30 जून 1959 को अर्नेस्तो ‘चे’ गेवारा भारत आए थे. अपनी इस यात्रा पर उन्होंने एक रिपोर्ट लिखी थी जिसे उन्होंने क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो के सुपुर्द कर दिया था. 12 अक्तूबर 1959 को, वह रिपोर्ट वहां के एक साप्ताहिक ‘वेरदे ओलिवो’ में छपी. स्पानी भाषा की वह रिपोर्ट ‘जनसत्ता’ के पूर्व संपादक ओम थानवी ने चे के बेटे कामीलो गेवारा मार्श के सौजन्य से हासिल की. प्रभाती नौटियाल द्वारा किये गये उसके हिंदी अनुवाद का संपादित स्वरूप यहां दिया गया है.

विशद विविधताओं का देश भारत

अर्नेस्तो ‘चे’ गेवारा

काहिरा से हमने भारत के लिए सीधी उड़ान भरी. उनतालीस करोड़ आबादी और तीस लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के देश के लिए. मिस्र की धरती जितनी नाटकीय महसूस होती है, उतनी यह नहीं है. उस रेगिस्तानी देश से कहीं बेहतर हैं यहां के जमीनी हालात. लेकिन सामाजिक अन्याय ने जमीन का इस कदर बंटवारा किया कि थोड़े-से लोगों के पास अत्यधिक संपदा है तो अधिकांश के पास कुछ नहीं.

अट्ठारहवीं सदी के अंत में और उन्नीसवीं के शुरू में इंग्लैंड ने भारत को अपना उपनिवेश बनाया था. आजादी के लिए बड़े संघर्ष हुए. लेकिन अंग्रेजों की दमन शक्ति भारी साबित हुई. उस औपनिवेशिक ढांचे ने भारत का समृद्ध हस्तशिल्प उद्योग तबाह कर दिया. अंग्रेज शासन भारत की आर्थिक स्वतंत्रता को ध्वस्त करने और भारतीयों को अनंतकाल तक अपने साम्राज्य के बोझ के नीचे दबाए रखने पर आमादा था. वर्तमान सदी का कुछ हिस्सा और उन्नीसवीं सदी इन्हीं हालात में देश को यत्र-तत्र विद्रोह के रास्ते पर डाल चुके थे और मासूम जनता का खून बहता जा रहा था.

चे गेवारा द्वारा कोलकाता में खींचा गया एक चित्र
चे गेवारा द्वारा कोलकाता में खींचा गया एक चित्र

महात्मा गांधी के गूढ़ व्यक्तित्व के माध्यम से भारत ने अपने सत्याग्रह को जारी रखा और अंतत: अपेक्षित स्वतंत्रता हासिल की. गांधी की मृत्यु के बाद नेहरू ने सामाजिक बोझ की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली थी. एक ऐसे देश का नेतृत्व अपने हाथों में लिया जिसकी आत्मा उस दीर्घ शासन से रुग्ण हो चुकी थी और जिसकी अर्थव्यवस्था महानगरीय लंदन के बाजार की पूर्ति के लिए अभिशप्त थी. अपने आर्थिक भविष्य के विकास के लिए किसानों में जमीन का बंटवारा और देश के औद्योगीकरण को सुदृढ़ करना जरूरी था. कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने उस कार्य के लिए एक अनुकरणीय उत्साह के साथ अपने आपको समर्पित कर दिया.

यह बहुविध और बहुत बड़ा देश अनेक प्रथाओं और रूढ़ियों का देश है. जिन सामाजिक समस्याओं में हम आज जी रहे हैं, उनसे उपजे हमारे विचार भारतीय प्रथाओं और रूढ़ियों से बिल्कुल भिन्न हैं. हमारा सामाजिक-आर्थिक ढांचा एक-सा है. गुलामी और औपनिवेशीकरण का वही अतीत, विकास की सीध की दिशा भी वही. फिर भी हममें दिन-रात का अंतर है. एक ओर जहां भूमि-सुधार की आंधी ने कांपाग्वैइ (क्यूबा) की जमींदारी को एक ही झटके में हिला कर रख दिया और पूरे देश में किसानों को मुफ्त जमीन बांटते हुए वह अनवरत रूप से आगे बढ़ रही है; वहीं महान भारत अपनी सुविचारित और शांत पूर्वी अदा के साथ बड़े-बड़े जमींदारों को वहां के किसानों को भू-दान कर उनके साथ न्याय करना समझा रहा है. दरअसल, जो उनकी खेती को जोतते-बोते हैं, उनको ही एक कीमत अदा करने के लिए राजी कर रहा है. इस प्रकार एक ऐसी कोशिश हो रही है कि समूची मानवता में जो समाज इतना अधिक आदर्शमय और संवेदनशील है, लेकिन सबसे अधिक गरीब भी, उसकी गरीबी की ओर असंवेदनशील दरिद्रता का प्रवाह किसी तरह अवरुद्ध किया जा सके.

राजधानी नई दिल्ली के समीप हम एक सहकारी खेती को देखने गए. हरियाली रहित करीब चालीसेक किलोमीटर बंजर जमीन से गुजरते हुए हमें अचानक कुछ जानवर और भैंसें दिखाई पड़ीं. हम हतोत्साहित करने वाली गरीबी और मिट्टी की दीवारों से बने घरों के एक छोटे गांव के पास थे. सहकारिता से गर्वोन्मत्त एक स्कूल दो अध्यापकों के असाधारण प्रयत्नों पर निर्भर था. उसमें पांच कक्षाएं चलती थीं. चेहरों पर बीमारियों के लक्षण झलकाते कमजोर बच्चे पालथी मारकर अपने अध्यापक का पाठ सुन रहे थे.

यहां जो बड़ा विकास था वह था सीमेंट के घेरे वाले पानी के दो कुएं, जिनसे ज्यादा लोग पानी भर सकते थे. लेकिन कुछ दूसरे अभिनव परिवर्तन भी थे जो असाधारण सामाजिक महत्व के थे और जो वहां फैली गरीबी का आभास भी कराते हैं: कृषि-सुधार की तकनीकें भारतीय किसान को सिखाती हैं कि किस तरह वह अपने पारंपरिक ईंधन (गोबर) को बिजली बनाने में इस्तेमाल कर सकता है.

छोटा ही सही, लेकिन एक रोचक परिवर्तन है कि बुरे (अपरिष्कृत) ईंधन के रूप में इस्तेमाल होने वाले गोबर की बड़ी मात्रा को (किसान) खाद के रूप में इस्तेमाल के लिए भी बचा लेता है. एक प्यारी-सी आवाज के साथ बच्चे और औरतें सभी गोबर इकट्ठा करने में जुट जाते हैं. उसे धूप में सुखाने के लिए रखते हैं और बाद में अलग-अलग ऊंचाइयों के अनेक पिरामिडों में बड़ी चींटियों की बांबी की तरह उन्हें लगा देते हैं. भारत की सरकार के प्रयत्नों का धन्यवाद कि जनता अब रोशनी के लिए उन छोटी भट्ठियों और अपनी जमीन को खाद देने के लिए उस महत्वपूर्ण उत्पाद कर निर्भर कर सकती है.

यह बात स्पष्ट ही है कि पशु यहां प्राचीन काल से ही पवित्र माना गया है. वह खेत जोतता था, दूध देता था. उसके अवशिष्ट की प्राकृतिक ईंधन के रूप में भी बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका थी. हमें बताया गया कि किसान को उसका धर्म इस बेशकीमती पशु की हत्या की अनुमति नहीं देता है और इसीलिए उसे एक पवित्र पशु माना गया. एक उद्देश्यप्राप्ति के लिए धर्म की ऐसी आड़ ली गई कि उत्पाद को अत्यधिक प्रभावशाली बना दिया गया. यह बात समाज के हित में ही थी. धीरे-धीरे साल दशकों में बदलते गए. अब जबकि यांत्रिक हल और द्रव-ईंधन का जमाना आ गया है, उस पवित्र पशु की पूजा उसी आदर के साथ जारी है. उसकी आबादी खूब फल-फूल रही है और कोई विधर्मी भी (उसका) मांस खाने की हिम्मत नहीं कर सकता है. अठारह करोड़ पशु हैं भारत में - अमेरिका में जितने हैं उनसे लगभग दस करोड़ अधिक - और दुनिया में पशु-संख्या में भारत का दूसरा नंबर है. धर्मपरायण और सांस्कृतिक नीति-नियमों का पालन करने वाले भारतीय जन-मानस को इस पवित्र पशु की पूजा से भारतीय शासन भी नहीं रोक सकता.

साठ लाख आबादी का सबसे बड़ा शहर कलकत्ता एक बहुत अविश्वसनीय संख्या की गायों के साथ जीने को अभिशप्त है. इन गायों के झुंड के झुंड सड़कों से गुजरते हुए या कहीं भी बीच सड़क पर पसरते हुए यातायात को अवरुद्ध कर देते हैं. इस शहर में हमें भारत का एक विचित्र और जटिल परिदृश्य देखने को मिला. यह औद्योगिक विकास के उत्पाद - जैसे कि रेल इंजिन - बनाता है, जिस जगह पहुंचने में हमें अभी और वक्त लगेगा, लेकिन एक भयानक दरिद्रता से बिल्कुल बगल से सटा हुआ भी है. नई-नई खोजों के सभी क्षेत्रों में जो तकनीकी विकास देखने को मिलता है उससे भारतीय वैज्ञानिकों की दुनिया के हर क्षेत्र में पहचान बनी है.

वहीं कृष्ण नाम के एक विद्वान से मुलाकात का मौका मिला. वह एक ऐसा चेहरा था जो हमारी आज की दुनिया से दूर लगता था. उस निष्कपटता और विनयशीलता के साथ उसने हमसे लंबी बातचीत की, जिसके लिए यह मुल्क जाना जाता है. दुनिया की समूची तकनीकी शक्ति और सामर्थ्य को आणविक ऊर्जा के शांतिप्रिय उपयोग में लगाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए उस अंतरराष्ट्रीय राजनीति की उसने भरपूर निंदा की जो आणविक हथियारों की जखीरेबाजी को समर्पित है. भारत में युद्ध नामक शब्द वहां के जन-मानस की आत्मा से इतना दूर है कि स्वतंत्रता आंदोलन के तनावपूर्ण दौर में भी वह उसके मन पर नहीं छाया. जनता के असंतोष के बड़े-बड़े शांतिपूर्ण प्रदर्शनों ने अंग्रेजी उपनिवेशवाद को आखिरकार उस देश को हमेशा के लिए छोड़ने को बाध्य कर ही दिया, जिसका शोषण वह पिछले डेढ़ सौ वर्षों से कर रहा था.

यह बात बड़ी रुचिकर है कि विरोधाभासों के इस देश में, जहां गरीबी उत्तम किस्म के सभ्य जीवन और उच्च कोटि के तकनीकी ज्ञान के साथ घुली-मिली है, स्त्री को सिर्फ सामाजिक रिश्तों में ही नहीं, राजनीति में भी प्रमुख स्थान हासिल है. अधिक नहीं, एकाध उदाहरण अगर दिया जाए तो दुबली-पतली और मधुर स्वभाव की उस भारतीय स्त्री को कांग्रेस की अध्यक्षा (इंदिरा गांधी) या विदेश उप-मंत्री (लक्ष्मी मेनन) जैसे पदों का कार्यभार मिला हुआ है.

हमारी इस यात्रा में सभी उच्च भारतीय राजनीतिज्ञों से मुलाकातें शामिल थीं. नेहरू ने न सिर्फ एक दादा की आत्मीयता के साथ हमारा स्वागत किया बल्कि क्यूबा की जनता के समर्पण और उसके संघर्ष में भी अपनी पूरी रुचि दिखाई. हमें अपने बेशकीमती मशविरे दिए और हमारे उद्देश्य की पूर्ति में बिना शर्त अपनी चिंता का प्रदर्शन भी किया. रक्षा मंत्री और संयुक्त राष्ट्र में भारतीय दल के नेता कृष्ण मेनन के बारे में भी यही बात कही जा सकती है. उन्होंने उच्च फौजी अफसरों से भी हमारी मुलाकात करवाई. हमने अपने-अपने देशों की समस्याओं के संदर्भ में विचार-विनिमय किया.

वाणिज्य मंत्री से भी हमारी एक सौहार्दपूर्ण बातचीत हुई जिसमें भविष्य के वाणिज्य-संबंधों की भूमि तैयार की गई जो कि हमारे लिए काफी महत्त्वपूर्ण सिद्ध हो सकते हैं. जिन उत्पादों की आपूर्ति हम कर सकते हैं, वे हैं तांबा, कोको, टायरों के लिए रेयॉन और संभवत: निकट भविष्य में चीनी भी. कोयला, कपास, कपड़ा, पटसन की बनी वस्तुएं, खाद्य तेल, मेवे, फिल्में, रेल-सामग्री और प्रशिक्षण-विमान वे हमें बेच सकते हैं. लेकिन यह सूची यहीं समाप्त नहीं होती. अनुभव बताता है कि दो उद्योगशील देश साथ-साथ उन्नति करते चल सकते हैं और अपने निर्मित उत्पादों का विनिमय भी कर सकते हैं. उनतालीस करोड़ भारतीयों का स्तर जैसे-जैसे ऊपर उठेगा, हमारी चीनी की मांग बढ़ेगी और हमें एक नया और महत्वपूर्ण बाजार मिल जाएगा.

हमारी इस यात्रा से हमें कई लाभदायक बातें सीखने को मिलीं. सबसे महत्त्वपूर्ण बात हमने यह जानी कि एक देश का आर्थिक विकास उसके तकनीकी विकास पर निर्भर करता है. और इसके लिए वैज्ञानिक शोध संस्थानों का निर्माण बहुत जरूरी है - मुख्य रूप से दवाइयों, रसायन विज्ञान, भौतिक विज्ञान और कृषि के क्षेत्र में. इन सभी तकनीकी संस्थानों और राज्य के बारे में तमाम सामान्य सूचनाओं का तालमेल और नेतृत्व एक राष्ट्रीय सांख्यिकी केंद्र द्वारा किया जाना चाहिए. भारतीय दरअसल इस काम में महारती हैं.

जिस सहकारी स्कूल का जिक्र मैंने अभी थोड़ी देर पहले किया, वहां से हम जब लौट रहे थे तो स्कूली बच्चों ने हमें जिस नारे के साथ विदाई दी, उसका तर्जुमा कुछ इस तरह है: ‘क्यूबा और भारत भाई-भाई.’ सचमुच, क्यूबा और भारत भाई-भाई हैं, जैसा कि आणविक विखंडन और अंतर भूमंडलीय रॉकेटों के इस युग में दुनिया के सभी मुल्कों को होना ही चाहिए.