आज केदारनाथ त्रासदी को चार साल पूरे हो गए. लंबे समय तक लाखों परिवार नम आंखों के साथ इसे याद रखेंगे. 5000 (अनाधिकारिक तौर पर 10000) से भी ज्यादा लोगों ने इसमें अपनी जान गंवाई. सवा लाख से भी ज्यादा लोग उत्तराखंड के सुदूर दुर्गम इलाके में फंसे रहे. ये लोग देश के कोने कोने से थे. भारी बारिश, जगह-जगह हुआ भूस्खलन, ग्लेशियर झील का फटना और उस से पैदा हुआ सैलाब इस त्रासदी के मुख्य कारण बताए गए .

ग्लेशियरों का गलना और गलते-गलते पीछे चले जाना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. ग्लेशियर बर्फ, छोटे बड़े पत्थर, बालू, मिट्टी आदि के बने होते हैं. बर्फ के हिस्से तो पिघल कर पानी बनकर बह जाते हैं, पर खाली हुई जगह पर पत्थर, बालू, मिट्टी आदि पड़ा रह जाता है. सालों साल तक जमा होता रहा यह मलबा धीरे धीरे एक बांध की तरह पिघलते पानी को रोकने का काम करने लगता है. ग्लेशियर से पिघलता पानी ग्लेशियर के पास ही जमा होने लगता है. ऐसी जगहों में होने वाला हिमपात भी गलकर पानी के स्तर को बढ़ाता है. पानी का स्तर बढ़कर एक झील का आकार ले लेता है. ग्लेशियर रिसाव से बनी और उसी के मलबे पर टिकी ऐसी झीलों को ग्लेशियर झील कहते हैं.

आपदा कैसे आई थी?

15 जून 2013 को केदारनाथ घाटी में मूसलाधार बारिश शुरू हो चुकी थी. पूरे उत्तराखंड में 15 जून को 340 मिमी बारिश हुई जो कि औसत से 375 फीसदी ज्यादा थी. अकेले गौरीकुंड में ही 16 जून को 250 मिमी और 17 जून को 180 मिमी बारिश रिकॉर्ड की गयी. भारी बारिश से इलाका किसी बड़ी दुर्घटना के घटने की आशंका के दबाव में आ चुका था. नदियां खतरे की घंटियां बजा रहीं थीं.

केदारनाथ मंदिर से दो किलोमीटर ऊपर की तरफ चोरा बारी ग्लेशियर है. चोराबारी ग्लेशियर के पास ही चोरा बारी झील थी. समुद्रतल से 3900 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद यह झील नक्शों में 1965 से भी पहले से मौजूद थी. 500 मीटर लम्बी, 200 मीटर चौड़ी और 15-20 फ़ीट गहरी ग्लेशियर के मलबे पर टिकी चोरा बारी झील 16 जून को ही लबालब भर चुकी थी. भयंकर बारिश से आसपास के ग्लेशियर भी तेज़ी से गले. सारा पानी झील की तरफ़ रुख़ करता रहा. तीन दिन में लाखों गैलन पानी झील में जमा हो चुका था.

यह झील जिस मलबे पर टिकी थी वह आखिरकार पानी का इतना भार सह नहीं पाया. झील के पानी ने पहले बांध के ऊपर से और फिर बांध को चीरते हुए अचानक आई बाढ़ का रूप ले लिया. पानी अपने साथ मलबे को भी बहाकर ले गया. मिनटों में ही केदारनाथ कस्बा तहस नहस हो गया. केदार घाटी में बहने वाली मंदाकिनी नदी में पानी का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ गया .

इस प्राकृतिक घटनाक्रम के बीच डेढ़ लाख सैलानियों और तीर्थ यात्रियों का एक बेहद संवेदनशील इलाके में मौजूद होना दुर्भाग्यपूर्ण था. हिमालय के ऊंचे पहाड़ों पर हुई एक प्राकृतिक घटना शोकपूर्ण आपदा में तब्दील हो गयी. मंदाकिनी नदी की भयंकर बाढ़ अपने साथ हज़ारों हज़ार लोगों, सैकड़ों गांवों, मकानों–दुकानों और मवेशियों–गाड़ियों को बहा ले गयी. नदी के तट पर बने घर ताश के पत्तों जैसे ढह गए. प्रकृति के बुनियादी नियमों की अनदेखी का एक बेहद महंगा मूल्य चुकाना पड़ा.

खतरे और भी

2015 में वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान ने उत्तराखंड की 500 वर्ग मी से बड़ी ग्लेशियर झीलों की एक सूची प्रकाशित की. इस सूची के अनुसार अकेले उत्तराखंड में ग्लेशियरों के ऊपर बनी हुईं या उनसे सटी हुई क़रीब 1266 झीलें हैं. इनमें से 635 झीलें अकेले अलकनंदा घाटी में हैं जबकि 306 भागीरथी की घाटी में. यह सूची सुदूर संवेदन प्रणाली या रिमोट सेंसिंग के जरिये सेटेलाइट डेटा के इस्तेमाल से बनाई गई है.

साहसिक पर्यटन की वजह से ख्याति पा चुकीं वासुकी ताल, केदार ताल और हेमकुण्ड ग्लेशियरों के पिघलने से बनीं झीलें हैं. सूची के अनुसार ऐसी 92 झीलें गौरी गंगा घाटी, 75 धौली गंगा घाटी, 52 झीलें टौंस घाटी, 45 कुटियांग्टी घाटी, 22 भिलंगना घाटी, नौ मंदाकिनी घाटी, 13 यमुना घाटी और सात पिंडर घाटी में पायी गईं.

जलवायु परिवर्तन के चलते लगातार बढ़ रहा तापमान यह भी बताता है कि आगे ग्लेशियरों के पिघलने की दर और ग्लेशियर झीलों के बढ़ने की प्रक्रिया तेज ही होगी. जलवायु परिवर्तन का एक नतीजा अतिवृष्टि की घटनाओं के रूप में भी दिखेगा. इस लिहाज से देखें तो ये झीलें उत्तराखंड के ऊंचे इलाकों में बिछे हुए टाइम बम की तरह हैं.

केदारनाथ जैसी आपदाएं दोबारा न हों, इसके लिए उत्तराखंड के संवेदनशील इलाकों में हो रहे अंधाधुंध टूरिज्म पर नियंत्रण रखना जरूरी है . साथ ही साथ ग्लेशियर झीलों पर पैनी नजर रख कर और पूर्व चेतावनी प्रणाली को बेहद मजबूत करके कुछ हद तक जान-माल के नुकसान से बचा जा सकता है.

इतिहास से सबक

इस प्रसंग में 1893 का एक उदाहरण याद रखा जा सकता है जब चमोली जिले में बहने वाली बिरही नदी में एक पहाड़ गिर गया था जिससे विशाल झील बन गई थी. तब के शासकों यानी अंग्रेजों ने खतरा भांपते हुए इस झील के एक छोर पर बसे दुर्मी गांव में एक तारघर खोल दिया था. तारघर से एक अंग्रेज कर्मचारी हर रोज पानी के स्तर की जानकारी नीचे बसे गांवों में भेजता.

आशंका गलत नहीं थी. एक साल बाद भारी बारिश और पहाड़ धसकने से ताल का एक हिस्सा टूट गया. भूगर्भ वैज्ञानिकों के मुताबिक इस चार किमी लंबे, एक किमी चौड़े और 300 मीटर गहरे इस ताल में करीब 15 करोड़ घन मीटर पानी था. ताल टूटने के बाद भारी मात्रा में पानी बिरही की संकरी घाटी से होते हुए चमोली, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग, श्रीनगर, ऋषिकेश और हरिद्वार की ओर बढ़ा. दस्तावेजों के मुताबिक इससे अलकनंदा घाटी में खेती और संपत्ति को भारी नुकसान हुआ, लेकिन मौत सिर्फ एक हुई थी. वह भी उस साधु की जो लाख समझाने के बावजूद जलसमाधि लेने पर अड़ा हुआ था. यानी नुकसान इसलिए बहुत कम हुआ कि संकट को समझने और उससे बचने के लिए समय पर सटीक उपाय करने की अंतर्दृष्टि दिखाई गई थी

वक्त का चक्का आगे बढ़ा. भारत आजाद हुआ. नए शासक आए. 20 जुलाई, 1970 को यह ताल पूरी तरह से टूट गया. बेलाकूची नाम का एक गांव इस जल प्रलय में बह गया. हादसे में कई यात्री गाड़ियों के बहने के साथ कुल 70 मौतें होने की बात भी रिकॉर्ड में दर्ज है. अब तो उत्तराखंड में हर साल ही चौमासे के दौरान भूस्खलन की कोई बड़ी घटना देखने-पढ़ने को मिल जाती है. बीती 18 मई को ही जोशीमठ को बद्रीनाथ से जोड़ने वाली सड़क पर हुए भूस्खलन से 11 हज़ार लोग फंस गए.

ऐसे में केदारनाथ त्रासदी को बार बार याद करने की और उससे मिले सबक को लगातार दोहराने की जरूरत है. क्या हम ऐसा कर रहे हैं?

(लेखिका पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र से जुड़ी हैं)