निर्देशक : दिनेश विजन

लेखक : सिद्धार्थ-गरिमा

कलाकार : सुशांत सिंह राजपूत, कृति सेनन, जिम सार्ब, वरुण शर्मा, राजकुमार राव

रेटिंग : 1.5 / 5

काश कि ‘राब्ता’ एसएस राजामौली की बहुचर्चित तेलगू फिल्म 8‘मगधीरा’ की रीमेक ही होती. आधिकारिक होती या अनाधिकारिक होती. कुछ भी होती. कुछ तो होती. ‘मगधीरा’ नहीं होती तो ‘मक्खी’ होती. ‘कर्ज’ होती. ‘करण-अर्जुन’ होती. पुनर्जन्म पर बनी पुरानी सफल मसाला फिल्मों में से किसी एक के जैसी होती.

अभी वो धीरज की परीक्षा है. पुनर्जन्म वाली थीम को नौसिखिया ट्रीटमेंट देकर होश फाख्ता कर देने वाला ऐसा ‘राब्ता’, जिससे वास्ता रख पाना संभव नहीं.

निर्देशक दिनेश विजन अपनी फिल्म की शुरुआत दो अजनबियों के मिलने से करते हैं. सुशांत सिंह राजपूत और कृति सेनन के किरदार विदेशी भूमि पर मिलते ही प्रेम में खो जाते हैं. यहां से लेकर खलनायक जिम सार्ब के उनकी जिंदगी में दाखिल होने तक के वक्त को विजन अपने कैमरे में बखूबी कैद करते हैं. मध्यांतर तक अर्बन रोमांस की नब्ज पकड़कर फिल्म फील-गुड सिनेमा वाली खूबसूरती रचकर रोम-रोम पुलकित होने का एहसास देती है. भले ही रिलीज के पहले सुशांत-कृति प्रमोशन के नाम पर कई कई जगह प्रेमी होने की नाटक-नौटंकी दिखाकर दुखी कर चुके हैं, लेकिन फिल्म में दोनों साथ आकर बेहद अच्छे लगते हैं. फिल्म सिर्फ उनके बीच की नोंक-झोंक, अंतरंगता और चुहल की बढ़िया अभिव्यक्ति के लिए देखी जा सकती है.

इसके बाद मध्यांतर आता है जिसमें पुनर्जन्म आता है और फिल्म देशाटन करने आठ सौ साल पहले की ओर निकल लेती है. पुनर्जन्म की कथा बांचता यही हिस्सा ‘राब्ता’ को तबाह करता है और पहले हिस्से के दर्शनीय होने के बावजूद संपूर्णता में फिल्म औसत से नीचे की हो जाती है. एक दर्शनीय रोमांटिक फिल्म बनते-बनते ‘राब्ता’ हरमन बावेजा वाली ‘लव स्टोरी 2050’ के स्तर की उबाऊ पुनर्जन्म गाथा बन जाती है. इसमें हिमेश रेशमिया की ‘कर्ज’ और सलमान खान की ‘सूर्यवंशी’ का नाम भी जोड़ा जा सकता है.

राब्ता बेहद पुराने वक्त को विश्वसनीय अंदाज में रीक्रिएट जरूर करती है और उस हिस्से के लिए की गई मेहनत स्क्रीन पर नजर आती है. लेकिन लेखन इतना नीरस है कि उस वक्त के किरदारों से कोई जुड़ाव नहीं होता. जैसे एक सपाट कहानी के ऊपर भी बुलडोजर चलाकर उसे चपटा किया गया हो.

कृति सेनन का किरदार साहिबा, एक नायक को बरसों से चाहने के बाद दूसरे नायक को क्यों-कैसे एकदम चाहने लगता है, फिल्म सलीके से नहीं समझा पाती. आन-बान-शान की रक्षा के लिए नायक-नायिका एक प्रतियोगिता रखते हैं और एक लंबे सीन में सिर्फ दौड़ते रहते हैं! सुशांत सिंह राजपूत का किरदार इतनी भारी आवाज बनाकर बोलता है कि कई दफा समझ नहीं आता कि बोल रहा है या गरम पानी के गरारे कर रहा है. ‘गेम ऑफ थ्रोन्स’ के खल ड्रोगो जैसा बोलने-लगने की कोशिश करने वाले इस रोल में सुशांत अपने करियर की सबसे कम दर्शनीय एक्टिंग करते हैं.

राजकुमार राव झुर्रियों से लदे एक बुजुर्ग की भूमिका में रूप-रंग तो अकल्पनीय रखते हैं, लेकिन उनके छोटे-से किरदार के पास एक-दो वाक्यों वाला सीनियर सिटीजन टाइप ज्ञान देने के अलावा कुछ नहीं होता. वे अपना बहुमूल्य वक्त ऐसी भूमिकाओं में बर्बाद करेंगे, सोचा न था.

‘नीरजा’ में अपनी हरकतों से आतंकित कर देने वाले जिम सार्ब फिल्म के पहले हिस्से में खूब फबते हैं. अपनी अलग तरह की डायलॉग डिलीवरी के साथ इस हिस्से के कुछ दृश्यों में वे इतने हावी हो जाते हैं कि आप उनके चार्म के आगे सुशांत को भी भूलने लगते हैं. लेकिन फिर – एक बार फिर! – पुनर्जन्म वाले हिस्से में पहुंचकर वे प्रभावहीन हो जाते हैं और हिंदी बोलने तक के लिए संघर्ष करने लगते हैं. पुनर्जन्म खत्म करके जब कहानी वर्तमान में लौटती है, उनका किरदार इतनी ज्यादा पागलों वाली हरकतें करने लगता है कि एक अच्छे अभिनेता को घिसे-पिटे विलेन के रोल में यूं स्टीरियोटाइप्ड करने के लिए आप निर्देशक से नाराज होने लगते हैं.

फिर आपको ऐसा करने की कई सारी वजहें एक साथ मिलने लगती हैं, और आप निर्देशक से नाराज होते-होते थक जाते हैं. फिल्म अपने इस हिस्से में उस ताजगी को खो देती है जो उसने पहले हिस्से में सुशांत-कृति की वजह से पाई थी. सिवाय एक लंबे एक्शन-सीन को छोड़कर – जिसमें सुशांत पुनर्जन्म की बातों को मानने से इंकार करते हैं - आपको तीनों का ही अभिनय नागवार गुजरने लगता है. जब आप ईश्वर से यह प्रार्थना करने की सोचते हैं कि इस फिल्म को खत्म कर दे, तभी वह अपने क्लाइमेक्स में पहुंचकर कुंभकरण बराबर आलसी होकर एकदम हड़बड़ी में खुद को खत्म कर लेती है. लिटरली!

और यह भी बता जाती है कि बॉलीवुड के पास पैसा बहुत है...पानी में बहाने के लिए.

‘राब्ता’ में सुशांत सिंह राजपूत लेडी किलर वाले अपने मस्तमौला रोल में ‘बेफ्रिके’ के रणवीर सिंह की याद दिलाते हैं. उन्हीं की तरह ऊर्जा का रैडबुल पीकर फुदकते हैं, कपड़े उतारते हैं और आंखें मींचते हैं. अपने रोल में वे अच्छे जरूर लगते हैं, लेकिन इस तरह की हीरोगिरी वाले किरदार हिंदी सिनेमा में निरंतर हर दूसरी-तीसरी फिल्म के मध्यांतर तक अनेकों नौजवान हीरो निभाते रहे हैं - खुद उन्होंने भी निभाया है. इसलिए सुशांत सिंह राजपूत जैसे अभिनेता से इससे आगे की उम्मीद रहती है. पुनर्जन्म वाले हिस्से से वही उम्मीद थी भी, जो पूरी न हो सकी.

कृति सेनन फिल्म में सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं. बावजूद इसके कि पुनर्जन्म वाली कहानी में वे एक योद्धा के रोल में बिलकुल नहीं जंचती, और शेर का शिकार खंजर से करने की बात करने के बाद खुद नायक के सामने बकरी बन जाती हैं. लेकिन राब्ता में वर्तमान समय की प्रेम-कहानी का हिस्सा बनते वक्त वे कमर्शियल सिनेमा के नियम-कायदों का पूरा पालन करती हैं और खूबसूरत दिखने के अलावा प्यार-मोहब्बत और खुशी-गम से जुड़े सारे जरूरी एक्सप्रेशंस अच्छे से देती हैं. उनकी और सुशांत की जोड़ी इसी वजह से इस फिल्म का एकमात्र दर्शनीय पहलू है.

बेहतर होता कि स्क्रीन को रोशन करने की काबिलियत रखने वाली इस जोड़ी को अपना काम दिखाने के लिए‘राब्ता’ से बेहतर फिल्म मिलती.

और आपको देखने के लिए.