बीते सोमवार को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी अध्यक्ष पद के लिए नामांकन पर्चा दाखिल किया था. देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के इस अहम पद के लिए राहुल गांधी की उम्मीदवारी को किसी अन्य ने चुनौती नहीं दी है. ऐसे में 19 दिसंबर को उनका निर्विरोध अध्यक्ष चुना जाना तय है. इससे पहले निवर्तमान अध्यक्ष सोनिया गांधी ने साल 1998 में इस पद की जिम्मेदारी संभाली थी.

राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनना तय होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस को सीधे निशाने पर लिया. उन्होंने सोमवार को ही गुजरात की एक चुनावी सभा में कहा था, ‘मैं कांग्रेस को उनके औरंगज़ेब राज की बधाई देता हूं. लेकिन हमारे लिए लोग मायने रखते हैं. देश की 125 करोड़ जनता हमारी माई-बाप हैं.’ नरेंद्र मोदी ने ये बातें कांग्रेस के नेता (फिलहाल निलंबित) मणिशंकर अय्यर के एक बयान के जवाब में दिया था. मणिशंकर अय्यर ने कहा था, ‘जब शाहजहां ने जहांगीर की जगह ली तो क्या कोई चुनाव हुआ था? और जब शाहजहां की जगह पर औरंगजेब आया तो क्या चुनाव हुआ था? यह सभी जानते हैं कि राजाओं का ताज उनके बेटों के सिर पर ही रखा जाता है.’

गुजरात चुनाव के बीच देश की 132 साल पुरानी पार्टी की कमान राहुल गांधी के हाथों में आना तय होने को लेकर देश के प्रमुख अखबारों ने संपादकीय के जरिए अपने-अपने विचार रखने की कोशिश की है. साथ ही, आने वाले दिनों में राहुल गांधी की चुनौतियों का भी जिक्र किया है. इसके अलावा एक अखबार ने कांग्रेस के इतिहास में सबसे अधिक वक्त तक अध्यक्ष रहीं सोनिया गांधी के कार्यकाल का भी उल्लेख किया है.

द टाइम्स ऑफ इंडिया का इस मुद्दे पर कहना है कि यदि आने वाले दिनों में राहुल गांधी कांग्रेस को उबारना चाहते हैं तो उन्हें देश को आगे बढ़ाने का एक अलग और साफ खाका पेश करना होगा. अखबार ने संपादकीय में कहा है कि भाजपा इस वक्त सांस्कृतिक रूप से रूढ़िवादी कार्यक्रमों-योजनाओं की तरफ ज्यादा ध्यान दे रही है. कांग्रेस के लिए यही वो मौका है जब वह युवाओं और भारतीयों के उस तबके को आकर्षित कर सकती है जो कुछ नया करना-बनना चाहता है. राहुल गांधी के नेतृत्व की असली परीक्षा यहीं होगी कि वे इस मौके को समझने के साथ भुना पाते हैं या नहीं. साथ ही, कांग्रेस को मुश्किल वक्त में भी पार्टी के साथ बने रहने वाले अपने जमीनी कार्यकर्ताओं नई जान फूंकने की जरूरत है. बीते कुछ वक्त से इनके बीच यह विश्वास मजबूत हुआ है कि उनके लिए पार्टी में आगे बढ़ने के बहुत कम मौके हैं.

जनसत्ता का कहना है कि राहुल गांधी के राजनीति में कदम रखने के साथ ही इसकी संभावना बन गई थी कि वे एक दिन कांग्रेस अध्यक्ष बनेंगे. पार्टी में परिवादवाद को लेकर अखबार ने लिखा है कि लंबे वक्त से कांग्रेस में इस रास्ते पर चलती रही है. इसे देखते हुए काफी पहले से ही कांग्रेसी नेता और कार्यकर्ता राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष बनाए जाने की मांग करते आ रहे थे. इसके आगे अपने संपादकीय में अखबार ने सवाल उठाया है कि क्या इससे कांग्रेस और देश की राजनीति में कोई फर्क पड़ेगा? बीते कुछ महीनों से देखने में आया है कि राहुल गांधी पहले की तुलना में अधिक सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं. हालांकि, इसके साथ उनके सामने चुनौतियां भी बड़ी हैं. राहुल गांधी को बतौर अध्यक्ष पार्टी संगठन में नई जान फूंकनी है.

हिन्दुस्तान का राहुल गांधी की पदोन्नति के बारे में कहना है कि इस वक्त विरोधी दलों (खासकर भाजपा) के बड़े नेताओं का उनपर की गई टिप्पणियां बताती हैं कि सभी ने कांग्रेस के सबसे बड़े नेता के रूप में उन्हें स्वीकार कर लिया है. अखबार ने अपने संपादकीय में सोशल मीडिया पर राहुल गांधी की उपहास उड़ाने लायक छवि का भी जिक्र किया है. हिन्दुस्तान का मानना है कि अब पार्टी अध्यक्ष के तौर पर उन्हें अपना कद इतना बढ़ाना होगा कि ये सारे उपहास बौने पड़ जाएं. इस संपादकीय के आखिर इस पर जोर दिया गया है कि चुनावों में जीत अधिक महत्वपूर्ण नहीं है. विपक्ष में रहते हुए भी कांग्रेस यदि राष्ट्रीय पार्टी के रूप में मजबूत होती है तो वह हमारे लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत होगा.

द इंडियन एक्सप्रेस ने राहुल गांधी के बहाने सोनिया गांधी की राजनीतिक कैरियर पर चर्चा की है. अपने संपादकीय में अखबार ने पार्टी अध्यक्ष के रूप में उनके 19 साल के लंबे कार्यकाल को उल्लेखनीय करार दिया है. इसमें आगे कहा गया है कि पार्टी अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभालने के बाद उन्होंने इसके बिखराव को रोकने में कामयाब हुई. साथ ही, साल 2004 का चुनाव कांग्रेस के लिए अहम साबित हुई. इस चुनाव में जीत हासिल करने के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री के पद से किनारा कर लिया. हालांकि, सोनिया गांधी के नेतृत्व में केंद्र सरकार के समानांतर राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसए) के गठन ने प्रधानमंत्री कार्यालय के कद और अधिकार को कम करने के साथ सरकार को भी कमजोर करने का काम किया. द इंडियन एक्सप्रेस का आगे मानना है कि पार्टी अध्यक्ष के रूप में सोनिया गांधी की सफलताओं के साथ उनकी विफलताएं भी कांग्रेस के नए नेतृत्व को आगे का रास्ता दिखा सकती हैं.