संपादक महोदय,

सात जून को इंडियाज बैटर्ड प्रेस शीर्षक के साथ छपे आपके संपादकीय से यह संदेश जाता है कि भारत में दूसरे बड़े लोन डिफाल्टरों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो रही और एनडीटीवी के संस्थापकों पर पड़े छापे बदले की कार्रवाई का हिस्सा थे. यह संपादकीय एकतरफा है जिसमें आरआरपीआर होल्डिंग्स के खिलाफ पहले से चल रही जांच के तथ्यों पर गौर नहीं किया गया है. कर और कानून से जुड़ी अलग-अलग एजेंसियों द्वारा यह जांच 2011 से चल रही है.

केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो इस समय 100 से भी ज्यादा मामलों की जांच कर रहा है जिनमें न लौटाए गए कर्ज का कुल आंकड़ा पांच अरब डॉलर से भी अधिक है. इनमें कई बड़ी मछलियां अब जेल में हैं, उनकी संपत्तियां जब्त की जा चुकी हैं और इन मामलों में जोर-जोर से अदालती कार्रवाई चल रही है.

आईसीआईसीआई बैंक का नुकसान सिर्फ एक छोटी सी झलक है. (बैंक का) कर्ज चुकाने के लिए जिस तरह से पैसा जुटाया गया उसमें बरती गई अनियमितताओं को लेकर भी एनडीटीवी का मालिकाना हक रखने वाली आरआरपीआर होल्डिंग्स के खिलाफ जांच चल रही है. टैक्स के भुगतान में भी गंभीर अनियमितताएं बरती गई हैं.

अपने संपादकीय में आपने कहा कि एक एयरबेस पर हुए हमले की रिपोर्टिंग के लिए एनडीटीवी हिंदी को एक दिन के लिए ऑफ एयर कर दिया गया. यह फैसला बाकायदा एक जांच के बाद हुआ जिसमें एनडीटीवी भी भागीदार था. आतंकी घटनाओं की गैरजिम्मेदार रिपोर्टिंग करके देश और जनता की सुरक्षा को खतरे में डालने की इजाजत कोई लोकतंत्र नहीं दे सकता.

इस पूरे मामले में कानून अपना काम कर रहा है. भारत में एक मजबूत और स्वतंत्र न्यायपालिका है जो लोकतांत्रिक स्वतंत्रता की मजबूती से रक्षा करती है और कोई भी पीड़ित हमेशा उसके दरवाजे पर जा सकता है. प्रेस की आजादी के बारे में भारत को द न्यूयॉर्क टाइम्स से कोई सबक सीखने की जरूरत नहीं है. हमारी संस्थाएं और परंपराएं समृद्धता और विविधता से भरी सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों की बुनियाद पर खड़ी हैं.

आरके गौर

नई दिल्ली

(लेखक प्रेस सूचना अधिकारी और सीबीआई के प्रवक्ता हैं)