2009 की बात है. तब भी दार्जिलिंग में हालात खराब थे. गोरखालैंड के रूप में अलग राज्य की मांग के साथ शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गया था. पुलिस के साथ टकराव में कई लोगों की मौत हो गई थी. तब लोकसभा में विपक्ष की उपनेता सुषमा स्वराज ने कहा था कि गोरखालैंड एक ऐसा विचार है जिसका वक्त आ चुका है. आज करीब आठ साल बाद जब दार्जिलिंग में फिर हालात खराब हैं तो पश्चिम बंगाल में उनकी ही पार्टी के मुखिया दिलीप घोष ने इसके उलट बात कही है. उनका कहना है कि वे गोरखालैंड के अलग राज्य बनने के पक्ष में बिल्कुल भी नहीं हैं. उधर, भाजपा की केंद्रीय इकाई इस पर चुप्पी साधे हुए है.

कुछ हद तक इससे भी संकेत मिलता है कि पश्चिम बंगाल के इस पहाड़ी हिस्से में सुलग रही आग ने राज्य में भाजपा के लिए किस कदम असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है. कुछ ऐसा ही हाल राज्य में सत्तासीन तृणमूल कांग्रेस का है. इस चुनौती से कैसे निपटा जाए, इसे लेकर दोनों ही पार्टियां पशोपेश में हैं.

सरकारी स्कूलों में बंगाली भाषा को अनिवार्य करने के खिलाफ दार्जिलिंग में आठ जून को शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन अब अलग गोरखालैंड राज्य की मांग में बदल चुका है. गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) प्रमुख बिमल गुरूंग ने यह मांग पूरी न होने तक आंदोलन जारी रखने का ऐलान किया है. दूसरी ओर, सिंगूर आंदोलन के जरिए सत्ता तक पहुंचने वाली राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसके खिलाफ सख्त रूख अपनाने की बात कही है जबकि केंद्र सरकार का कहना है कि सभी पक्ष शांति से काम लें.

मुख्यमंत्री के रूप में ममता बनर्जी के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती

2011 के चुनाव में 34 साल की वामपंथी सरकार को करारी शिकस्त देने वालीं ममता बनर्जी को दशकों पुरानी गोरखालैंड की मांग बतौर विरासत मिली थी. इसके समाधान के लिए जुलाई, 2011 में केंद्र, राज्य सरकार और जीजेएम के बीच समझौता हुआ. इसके बाद सितंबर, 2011 में गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन (जीटीए) के गठन के लिए विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित किया गया. इसके तहत जीटीए को पहाड़ के विकास के लिए प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार दिए गए. जुलाई, 2012 के जीटीए चुनाव में जीजेएम ने सभी 45 सीटों पर जीत हासिल की. इसका कार्यकाल आगामी जुलाई में पूरा हो रहा है.

गोरखालैंड की मांग के खिलाफ सख्त मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दो अगस्त तक नए जीटीए के गठन की बात कही है. हालांकि इलाके में ताजा हालात और जीजेएम के उग्र रूख को देखते इसे पूरा करना उनके लिए ढेढ़ी खीर साबित होगा, यह तय माना जा रहा है. बीते शनिवार को पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़पों से इसकी पुष्टि होती है. इस झड़प में चार लोगों के मारे जाने और कइयों के घायल होने की बात सामने आई है.

पहाड़ पर नजर

पश्चिम बंगाल की राजनीति पर नजर रखने वाले जानकार बताते हैं कि मैदानी हिस्सों में अपनी पकड़ मजबूत कर चुकी ममता बनर्जी की नजर बीते कुछ समय से लगातार पहाड़ पर रही है. बीते महीने नगर निकाय चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने पहाड़ स्थित मिरिक सीट पर जीत दर्ज की थी. पिछले तीन दशक में पहली बार इस सीट पर किसी गैर पहाड़ी पार्टी ने जीत हासिल की. इस पर पहले जीजेएम का कब्जा था.

पश्चिम बंगाल एक ऐसा राज्य है जहां स्थानीय निकायों के चुनाव भी पार्टी के आधार पर लड़े जाते हैं और उनके नतीजे काफी राजनीतिक हलचलें पैदा करते हैं. हालिया नगर निकाय चुनाव के नतीजों ने पहाड़ पर अपनी पकड़ बढ़ाने के ममता बनर्जी के इरादे को और हवा दी. इसके बाद हाल में उन्होंने दार्जिलिंग में कैबिनेट की बैठक बुलाई. 1972 के बाद यहां कैबनेट की बैठक करने वालीं वे पहली मुख्यमंत्री हैं. उन्होंने दार्जिलिंग में सचिवालय बनाने का ऐलान भी किया. दार्जिलिंग में मीडिया से बात करते हुए उनका कहना था कि वे कभी इस क्षेत्र को बिलखते हुए नहीं देख सकतीं. आगे उन्होंने जीजेएम पर निशाना साधते हुए कहा, ‘यह बात विरोधियों को खलती है इसलिए ये लोग विकास की नहीं बल्कि हिंसा, आगजनी और पत्थरबाजी की बात करते हैं.’ ममता बनर्जी ने यह भी साफ किया कि विरोधियों के साथ अब और समझौता करना संभव नहीं है.

जीटीए सहित गोरखा जनमुक्ति मोर्चा पर लगाम कसने की तैयारी

पहाड़ में ताजा अशांति और जीजेएम के उग्र रूप के पीछे राज्य सरकार द्वारा जीटीए सहित जीजेएम पर लगाम कसने से संबंधित कई फैसले भी हैं. उदाहरण के लिए ममता बनर्जी ने क्षेत्र की तमांग, लेप्चा, शेरपा जैसी जनजातियों के लिए अलग-अलग विकास बोर्ड गठित किया. माना जा रहा है कि जीजेएम को हाशिए पर डालने के लिए एक खास नीति के तहत सरकार ने पहाड़ी क्षेत्र के विकास के लिए जीटीए को वित्तीय मदद देने की जगह इन बोर्डों को फंड आवंटित किया.

इसके साथ ममता सरकार ने ताजा आंदोलन शुरू होने के बाद वित्त विभाग को दो हफ्ते के अंदर जीटीए का विशेष ऑडिट करने का आदेश दिया है. सरकार ने जीटीए को आवंटित 1500 करोड़ रुपये में अनियमितता होने की आंशका जताई है. राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि इस कदम के जरिए ममता बनर्जी जीटीए चुनाव से पहले जीजेएम पर दबाव बनाना चाहती हैं.

गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का ममता बनर्जी पर पलटवार

जीजेएम प्रमुख बिमल गुरुंग ने ममता सरकार पर भेदभाव की राजनीति करने का आरोप लगाया है. उनका मानना है कि राजनीतिक वजहों से गोरखालैंड की मांग को हाशिए पर रखा गया है. गुरूंग ने सरकार को चुनौती देने के अंदाज में कहा, ‘अगर ममता बनर्जी बंगाल की मुख्यमंत्री हैं तो मैं भी ‘पहाड़ का मुख्यमंत्री’ और निर्वाचित सदस्य हूं. बाकी बंगाल में उनकी चलती है तो यहां मेरी चलती है.’ उन्होंने जीटीए को विफल करार देते हुए कहा कि पहाड़ की जनता अब केवल गोरखालैंड चाहती है.

जानकारों के मुताबिक बीते कुछ समय के दौरान जीजेएम को पहाड़ में अपनी राजनीतिक जमीन खिसकती हुई दिख रही थी. मिरिक में तृणमूल की जीत ने भी उसकी चिंता बढ़ा दी थी. माना जा रहा है कि इन बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में मोर्चे को एक ऐसे मुद्दे की तलाश थी जो उसकी दरकती जमीन को फिर से मजबूत कर सके. सरकारी स्कूलों में बंगाली भाषा को अनिवार्य बनाने के अपने फैसले से ममता बनर्जी ने उसे यह मुद्दा दे दिया.

बिमल गुरुंग के इस आंदोलन को पहाड़ स्थित गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) सहित अन्य पार्टियों ने अपना समर्थन दिया है. जीएनएलएफ ने 1980 के दशक में सुभाष घीसिंग के नेतृत्व गोरखालैंड की मांग को लेकर उग्र आंदोलन शुरू किया था. यह पार्टी फिलहाल तृणमूल की सहयोगी पार्टी है. जानकारी के मुताबिक गोरखालैंड के मुद्दे पर यह सरकार से समर्थन वापस लेने पर विचार कर रही है. उधर, जीजेएम के महासचिव रोशन गिरी ने कहा है कि गोरखालैंड की मांग के लिए सभी पार्टियां एक साथ मिलकर इसका रोडमैप तैयार करेंगी. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि आने वाले दिनों में अगर इन सभी पार्टियों के साथ पहाड़ की जनता गोरखालैंड की मांग की आवाज बुलंद करती है तो यह ममता बनर्जी के सामने सत्ता में रहते हुए उनके लिए सबसे मुश्किल वक्त साबित होने वाला है.

भाजपा के लिए आगे कुआं, पीछे खाई

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को चुनौती देने की कोशिश में लगी भाजपा के लिए गोरखालैंड आंदोलन ने नई मुसीबत पैदा कर दी है. 2009 और 2014 में दार्जिलिंग लोकसभा सीट पर भाजपा उम्मीदवार की जीत की बड़ी वजह मोर्चे का समर्थन रहा है. इस सीट से फिलहाल एसएस अहलूवालिया सांसद हैं. इससे पहले यहां जसवंत सिंह ने जीत हासिल की थी. जीजेएम का कहना है कि भाजपा ने पिछले चुनावों में गोरखालैंड की मांग पर विचार करने का आश्वासन दिया था लेकिन केंद्र में जाकर वह बदल गई है. जीजेएम का आरोप है कि अब राज्य सरकार की तरह भाजपा भी उसे मोहरे की तरह इस्तेमाल कर रही है. पहाड़ स्थित भाजपा नेताओं का भी मानना है कि वे पहले पहाड़ी हैं, इसके बाद उनके लिए पार्टी की जगह है.

उधर, प्रदेश भाजपा इकाई ने गोरखालैंड की मांग का समर्थन करने से इनकार कर दिया है. पार्टी प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष का कहना है कि वे इस मांग के समर्थन में नहीं बल्कि सरकार द्वारा पहाड़ के लोगों के साथ किए जा रहे अत्याचार के खिलाफ हैं. इस बीच, सांसद एसएस अहलूवालिया बीच का रास्ता निकालने की कोशिश में दिख रहे हैं. इसके लिए उन्होंने गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मिलकर गोरखालैंड की मांग पर एक कमिटी गठित करने की मांग की है. इसके अलावा राजनाथ सिंह ने भी प्रदर्शनकारियों से क्षेत्र में शांति स्थापित करने में मदद की अपील की है. उन्होंने इस मुद्दे पर राज्य सरकार और जीजेएम के साथ त्रिपक्षीय वार्ता की इच्छा जताई है.

2019 के लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी भाजपा के लिए गोरखालैंड की मांग का विरोध करना काफी मुश्किल है क्योंकि जीजेएम के समर्थन के बिना उसका पहाड़ में लोकसभा और विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करना काफी मुश्किल होगा. दूसरी ओर, इसका समर्थन करने पर भाजपा को दक्षिण बंगाल में अपना बढ़ता हुआ आधार गंवाने की आशंका है. वैसे ही इस मसले पर पार्टी की प्रदेश और केंद्रीय इकाई में टकराव की खबरें आ रही हैं. साथ ही इससे पार्टी ममता बनर्जी को अपने खिलाफ हमलावर होने का एक मौका दे सकती है. इन चुनौतियों को देखते हुए ही पार्टी अध्यक्ष अमित शाह सहित राष्ट्रीय नेतृत्व ने इस मामले पर चुप्पी साधने की नीति अपनाई हुई है.