल के ऊपर से गुजरता है तो श्रद्धावश नदी में एक-दो-पांच रुपये के सिक्के डाल जाता है. इन्हीं चंद सिक्कों को पाने के लिए ये युवक अपनी जान की परवाह न कर पूरे दिन चंबल में डेरा डाले रहते हैं. जबकि दो साल पहले ही ऐसे युवकों में शामिल 45 वर्षीय रघुवीर को एक मगरमच्छ देखते ही देखते पानी में खींच ले गया था. परिवार वालों को उसकी लाश भी नहीं मिल पाई थी.

यहीं किनारे पर मवेशी चराते बुजुर्ग रामशरण बताते हैं, ‘कोई भी अपने बच्चे को मरता हुआ नहीं देखना चाहता... लेकिन पेट के लिए सब करना पड़ता है.’ हम चंबल किनारे जिस गांव में खड़े हैं उसे राजघाट कहा जाता है. रामशरण गांव के इस नामकरण की वजह बताते हैं, ‘पुराने जमाने में राजा-महाराजा इस घाट पर नहाने आते थे, सो इसका नाम राजघाट पड़ गया.’ राजा-महाराजाओं से संबंधित होने के कारण ऐसा लग सकता है कि यह इलाका ठीक-ठाक संपन्न होगा, लेकिन इसके उलट यह गांव आज तक कई बुनियादी सुविधाओं से महरूम है. रामशरण कहते हैं, ‘हमें अपनी रानी (वसुंधरा राजे) से काफी उम्मीदें थीं, लेकिन उन्होंने भी आज तक कोई सुध नहीं ली.’

गांव के ऊंचे-नीचे टीलों पर बने कच्चे घर, बकरियां चराते बच्चे, घरों में काम करती बेटियां (घरों में काम करते हुए नई उम्र की बहुएं नहीं दिखती और इसकी भी एक त्रासद वजह है जो हम आगे बताएंगे) और कुछ वृद्ध महिलाओं और पुरुषों के बुझे चेहरे यहां की दयनीय स्थिति का अहसास दिलाने के लिए काफी हैं. गांव में आज तक बिजली नहीं पहुंची है और पानी की व्यवस्था के नाम पर एक सरकारी हैंडपंप है. इसका पानी इतना खारा है कि इसे किसी धातु के बर्तन में आधे घंटे के लिए भी रखने पर इसमें लालिमा दिखने लगती है. यहां आकर लगता है जैसे चंबल के बीहड़ों में बसा यह गांव राजमार्ग से कुछ सौ मीटर नहीं बल्कि वक़्त की दौड़ में उस सड़क से कई सौ साल पीछे रह गया है.

घर का काम करती बच्चियां : फोटो क्रेडिट- पुलकित भारद्वाज
घर का काम करती बच्चियां : फोटो क्रेडिट- पुलकित भारद्वाज

अपनी तकलीफों के बारे में बात करते हुए कई लोगों का गला भर आता है. अधेड़ उम्र के बहादुर सिंह कहते हैं, ‘छोटी उम्र में हम लोग बकरियों का दूध बेचकर और लकड़ियां काटकर गुज़र करते थे और अब शहर जाकर मजदूरी करते हैं.’ पढ़ाई-लिखाई के बारे में पूछने पर पता चलता है कि गांव में पांचवी तक का स्कूल है, आगे की पढ़ाई के लिए दूसरे गांव जाना पड़ता है. बरसात के तीन-चार महीने चंबल उफान पर रहती है तो गांव का संपर्क सड़क से पूरी तरह टूट जाता है. लिहाजा बच्चे स्कूल नहीं जा पाते और इतने दिनों में उनका नाम स्कूल से कट जाता है. यानी यहां रहकर बच्चों का पढ़ना तकरीबन नामुमकिन है.

बकरियां चराते बच्चे : फोटो क्रेडिट- पुलकित भारद्वाज
बकरियां चराते बच्चे : फोटो क्रेडिट- पुलकित भारद्वाज

यही नहीं कुछ गांव वालों के लिए ये तीन-चार महीने जानलेवा भी साबित होते हैं. गांव के एक युवा राजकुमार बताते कि अगर बरसात के समय कोई गंभीर रूप से बीमार हो जाए तो उसकी जान पर बन आती है क्योंकि इस दौरान मरीज को शहर ले जाना मुमकिन नहीं हो पाता.

हमने ऊपर रिपोर्ट में जिक्र किया है कि इस गांव में बहुएं काम करते हुए नहीं दिखतीं. एक बुजुर्ग महिला रामवती इसकी वजह का खुलासा करती हैं, ‘दूसरी सहूलियतों की बात कौन करे, हमारे गांव में राशन की दुकान तक नहीं है. ऐसे में कोई भी दूसरे गांव वाला यहां बेटी का ब्याह नहीं करता. पूरे गांव में कम से कम 50 ऐसे लड़के हैं, जिनकी शादी के इंतजार में उमर बीती जा रही है.’ स्थानीय मीडिया की मानें तो बीते एक-डेढ़ दशक में यहां सिर्फ दो शादियां हुई हैं.

इसी बीच पास खड़े एक व्यक्ति से हम पीने के लिए पानी मांगते हैं. इसकी प्रतिक्रिया में हमें राजघाट की एक और भयावह तस्वीर देखने को मिलती है. एक ग्रामीण बताते हैं, ‘बाऊजी, यहां आपके पीने लायक पानी तो नहीं मिल पाएगा.’ क्यों के जवाब में वे जानकारी देते हैं कि चंबल में मरे हुए जानवर बहाए जाते हैं और कई बार ये जानवर नदी के किनारे पर अटक जाते हैं. यही नहीं चंबल में इंसानी लाशें भी बहाई जाती हैं. मरे जानवरों की तरह, इन लाशों को भी लकड़ी से यहां-वहां करके ये लोग पीने और बाकी निस्तार के लिए नदी का पानी भरते हैं. इसके अलावा यहां भारी कीचड़ जमा होने से पानी मटमैला और बदबूदार होता है, जिसे छानकर ये लोग अपनी गुजर करते हैं. मुसीबत ये है कि इस किनारे से दूर जाने पर मगरमच्छों का खतरा बढ़ जाता है.

अंदर तक झकझोर देने वाली यह सच्चाई राजस्थान में जल स्वावलंबन योजना के नाम पर प्रचारित तमाम सरकारी दावों की धज्जियां उड़ाती नजर आती है. इस योजना के पहले चरण में प्रदेश सरकार खासतौर पर पेयजल उपलब्ध करवाने के लिए 1270 करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है, जबकि 2000 करोड़ रुपए की लागत के साथ इसका दूसरा चरण भी कुछ समय में पूरा होने वाला है.

चंबल किनारे कीचड़ में से पानी भरते और खेलते बच्चे : फोटो क्रेडिट- पुलकित भारद्वाज
चंबल किनारे कीचड़ में से पानी भरते और खेलते बच्चे : फोटो क्रेडिट- पुलकित भारद्वाज

ग्रामीण बताते हैं कि गंदा पानी पीने से गांव के कई लोग बीमारियों की चपेट में आकर अकाल मौत के हवाले हो चुके हैं. इसी होली पर अपनी जान गंवाने वाला 20 वर्षीय कालू उन्हीं अभागों में से एक था. मेडिकल रिपोर्ट के मुताबिक उसके दोनों गुर्दे संक्रमित पानी पीने से खराब हो गए थे. सुबकते हुए कालू की मां नारायणी कहती हैं, ‘मैं बस देखती रह गई भइया, करने को मेरे बस में कुछ नहीं था... कुछ ही दिन पहले कालू के पिताजी गुजरे थे... अब तो मेरे सहारे को कोई नहीं है...’

इन मुश्किल हालात से हताश राजघाट के लोग अब यहां से पलायन करने लगे हैं. रायपुर (छत्तीसगढ़) में काम करने वाले कल्लू सिंह का कहना है, ‘मैंने छत्तीसगढ़ में भी हमारे राजघाट जैसा गांव नहीं देखा. यहां रहता तो मेरे बच्चे भी बकरियां चराते, उनका दूध बेचते और कच्चे घर में रहते. लेकिन वहां मैंने घर भी बनवा लिया है और बड़ा बेटा 12वीं में पढ़ता है.’

कल्लू सिंह आगे कहते हैं, ‘देश में आधार कार्ड जरूरी हो गया है लेकिन हमारे गांव में किसी को राशन कार्ड तक नहीं मिला. हमने बहुत कोशिश की अपनी बात रखने की, लेकिन हर जगह दाब-धौंस दिखाकर हमें चुप करा दिया गया. प्रधानमंत्री मोदी गांवों को गोद लेने की बात करते हैं. हमारी विधायक, कलेक्टर और मुख्यमंत्री तीनों ही महिलाएं हैं, जिस नाते वे गोद लेने के मतलब शायद ज्यादा समझती होंगी. लेकिन हम तो आज तक अनाथ ही हैं.’

बकरियों के लिए चारा इकठ्ठा करते नन्हे भाई-बहन : फोटो क्रेडिट- पुलकित भारद्वाज
बकरियों के लिए चारा इकठ्ठा करते नन्हे भाई-बहन : फोटो क्रेडिट- पुलकित भारद्वाज

ग्रामीण बताते हैं कि सरकार का ध्यान खींचने के लिए उन्होंने चार महीने पहले हुए धौलपुर उपचुनाव का बहिष्कार करने की घोषणा की थी. लेकिन जब भाजपा की प्रत्याशी शोभारानी की जीत संदिग्ध होने लगी और यह चुनाव मुख्यमंत्री राजे की नाक का सवाल बन गया, तब प्रदेश के कई बड़े मंत्री राजघाट तक पैदल चल कर आए थे और गांव की स्थिति बदलने का आश्वासन दिया था. शोभारानी तो जीत गईं, लेकिन उसके बाद किसी ने गांव की सुध नहीं ली.

राजघाट के लोगों का कहना है कि तमाम विपरीत हालात के बीच सिर्फ एक अश्विनी पाराशर हैं जिनसे कुछ उम्मीद जुड़ी है. जयपुर से मेडिकल की पढ़ाई कर रहे 22 वर्षीय युवा अश्विनी पिछले साल अपने दोस्तों के साथ ‘सार्थक दिवाली’ कैंपेन के तहत राजघाट आए थे. तब इन लोगों ने गांव-गांव जाकर जरुरतमंदों को कपड़े और मिठाइयां बांटी थीं. वहीं राजघाट का हाल देखकर अश्विनी ने इस गांव को बचाने की ठान ली और #save rajghat नाम से एक सोशल मीडिया कैंपेन शुरु कर दिया.

इतना ही नहीं इस मेडिकल छात्र ने राजस्थान हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की है कि प्रदेश सरकार राजघाट के तीन सौ लोगों के जीने के अधिकार को पूरा नहीं कर पा रही है. इससे पहले उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय को भी खत लिखकर गांव के हालात के बारे में बताया था. इसके बाद स्थानीय महकमों में कुछ समय के लिए हलचल बढ़ गई थी, हालांकि जमीन पर हालात जस के तस ही रहे.

बच्चे को गोद में लिए अश्विनी और उनके दोस्त
बच्चे को गोद में लिए अश्विनी और उनके दोस्त

अश्विनी बताते हैं, ‘चूंकि राजघाट धौलपुर शहर के नजदीक स्थित है इसलिए यह नगरपालिका के अंतर्गत आता है यानि एक तरह से शहर का ही हिस्सा है. प्रशासन गांव में किसी भी विकास कार्य से बचने के लिए घड़ियाल अभयारण्य का हवाला देता है. लेकिन यदि ऐसा है तो गांव में सरकारी स्कूल कैसे बन गया? इसके अलावा चंबल के किनारे स्थित दूसरे कई गांवों में बिजली-पानी समेत सारी सुविधाएं मौजूद हैं. एक बार प्रशासन का तर्क मान लिया जाए तो भी कुछ टैंकर भिजवाकर कम से कम साफ पानी और सोलर पैनल लगाकर बिजली तो उपलब्ध करवाई ही जा सकती है.’

राजघाट के इन स्थितियों को लेकर हमने धौलपुर जिला कलेक्टर शुचि त्यागी से बात करने की कोशिश की थी. फोन पर हुई बातचीत में वे कुछ देर तो सहज रहीं लेकिन राजघाट का नाम सुनते ही सवालों को टाल गईं. तब लगा कि शायद विधायक शोभारानी इस बारे में कुछ जवाब दे पाएंगी, लिहाजा हमने उनसे बात करने की कोशिश की. हमारे सवालों के बदले उन्होंने हम से ही ऐसा कुछ पूछ लिया, जिसके बाद उनसे कहने के लिए हमारे पास कुछ नहीं था. उनका सवाल था, ‘राजघाट! क्या यह गांव धौलपुर में है…?’