हाल ही में आंध्र प्रदेश में एन चंद्रबाबू नायडू की सरकार को तीन साल पूरे हो गए. सत्ता से 10 साल का वनवास झेलने के बाद चंद्रबाबू नायडू ने आठ जून, 2014 एक बार फिर आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली थी. पहले जब वे मुख्यमंत्री थे तो तेलंगाना आंध्र प्रदेश का हिस्सा था, लेकिन इस बार वह एक अलग राज्य बन गया था. ऐसे में उनके सामने चुनौतियां बिल्कुल अलग तरह की थीं. चंद्रबाबू नायडू जिस आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने उसके पास अपनी कोई राजधानी नहीं थी. जिस हैदराबाद को चंद्रबाबू नायडू ने मुख्यमंत्री के तौर पर 2004 तक जी-जान लगाकर विकसित किया था, वह अब तेलंगाना का हिस्सा था.

2004 में विधानसभा चुनावों में चंद्रबाबू नायडू की तेलगू देशम पार्टी की हार बहुत लोगों को अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की लोकसभा चुनावों में हुई हार से भी अधिक अप्रत्याशित लगी थी. उस वक्त तक न तो बतौर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की कोई खास ख्याति बनी थी और न ही कोई और मुख्यमंत्री नई तरह की सोच वाला दिखता था. आंध्र प्रदेश के बाहर भी बतौर मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की तारीफ करने वाले लोग मिलते थे.

चंद्रबाबू नायडू की 2004 की हार के विश्लेषण में यह बात निकलकर आई कि उनके शासन काल में हुए अधिकांश विकास कार्य हैदराबाद या यों कहें कि शहरों तक ही सिमटकर रह गए. मुख्यमंत्री के तौर पर उनके अधिकांश फैसलों से फायदा या तो काॅरपोरेट घरानों का हुआ या फिर सेवा क्षेत्र में काम करने वाले पढ़े-लिखे पेशेवरों का. गांवों में रहने वाले लोगों और किसानों की उपेक्षा करने के आरोप उन पर लगे.

अब संतुलन की राह

इस पृष्ठभूमि में जब चंद्रबाबू नायडू के इस कार्यकाल के अब तक के तीन साल को देखा जाए तो पता चलता है कि इस बार वे पिछली बार वाली गलतियां नहीं कर रहे हैं. इस बार शहरों और काॅरपोरेट क्षेत्र के साथ उनकी सरकार किसानों और गांवों के लिए भी काम करती हुई दिख रही है. कुल मिलाकर देखा जाए तो चंद्रबाबू नायडू इस बार के कार्यकाल में शहरों और गांवों के बीच एक समन्वय बनाते हुए दिख रहे हैं.

आंध्र प्रदेश की नई राजधानी के तौर पर अमरावती को विकसित किया जा रहा है. जिन लोगों ने भी वहां के काम को जमीनी स्तर पर देखा है या इस परियोजना की रूपरेखा को थोड़ी बारीकी से देखा है, उनका कहना है कि जब अमरावती पूरी तरह से तैयार होगा तो संभवतः यह भारत का सबसे सुनियोजित शहर हो. अमरावती को विकसित करने से उद्योग जगत को तो फायदा होगा ही, साथ ही साथ इसे विकसित करने के लिए जमीन अधिग्रहण का जो माॅडल अपनाया गया उससे यहां उन लोगों को काफी फायदा हुआ जिनकी जमीन नई राजधानी बनाने में गई.

यहां पहले लोगों से जमीन ली गई. फिर उसे सरकार ने शहर के हिसाब से विकसित कराया. इसके बाद जिन लोगों से जमीन ली गई, उन्हें यह विकल्प दिया गया कि अगर वे चाहें तो विकसित जमीन का एक हिस्सा वापस ले सकते हैं. जो नहीं लेना चाहते उन्हें सरकार ने पैसे दिए. जाहिर है कि विकसित होने के बाद और राजधानी का हिस्सा होने के बाद जमीन की कीमतें यहां बढ़ गईं. स्थानीय लोग जमीन बेच सकें और इसका अधिक से अधिक फायदा उन्हें मिले, इसके लिए चंद्रबाबू नायडू ने केंद्र सरकार से आंध्र प्रदेश के लिए जो विशेष पैकेज हासिल किया उसमें यह प्रावधान कर दिया कि इस तरह की जमीन बेचने पर कैपिटल गेन टैक्स की छूट मिलेगी. कैपिटल गेन टैक्स वह कर होता है जो किसी प्राॅपर्टी को खरीदने के दाम और बेचने के दाम के अंतर पर लगता है.

नायडू के इस कार्यकाल में श्रीसिटी एक प्रमुख औद्योगिक हब बनकर उभरा है. यहां मोबाइल बनाने वाली कई कंपनियों ने अपनी इकाइयां लगाई हैं. चीन की प्रमुख मोबाइल निर्माता कंपनी शाओमी इनमें एक है. इस कंपनी में काम करने वाले अधिकांश लोग शहर से बाहर 70 किलोमीटर के दायरे से आते हैं. कंपनी ने अपने कर्मचारियों को लाने-ले जाने के लिए बस सेवा चला रखी है. अच्छी सड़कों की वजह से यह दूरी भी कर्मचारियों और कंपनी को कम ही लगती है. कुछ समय पहले कंपनी की ओर से यह कहा गया था कि राज्य सरकार इस तरह के कामकाजी माॅडल को प्रोत्साहन दे रही है. कई दूसरी कंपनियां भी इस तर्ज पर काम कर रही हैं. इस तरह के प्रयोगों से गांवों में खुशहाली आ रही है. कहा जाए तो इस बार चंद्रबाबू नायडू औद्योगीकरण को गांव और शहर को जोड़ने वाली कड़ी बना रहे हैं. उदाहरण के तौर एशियन पेंट की 1,750 करोड़ निवेश वाली परियोजना विशाखापट्टनम के पास एक गांव पुद्दी में लगाई जा रही है.

किसानों पर भी ध्यान

किसानों की खुशहाली के लिए चंद्रबाबू नायडू ने अब तक के कार्यकाल में एक बड़ा काम किया है और यह है गोदावरी नदी को कृष्णा नदी से जोड़ने का. इस परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर कई तरह की बातें हैं और उन्हें सिरे से खारिज भी नहीं किया जा सकता लेकिन जिस तरह से ये परियोजना पूरी की गई, वह एक मिसाल है. दोनों नदियों को जोड़ने वाली इस पट्टिसेमा परियोजना की शुरुआत हुई 29 मार्च, 2015 को. 174 किलोमीटर की इस परियोजना को साल भर के अंदर पूरा कर लिया गया. इस परियोजना से रायलसीमा क्षेत्र के उस सात लाख हेक्टेयर जमीन को सिंचाई की सुविधा मिल पा रही है जिसके लिए सिंचाई का काम मुश्किल था. सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि इस परियोजना की वजह से पिछले साल आंध्र प्रदेश के इस क्षेत्र के किसानों की खरीफ की फसल हो पाई. इसके अलावा इस क्षेत्र में खरीफ के रकबे में तकरीबन 1.5 लाख एकड़ की बढ़ोतरी हुई. इसके अलावा चंद्रबाबू नायडू के अब तक के कार्यकाल में 22 मझोली सिंचाई परियोजनाओं को पूरा किया गया है.

अपने पिछले कार्यकाल में पूरी तरह से बाजार के अनुकूल होने की पहचान बनाने वाले चंद्रबाबू नायडू ने इस कार्यकाल में कई कल्याणकारी या यों कहें कि लोकलुभावन कदम उठाते हुए भी दिख रहे हैं. उदाहरण के तौर पर उनकी सरकार ने सरकारी बसों में वरिष्ठ नागरिकों को किराये में 25 फीसदी की छूट दी है. इसके अलावा बुजुर्गों के लिए शुरू की गई एनटीआर भरोसा योजना के तहत दी जाने वाली पेंशन की रकम उन्होंने 200 रुपये से बढ़ाकर 1,000 कर दी है. दिव्यांगों को इस योजना के तहत पहले जहां हर महीने 500 रुपये की आर्थिक मदद मिल रही थी, वहीं अब उन्हें 1,500 रुपये मिलेंगे. तेज गति से चलने वाला इंटरनेट सिर्फ शहरों तक सीमित न रहे बल्कि गांव-गांव तक पहुंचे, इसके लिए नायडू सरकार माइक्रोसाॅफ्ट के साथ मिलकर एक योजना पर काम कर रही है.

कुल मिलाकर देखा जाए तो 2004 की अप्रत्याशित हार के बाद 2014 में फिर से सत्ता में आए चंद्रबाबू नायडू का काम इस बार बदला-बदला नजर आ रहा है.